राजस्थान में हाल ही में संपन्न हुए नगर निगम, नगर परिषद और नगर पालिका चुनावों के परिणाम आने के बाद प्रदेश की राजनीति में एक नई बहस छिड़ गई है।
बोर्ड गठन को लेकर पार्षदों को रिसॉर्ट और बसों के जरिए सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करने की प्रक्रिया, जिसे राजनीतिक भाषा में “बाड़ेबंदी” कहा जा रहा है, अब सीधे-सीधे दोनों बड़ी पार्टियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप की जंग का कारण बन गई है।
डोटासरा का सीधा हमला
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए बीजेपी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि राज्य में शासक दल अपने बोर्ड बनाने के लिए सरकारी यंत्र का इस्तेमाल कर रही है।
डोटासरा ने आरोप लगाया कि निर्दलीय पार्षदों को पुलिस के माध्यम से भयभीत किया जा रहा है और उन पर झूठे मुकदमे दर्ज करने की धमकियां दी जा रही हैं।
उन्होंने कहा कि जहां-जहां कांग्रेस के पार्षद ठहरे हुए हैं, वहां पुलिस बल भेजकर उन्हें परेशान किया जा रहा है। उन पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे बीजेपी के पक्ष में चले जाएं। यह लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ है।”
“दो तिहाई जनता ने बीजेपी को ठुकराया”
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने बीजेपी पर एक ऐसी गलत परंपरा शुरू करने का भी आरोप लगाया, जो प्रदेश की राजनीति के लिए हानिकारक साबित होगी।
उन्होंने कहा कि निकाय चुनावों के नतीजे साफ तौर पर बता चुके हैं कि करीब दो तिहाई जनता ने भाजपा को नकार दिया है। ऐसे में जनता के जनादेश की लूट-खसोट करके बोर्ड बनाने की कोशिश जनविरोधी कदम है।
डोटासरा ने आगे दावा किया कि परिणामों में कांग्रेस की उपस्थिति जितनी दिख रही है, उससे कहीं ज्यादा मजबूत है और आने वाले समय में यह और साफ होगी।
डीजीपी को लिखी चिट्ठी, तंज भी कसा
इस मामले में डोटासरा ने राजस्थान के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) से भी अपील की है कि वे पुलिस बल को किसी एक पार्टी का हथियार बनने से रोकें। उन्होंने कड़े शब्दों में चेतावनी भी दी, “पुलिसकर्मियों को यह भी याद रखना चाहिए कि सवा दो साल बाद प्रदेश में सरकार बदलने वाली है। उस समय जनता के सामने उनका रोल क्या रहा, यह गिनाया जाएगा।”
यह बयान राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चित हो रहा है, क्योंकि इसमें कांग्रेस ने साफ तौर पर 2028 के विधानसभा चुनावों का संकेत दे दिया है।
क्या है पूरा मामला? क्यों बरपा है पार्षदों पर दबाव
दरअसल, निकाय चुनावों के नतीजे कई शहरों में इतने उलटपुलट आए हैं कि किसी भी पार्टी को सीधा बहुमत नहीं मिल पाया है। ऐसे में निर्दलीय और छोटे दलों के पार्षद ही वे “राज” बन गए हैं, जिन्हें रिझाने के लिए सभी दल प्रयासरत हैं।
जहां एक ओर पार्टियां पार्षदों को लुभाने के लिए आर्थिक लाभ और अध्यक्ष पद जैसे लालच देने की बातें कही-सुनी जा रही हैं, वहीं कई शहरों से पार्षदों पर दबाव डालने और उन्हें कब्जे में लेने की कोशिशों के आरोप भी सामने आए हैं।
कुछ जगहों पर तो पार्षदों के “अपहरण की कोशिश” की खबरें भी चर्चा में हैं। पुलिस की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं, जिन पर विपक्ष ने निष्पक्षता की मांग की है।
दोनों दलों ने अपने पार्षद किए “सेफ”
बाड़ेबंदी की इस राजनीति से बचने के लिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही ने अपने-अपने निर्वाचित पार्षदों को बसों के जरिए सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया है। रिसॉर्ट और धर्मशालाओं में ठहराए गए इन पार्षदों के संपर्क साधारण कार्यकर्ताओं से भी काट दिए गए हैं। इस पूरी प्रक्रिया को दलीय स्तर पर “पार्षदों की सुरक्षा” बताया जा रहा है, लेकिन आम जनता इसे “आम चुनावों की राजनीति का निकाय चुनावों में आगाज़” मान रही है।
भाजपा का पलटवार
कांग्रेस के आरोपों को भाजपा ने पूरी तरह खारिज कर दिया है। बीजेपी के नेताओं का कहना है कि निकाय चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन उम्मीदों के अनुरूप रहा है और जनता ने स्थानीय मुद्दों पर भाजपा पर भरोसा जताया है। बीजेपी ने कांग्रेस पर उलटा आरोप लगाया है कि हार का सामना करने की बजाय कांग्रेस बहाने बना रही है और पुलिस जैसी संवैधानिक संस्था को बदनाम करने की कोशिश कर रही है। पार्टी का दावा है कि बोर्ड गठन में लोकतांत्रिक तरीके से बहुमत हासिल किया जाएगा।
बोर्ड गठन को लेकर अटकलें तेज
राजस्थान के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि निकाय चुनावों का यह रोमांच अगले कुछ दिनों तक बना रहेगा। मेयर, चेयरमैन और उपाध्यक्ष पदों के लिए होने वाली टक्कर में हर एक पार्षद का वोट करीबी मुकाबले तय करेगा।
ऐसे में बाड़ेबंदी की यह परंपरा, जो पहले केवल विधानसभा और राज्यसभा चुनावों तक सीमित रहती थी, अब निकाय स्तर पर भी चर्चित हो गई है।
जनता के सामने बड़ा सवाल यह भी है कि जिन पार्षदों को लोग अपने शहर की समस्याओं का समाधान करने के लिए चुनकर भेजते हैं, क्या उनकी इस “कैद” के बाद वाकई शहरों के विकास पर ध्यान दिया जा पाएगा?
अगले कुछ दिनों में बनने वाले बोर्ड ही इस सवाल का जवाब देंगे। तब तक राजस्थान की सियासत में आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला थमने के आसार नहीं दिख रहे।


























