संध्या समय न्यूज
UP News : उत्तर प्रदेश की सियासत एक बार फिर कटघरे में खड़ी नज़र आ रही है। 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपनी रणनीतियां घड़ रहे हैं, लेकिन इस बीच राज्य में ब्राह्मण समाज की बढ़ती नाराजगी सत्तारूढ़ भाजपा के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। हाल ही में यूपी पुलिस भर्ती बोर्ड द्वारा आयोजित दरोगा परीक्षा में ‘पंडित’ शब्द को लेकर सामने आए विवाद ने इस असंतोष को उजागर कर दिया है।
परीक्षा में विवादित सवाल, सरकार ने किया डैमेज कंट्रोल
यूपी में 14 और 15 मार्च को आयोजित यूपी सब-इंस्पेक्टर (दरोगा) भर्ती परीक्षा के सामान्य हिंदी प्रश्न पत्र में पूछे गए एक सवाल ने तूफान मचा दिया। प्रश्न में पूछा गया था, ‘अवसर के हिसाब से बदल जाने वाले को क्या कहेंगे?’ इसके विकल्पों में ‘पंडित’, ‘अवसरवादी’, ‘निष्कपट’ और ‘सदाचारी’ दिए गए थे। ‘पंडित’ को एक विकल्प के रूप में रखना और उसे ‘अवसरवादी’ के समानांतर खड़ा करना ब्राह्मण समाज को नागवार गुजरा।
इस मामले में यूपी सरकार को तुरंत नुकसान कंट्रोल करना पड़ा। यूपी उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने साफ शब्दों में कहा कि किसी भी समाज या वर्ग की गरिमा को ठेस पहुंचाना स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने मामले की गंभीरता को स्वीकार करते हुए जांच का आश्वासन दिया। वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी सख्त हिदायत दी है। सीएम योगी ने सभी भर्ती बोर्डों को निर्देश दिया कि भविष्य में किसी भी जाति, पंथ या संप्रदाय की मर्यादा का ध्यान रखे बिना अमर्यादित टिप्पणी वाले सवाल नहीं पूछे जाएं। उन्होंने गलती दोहराने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के आदेश दिए हैं।
एक नहीं, कई घटनाओं से जुड़ा है धागा
यह अलग बात है कि सत्ता पक्ष इसे एक अलग घटना बताकर निपटना चाहता है, लेकिन पिछले कुछ महीनों की घटनाएं एक तस्वीर साफ-साफ दिखाती हैं। चाहे वह फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ का विवाद हो, माघ मेले में बटुक ब्राह्मणों की चोटी खींचने का मामला हो, या फिर ब्राह्मण विधायकों की बैठक पर सख्त चेतावनी का मुद्दा—हर घटना समाज के एक बड़े हिस्से के बीच बैचेनी बढ़ा रही है।
- माघ मेला विवाद: प्रयागराज में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुई घटना ने धार्मिक भावनाओं को आहत किया था। पुलिस प्रशासन द्वारा स्नान के दौरान बटुक ब्राह्मणों की चोटियां खींचने के आरोपों ने आग में घी का काम किया। बाद में डिप्टी सीएम बृजेश पाठक को 100 बटुकों को सम्मानित करके इस नाराजगी को दूर करने की कोशिश करनी पड़ी थी।
- ‘घूसखोर पंडित’ फिल्म:फरवरी 2026 में रिलीज होने वाली फिल्म के टीजर ने भी बवाल मचाया। ब्राह्मण संगठनों ने इसे समाज को बदनाम करने की साजिश बताते हुए जमकर विरोध किया। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद फिल्म का नाम बदलना पड़ा।
- विधायकों की बैठक पर एक्शन: दिसंबर 2025 में ब्राह्मण विधायकों की बैठक को ‘शक्ति प्रदर्शन’ करार देते हुए पार्टी ने सख्त चेतावनी दी। यह भी इस बात का संकेत था कि समाज के प्रतिनिधियों की आवाज उठने पर सियासी दबाव बनाया जा रहा है, जबकि ठाकुर या लोध समुदाय की बैठकों को लेकर इतनी सख्ती नहीं दिखाई गई।
- UGC नियम और इस्तीफा: नए UGC नियमों को लेकर सवर्ण समाज, खासकर ब्राह्मण समुदाय के विरोध ने प्रशासनिक स्तर पर भी दरार पैदा कर दी। बरेली के मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का इस्तीफा इस असंतोष का प्रतीक बन गया।
क्या है राजनीतिक मतलब?
यूपी में ब्राह्मण समाज की आबादी लगभग 10 फीसदी है, लेकिन चुनावी जीत में इसकी अहमियत बहुत ज्यादा है। 2017 के बाद से ही ब्राह्मण समाज की ‘उपेक्षा’ का आरोप बीजेपी पर लगता रहा है। माना जाता है कि 2014 और 2017 में इस समाज ने बीजेपी को जमकर समर्थन दिया, लेकिन बाद में सरकार में ठाकुर नेतृत्व के दबदबे को लेकर चर्चाएं तेज हुईं।
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अब जबकि 2027 का मोड़ सिर पर है, इन लगातार घटनाओं ने बीजेपी की चिंताएं बढ़ा दी हैं। सपा और कांग्रेस इस मौके का फायदा उठाकर बीजेपी को घेरने में जुटे हैं। बीजेपी के अपने विधायक और नेता भी अब खुलकर नाराजगी जता रहे हैं। यदि इस भावनात्मक जुड़ाव को समय रहते ठीक नहीं किया गया, तो यह ‘अवसरवादी’ विवाद सिर्फ एक सवाल नहीं, बल्कि 2027 के लिए एक बड़ा सियासी सवाल बन सकता है।




















