दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को आरक्षण के खिलाफ प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार किए जाने के मामले में पुलिस के रुख पर नाराजगी जताई। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत ने कहा कि केवल भीड़ बढ़ने की आशंका के आधार पर किसी प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध (ब्लैंकेट बैन) लगाना उचित नहीं है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि पुलिस शर्तें तय करके प्रदर्शन की इजाजत दे सकती थी।
जाने पूरा मामला?
यह याचिका क्षत्रिय करणी सेना ने दिल्ली हाईकोर्ट में दायर की है। संगठन राजस्थान के बालेगढ़ कांड को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करना चाहता था। इस आयोजन के लिए संगठन ने दिल्ली पुलिस से अनुमति मांगी थी, लेकिन पुलिस ने अनुमति देने से इनकार कर दिया। जिसके बाद संगठन ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट में क्षत्रिय करणी सेना की ओर से अधिवक्ता रोशन धनाई पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि संगठन की ओर से कुल दो याचिकाएं दायर की गई हैं।
सोशल मीडिया अकाउंट्स पर भी बवाल
अधिवक्ता धनाई ने कोर्ट को बताया कि पहली याचिका सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि मेटा की ओर से फेसबुक, इंस्टाग्राम और वॉट्सऐप के कई अकाउंट्स सस्पेंड कर दिए गए थे। हालांकि इंस्टाग्राम का अकाउंट बाद में बहाल कर दिया गया, लेकिन फेसबुक पेज का लाइव वीडियो और वॉट्सऐप नंबर अब भी सस्पेंड अवस्था में है।
दूसरी याचिका जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति को लेकर दायर की गई। पहले की सुनवाई के दौरान अदालत ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया था कि वह आवेदन पर गंभीरता से विचार करे।
एसीपी से लेकर चिट्ठी तक: अधिवक्ता का आरोप
कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से गंभीर आरोप लगाए गए। अधिवक्ता रोशन धनाई ने बताया कि एसीपी ने हमें बुलाकर कहा था कि अनुमति दे दी जाएगी। लेकिन इसके बाद 15 तारीख को एक पत्र भेजकर इनकार कर दिया गया। पत्र में कहा गया कि आशंका है कि तय संख्या से अधिक लोग पहुंच सकते हैं और भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल होगा।”
जस्टिस शर्मा का सख्त सुर: ‘बस आशंका के नाम पर इनकार कैसे?’
इस बिंदु पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने दिल्ली पुलिस से कड़े सवाल पूछे। उन्होंने कहा कि आपने आवेदन खारिज कर दिया? क्यों? क्या इस तरह का आदेश जारी किया जा सकता है? सिर्फ इसलिए कि आपको आशंका है कि कुछ ज्यादा लोग आ सकते हैं? आप ऐसा आदेश कैसे दे सकते हैं?
न्यायमूर्ति शर्मा ने अपनी पिछली सुनवाई का भी हवाला देते हुए कहा कि पिछली तारीख को मैंने स्पष्ट रूप से कहा था कि आप शर्तें और बंदिशें लगा सकते हैं, फिर भी अनुमति दे सकते हैं। प्रदर्शन चंद घंटों के लिए ही है। कुछ शर्तें तय करके अनुमति दे दीजिए। मना कैसे कर सकते हैं?
पुलिस की दलील: ‘इलाका संवेदनशील है’
दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त स्टैंडिंग काउंसल (एएसजी) चेतन शर्मा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत में जुड़े। उन्होंने अपने बचाव में कहा कि हमने सुप्रीम कोर्ट के कुछ दिशानिर्देशों का जिक्र किया है और उसी अनुसार काम कर रहे हैं। जंतर-मंतर संवेदनशील इलाका है। हम दूसरों को भी लगातार अनुमति देने से मना कर रहे हैं।
एएसजी ने जगह की सीमित क्षमता और सोशल मीडिया पर मिल रहे लाइक्स का जिक्र करते हुए कहा कि आयोजन के प्रति दिलचस्पी रखने वालों की संख्या जंतर-मंतर की क्षमता से अधिक हो सकती है।
याचिकाकर्ता का पलटवार
अधिवक्ता धनाई ने पुलिस की दलील को खारिज करते हुए कहा कि लाइव स्ट्रीमिंग के दर्शक सिर्फ दिल्ली से नहीं, बल्कि पूरी दुनिया से हैं। इतने व्यूज देखने वाले लोग जंतर-मंतर पर नहीं आएंगे। जंतर-मंतर ऐतिहासिक रूप से धरना-प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगह है और यहां दिल्ली पुलिस का नियंत्रण बेहतर रहता है।”
अदालत का सवाल
इस बीच, जस्टिस शर्मा ने पुलिस से पूछा कि क्या आप यह भी कह रहे हैं कि स्थान बदल दिया जाए तो अनुमति दे दी जाएगी? एएसजी चेतन शर्मा ने जवाब दिया कि इस पर विचार किया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि जब भी जंतर-मंतर पर कोई बड़ी जुटान होती है, तो पूरे सेंट्रल दिल्ली क्षेत्र पर इसका असर पड़ता है।
जस्टिस शर्मा ने अपने सवाल पर अडिग रहते हुए कहा है कि मैं सिर्फ यह पूछ रही हूं कि पूर्ण प्रतिबंध कैसे लगाया जा सकता है?” अदालत ने पुलिस से पूछा कि क्या बंदिशों के साथ या स्थान बदलकर अनुमति देने पर विचार किया जा सकता है। इस पर एएसजी ने कहा कि वह अगली सुनवाई तक निर्देश लेकर अदालत में पेश होंगे।
अगली सुनवाई 22 सितंबर को
बता दें कि अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 22 सितंबर की तारीख तय की है। अब देखना दिलचस्प होगा कि दिल्ली पुलिस अगली सुनवाई में अदालत के समक्ष क्या रुख अपनाती है और क्या क्षत्रिय करणी सेना को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की इजाजत मिल पाती है।


























