Rajsthan News: राजस्थान की संस्कृति और वन्यजीव सुरक्षा के बीच एक नया विवाद सामने आया है। जयपुर में एक रूसी ट्रैवल आर्ट फोटोग्राफर द्वारा 65 साल की हथिनी ‘चंचल’ को गुलाबी रंगा और उस पर मॉडल बिठाकर किए गए फोटोशूट ने तूल पकड़ लिया है। इस फोटोशूट की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं, जहां लोगों ने इसे जानवरों के साथ अत्याचार बताते हुए कड़ी नाराजगी जताई है। विवाद इसलिए और बढ़ गया क्योंकि इस फोटोशूट के कुछ समय बाद ही हथिनी की मौत हो गई।
मौत प्राकृतिक थी या रंग का असर?
हाथी गांव विकास समिति के अध्यक्ष बल्लू खान ने इस पूरे मामले पर सफाई देते हुए कहा कि हाथी को किसी तरह के केमिकल या सिंथेटिक रंग नहीं, बल्कि गुलाल (प्राकृतिक रंग) से रंगा गया था, जिसे कुछ देर बाद ही पूरी तरह से धो दिया गया था। वहीं, जयपुर हाथी एसोसिएशन ने भी स्पष्ट किया कि 65 वर्षीय हथिनी चंचल की मौत बूढ़ापे के कारण प्राकृतिक थी और इसका फोटोशूट या रंग से कोई लेना-देना नहीं है।
हालांकि, पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने इन सफाइयों को खारिज करते हुए इस पूरे मामले की जांच और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग उठाई है।
सोशल मीडिया पर भड़का गुस्सा
वायरल तस्वीरों पर जहां कुछ लोगों ने फोटोग्राफी की तारीफ की, वहीं बड़ी संख्या में यूजर्स ने वन्यजीवों के साथ इस तरह के व्यवहार को शर्मनाक बताया। एक यूजर ने लिखा कि तस्वीरों को सुंदर दिखाने के लिए किसी जीव को तकलीफ देना बिल्कुल गलत है। अगर ऐसी कलाकृति बनानी ही थी, तो इसके लिए AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का इस्तेमाल किया जा सकता था।
दूसरे यूजर ने सवाल उठाते हुए कहा कि ऑर्गेनिक रंग होने का मतलब यह नहीं कि पूरे जानवर को उसमें डुबो दिया जाए। हाथियों की त्वचा बहुत संवेदनशील होती है, इससे उन्हें एलर्जी या इंफेक्शन हो सकता है।
फोटोग्राफर ने दी अपनी सफाई, बताई पूरी कहानी
विवाद बढ़ने के बाद रूसी फोटोग्राफर जूलिया बुरुलेवा सामने आई। उन्होंने बताया कि उन्होंने यह शूट जयपुर की झलक पकड़ने के लिए किया था। जूलिया ने कहा कि जयपुर गुलाबी शहर है और यहां हाथी हर जगह—सड़कों पर, सजावट में और वास्तुकला में नजर आते हैं। यह राजस्थान का प्रतीक है। मेरा आइडिया क्लासिक राजस्थानी गेट्स के सामने एक गुलाबी हाथी लेने का था।
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उन्होंने बताया कि त्योहारों में स्थानीय लोग हाथियों को अलग-अलग रंगों से सजाते हैं, उन्होंने भी वैसा ही किया। जूलिया ने दावा किया कि कई हाथी फार्म्स के दौरे के बाद उन्होंने इस शूट के लिए सबसे समझदार मैनेजर को चुना और उन्होंने जानवर के लिए पूरी तरह सुरक्षित, स्थानीय ऑर्गेनिक पेंट का इस्तेमाल किया।
एक तरफा मॉडल ढूंढना भी थी चुनौती
जूलिया ने बताया कि फोटोशूट के लिए एक परित्यक्त गणेश मंदिर (हाथी के सिर वाले भगवान) को लोकेशन के तौर पर चुना गया, ताकि वहां सरकारी परमिशन की भनक न लगे और मॉर्निंग लाइट भी अच्छी मिले। मॉडल ढूंढना भी आसान नहीं था। उन्होंने दर्जनों मॉडल्स को मैसेज किया, लेकिन भारतीय समाज में आधे कपड़ों और गुलाबी रंग में पेंट होकर शूट करने से लोगों ने मना कर दिया। आखिरकार एक बहादुर मॉडल ‘यशस्वी’ ने इसके लिए हामी भरी और फरवरी में यह शूट पूरा किया गया।
कला या अत्याचार?
अब सवाल यह है कि क्या कला के नाम पर जानवरों को इस तरह से इस्तेमाल करना जायज है? हालांकि फोटोग्राफर और हाथी मालिकों का कहना है कि कोई नुकसान नहीं हुआ, लेकिन पर्यावरणविदों का मानना है कि वन्यजीवों को इस तरह के फोटोशूट और मनोरंजन के लिए इस्तेमाल करना उनके प्राकृतिक वातावरण से छेड़छाड़ है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। वहीं, प्रशासन के हस्तक्षेप का इंतजार किया जा रहा है।

















