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भारत का अनोखा नवाब, जिसके लिए बिछी थी निजी रेल लाइन

UP Rampur A Unique Story: रामपुर के नौवें नवाब हामिद अली खान ने अपनी सुख-सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए महल खास बाग के भीतर ही एक शाही रेलवे स्टेशन तैयार करवाया था। नवाब को मुख्य रेलवे लाइन तक जाने के लिए महल से बाहर नहीं निकलना पड़ता था।

नवाब हामिद अली खान की लग्जरी ट्रेन की अनसुनी कहानी

HIGHLIGHTS

  • नवाब जिसके घर आती थी ट्रेन
  • रामपुर के नवाब की शाही ट्रेन
  • सीधे महल में करती थी एंट्री
  • रामपुर रियासत की वो शान
  • महल के अंदर स्टेशन और बाहर दुनिया

Rampur Unique Story: आज के दौर में अगर किसी को ट्रेन पकड़नी हो तो उसे घर से निकलकर रेलवे स्टेशन जाना पड़ता है, लेकिन क्या आपको पता है कि भारत के इतिहास में एक ऐसा भी नवाब था, जिसके लिए ट्रेन स्टेशन नहीं, बल्कि ट्रेन सीधे उसके घर आती थी? जी हां, उत्तर प्रदेश की रामपुर रियासत के नवाबों की यह शानो-शौकत आज भी लोगों को हैरान करती है। नवाब हामिद अली खान का आलम यह था कि उन्होंने अपने महल के अंदर ही एक पूरा रेलवे स्टेशन और पटरियां बिछवा रखी थीं। आवागमन के लिए न तो कार की जरूरत थी और न ही बग्घी की, ट्रेन सीधे उनके ड्राइंग रूम तक पहुंचती थी।

महल के भीतर ही बना निजी रेलवे स्टेशन

रामपुर के नौवें नवाब हामिद अली खान ने अपनी सुख-सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए महल खास बाग के भीतर ही एक शाही रेलवे स्टेशन तैयार करवाया था। नवाब को मुख्य रेलवे लाइन तक जाने के लिए महल से बाहर नहीं निकलना पड़ता था। इसके लिए मिलक से रामपुर तक करीब 40 किलोमीटर लंबी एक विशेष रेल लाइन बिछाई गई थी, जो सीधे उनके महल को मुख्य रेल नेटवर्क से जोड़ती थी। इस शाही स्टेशन और रेल लाइन के निर्माण पर उस दौर में इतना खर्च आया था, जिसकी अनुमानित कीमत आज के समय के अनुसार लगभग 113 करोड़ रुपये आंकी जाती है। यह उस दौर की बेमिसाल इंजीनियरिंग और शाही विलासिता का जीता-जागता सबूत था।

पटरी पर चलता फिरता महल था ‘द सैलून’

यह कोई साधारण रेल सेवा नहीं थी, बल्कि नवाब की निजी पहुंच का प्रतीक थी। साल 1925 में नवाब ने अपने लिए एक विशेष शाही ट्रेन का निर्माण करवाया, जिसे ‘द सैलून’ के नाम से जाना गया। यह महज लोहे का डिब्बा नहीं था, बल्कि पटरी पर चलता हुआ एक चलता-फिरता महल था।

इस शाही ट्रेन की कुछ खासियतें:

  • आलीशान बेडरूम: नवाब की आरामदायक नींद के लिए बेहद शानदार बेडरूम था।
  • डाइनिंग और किचन: ताजा और शाही खाना बनाने के लिए अलग किचन और खाना खाने के लिए भव्य डाइनिंग रूम।
  • मनोरंजन कक्ष: नवाब के मनोरंजन के लिए अलग कमरा, जिसमें फारसी कालीन बिछे थे और कीमती लकड़ी का फर्नीचर लगा था।

नवाब जब भी किसी यात्रा पर निकलते या वापस लौटते, तो ट्रेन सीधे महल के प्रांगण में प्रवेश करती थी।

बंटवारे के दौरान बनी अमन की सवारी

19 जून 1930 को नवाब हामिद अली खान के निधन के बाद रामपुर रियासत की बागडोर उनके बेटे नवाब रजा अली खान के हाथों में आई। रजा अली खान ने न केवल अपने पिता की इस शाही विरासत को संभाला, बल्कि मानवता की भी मिसाल कायम की। 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ और सांप्रदायिक तनाव चरम पर था, तब नवाब रजा अली खान ने अपनी इसी निजी शाही ट्रेन का इस्तेमाल शरणार्थियों और परेशान लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के लिए किया। वह ट्रेन जो एक समय नवाब के विलास का साधन थी, बंटवारे के दौरान लोगों की जान बचाने का सहारा बन गई।

अब सिर्फ इतिहास के पन्नों में बचे निशान

समय बदलने और राजशाही के अंत के साथ ही यह निजी रेलवे स्टेशन और शाही ट्रेन भी इतिहास के पन्नों में खो गए। देश के आजाद होने और रियासतों के विलय के बाद रखरखाव के अभाव और बदलती जरूरतों के कारण यह विशेष रेल सेवा बंद हो गई। आज रामपुर के उस भव्य स्टेशन के केवल अवशेष बचे हैं और ‘द सैलून’ की कहानियां सिर्फ पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को भारत के रजवाड़ों की उस जादुई दुनिया की याद दिलाती हैं, जहां राजाओं के शौक की कोई सीमा नहीं थी।

Rishi Tiwari

ऋषी तिवारी (Rishi Tiwari) वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली एनसीआर में एपीएनएस न्यूज ऐजेंसी लंबे समय तक सेवाएं देने के पश्चात सेवानिवृत्त हुए। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ अपनी नई पत्रकारिता पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षो से जुड़े रहकर निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ा रहे हैं।

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