Iran-US/Israel War and India Strategic Gains: पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) इस वक्त आग के गोले में तब्दील हो चुका है। इजरायल और अमेरिका के हमले में ईरान में भयानक तबाही मची है, जबकि दूसरी तरफ ईरान के जवाबी हमलों ने पूरे क्षेत्र को दहला दिया है। 28 फरवरी को शुरू हुए इस जंग को एक माह से अधिक का समय हो गया है और अभी इसके खत्म होने के कोई ठोस आसार नजर नहीं आ रहे हैं।
ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने के बाद दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें 50 से 60 फीसदी तक उछलकर 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। इसके चलते पूरी दुनिया भयंकर महंगाई की चपेट में आ गई है और भारत जैसे तेल आयातक देशों की चिंताएं भी बढ़ी हैं। लेकिन, हर संकट में कोई न कोई अवसर छिपा होता है।
इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे इस भयंकर युद्ध में भारत को भी रणनीतिक तौर पर 7 बड़े फायदे दिख रहे हैं:
1. अमेरिकी बादशाहत को सीधी चुनौती
इस जंग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि दुनिया अब ‘यूनिपोलर’ (एकल शक्ति) नहीं रही। कुछ समय पहले तक सामरिक विशेषज्ञ अमेरिका को दुनिया का एकमात्र बादशाह मान रहे थे। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को उठाने और अन्य मुद्दों पर डोनाल्ड ट्रंप की हरकतों ने इसे पुख्ता किया था। लेकिन, ईरान जंग ने अमेरिका और इजरायल के गुरूर को तोड़ दिया है। ईरान में भारी तबाही मचाने के बावजूद अमेरिका जीत का दावा नहीं कर सकता। नाटो देशों ने खुलेआम अमेरिकी नीति की आलोचना की है। भारत के लिए यह फायदेमंद है, क्योंकि अमेरिका अक्सर भारत-पाक, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे क्षेत्रीय मुद्दों पर अनावश्यक दखल देता रहा है।
2. डोनाल्ड ट्रंप का कमजोर पड़ना
ईरान युद्ध के कारण अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता तेजी से घटी है। ‘नो किंग’ प्रोटेस्ट की सफलता ने उनके गुरूर पर बड़ा वार किया है, जिससे अमेरिका के रुख में नरमी आई है। ट्रंप का कमजोर पड़ना भारत के लिए अहम है, क्योंकि सत्ता का नशा उन पर सिर चढ़कर बोल रहा था। भारत पर भारी टैरिफ लगाने और रूस से तेल नहीं खरीदने के लिए दबाव बनाने वाले ट्रंप का अप्रूवल रेटिंग गिरना भारत को नैतिक और रणनीतिक तौर पर ताकत देता है।

3. 7 साल बाद ईरान से तेल खरीद का रास्ता साफ
इस जंग का भारत के लिए सबसे बड़ा आर्थिक फायदा ईरान के साथ रिश्तों में सुधार है। अमेरिकी दबाव के चलते भारत ने 2019 से ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था। लेकिन अब भारत ने 7 साल बाद पहली बार ईरान से तेल की खरीद शुरू की है। ईरान का तेल बेहतर गुणवत्ता का होता है, ग्लोबल मार्केट रेट से सस्ता मिलता है और ढुलाई व बीमा खर्च भी कम आता है। ईरानी तेल से लदा पहला जहाज गुजरात के वाडिनार बंदरगाह की ओर रवाना हो चुका है।
4. चाबहार बंदरगाह परियोजना में तेजी
अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत को ईरान में विकसित कर रहे ‘चाबहार बंदरगाह’ प्रोजेक्ट को लेकर भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन जैसे-जैसे अमेरिका का दबाव कम होगा और ईरान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन बढ़ेगा, भारत इस रणनीतिक बंदरगाह को लेकर तेजी से काम कर सकेगा। यह बंदरगाह भारत को पाकिस्तान और चीन की नजरअंदाज करते हुए मध्य एशिया तक पहुंचने का रास्ता देगा।
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5. ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति की सफलता
भारत की पिछले कुछ वर्षों की ‘सभी के साथ, सभी के लिए’ की नीति इस संकट में साबित हो रही है। भारत अमेरिका और इजरायल का सामरिक साझेदार है, लेकिन उसने ईरान के खिलाफ खुलकर बयानबाजी नहीं की। इससे भारत ने यह साबित किया कि वह किसी एक देश के दबाव में आकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति नहीं बदलेगा।
6. डॉलर के वर्चस्व को चुनौती (रुपया-रियाल ट्रेड)
ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण दोनों देशों के बीच डॉलर में लेन-देन बंद था। लेकिन तेल खरीद के नए समझौते से ‘रुपया-रियाल’ व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। अन्य देशों के साथ मिलकर डॉलर से परे व्यापार करने की भारत की पुरानी मांग इस संकट से और मजबूत हो सकती है।
7. घरेलू ऊर्जा सुरक्षा का अहसास
होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण जलडमरू के बंद होने और तेल के दाम बढ़ने ने भारत को एक बार फिर चेतावनी दी है कि ऊर्जा के मामले में किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता घातक हो सकती है। यह संकट भारत को घरेलू ऑयल एंड गैस खोज, नवीकरणीय ऊर्जा (सौर और पवन ऊर्जा) और इलेक्ट्रिक वाहनों के क्षेत्र में नीतिगत तौर पर और तेजी से निवेश करने के लिए मजबूर करेगा, जो लंबी अवधि में भारत के लिए फायदेमंद साबित होगा।
ईरान-अमेरिका जंग ने निश्चित रूप से वैश्विक अर्थव्यवस्था को खतरे में डाला है और भारत जैसे विकासशील देशों के लिए महंगाई एक बड़ी चुनौती है। लेकिन, भू-राजनीति के बड़े शतरंज के बोर्ड पर यह संकट भारत को अमेरिकी दबाव से मुक्ति और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को नई दिशा देने का एक सुनहरा मौका दे रहा है।






















