US-Iran Talks: अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनावपूर्ण दौर में कूटनीतिक रस्साकशी एक बार फिर तेज हो गई है। 41 घंटे तक चली पहले दौर की असफल वार्ता के बाद, दोनों पक्षों ने दूसरे राउंड की बातचीत के लिए हामी भर दी है। डिप्लोमैटिक सूत्रों के मुताबिक, जल्द ही पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दोनों देशों के प्रतिनिधि आमने-सामने बैठ सकते हैं। इस बीच खबरें हैं कि दोनों देशों के बीच मौजूदा सीजफायर को दो हफ्ते और बढ़ाने पर भी विचार किया जा रहा है।
ट्रंप का दावा- ‘समझौते के करीब हैं दोनों देश’
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर आशावाद जताते हुए दावा किया है कि दोनों देश समझौते के बहुत करीब हैं और अगले कुछ दिनों में बड़ी प्रगति देखने को मिल सकती है। वहीं, अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी माना कि भले ही दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास है, लेकिन बातचीत से इसे कम किया जा सकता है।
हालांकि, पहले दौर की वार्ता जिस तरह बिना किसी नतीजे के समाप्त हुई, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि रास्ते आसान नहीं हैं। अमेरिका ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज स्ट्रेट में उसकी रणनीति को सबसे बड़ा मुद्दा बताया, जबकि ईरान ने अमेरिकी शर्तों को ही नाकामयाबी का जिम्मेदार ठहराया।
ट्रंप प्रशासन की 10 बड़ी और कड़ी शर्तें
सूत्रों के अनुसार, अमेरिका ने शांति वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए ईरान के सामने 10 कड़ी शर्तें रखी हैं, जो तेहरान की संप्रभुता और रणनीतिक ताकत से सीधे जुड़ी हैं:
- परमाणु ठिकानों की जांच: ईरान के सभी परमाणु ठिकानों पर अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण को पूरी छूट देना।
- यूरेनियम सौंपना: 440 किलो एनरिच्ड यूरेनियम अमेरिका को सौंपना और संवर्धन (Enrichment) कार्यक्रम को पूरी तरह बंद करना।
- मिसाइल भंडार: सभी तरह की मिसाइलों के भंडार का पूरा विवरण सार्वजनिक करना।
- ICBMs पर रोक: लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBMs) पर पूर्ण नियंत्रण लगाना।
- होर्मुज स्ट्रेट से नियंत्रण हटाना: होर्मुज जलडमरू पर अपना नियंत्रण खत्म करना और इसे अंतरराष्ट्रीय मार्ग मानना।
- प्रॉक्सी नेटवर्क खत्म करना: हिज्बुल्लाह, हमास और हूती जैसे अपने समर्थित सशस्त्र संगठनों को पूरी तरह से खत्म करना।
- IRGC और बासिज भंग करना: इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) और बासिज मिलिशिया को भंग करना।
- अब्राहम समझौते पर हस्ताक्षर: इजरायल के साथ ‘अब्राहम एकॉर्ड्स’ पर दस्तखत करना।
- जनवरी नरसंहार के दोषियों को सजा: जनवरी माह में हुए नरसंहार के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देना।
- होर्मुज को अंतरराष्ट्रीय मार्ग की मान्यता: होर्मुज स्ट्रेट को आधिकारिक तौर पर अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग के रूप में स्वीकार करना।
तेहरान का रुख: ‘कोई सरेंडर नहीं, लेकिन युद्ध भी नहीं’
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के लिए इन 10 शर्तों पर राजी होना लगभग नामुमकिन है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने साफ किया है कि उनका देश युद्ध नहीं चाहता, लेकिन किसी भी तरह का दबाव या आत्मसमर्पण (सरेंडर) बिल्कुल स्वीकार नहीं करेगा। भारत में ईरानी राजदूत मो. फतहली ने भी स्थायी समाधान की वकालत करते हुए चेतावनी दी है कि यदि दबाव जारी रहा तो तेहरान ‘सभी विकल्पों’ के लिए तैयार है।
ईरान भी बातचीत में खाली हाथ नहीं बैठा है। तेहरान की मांगों में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाना, फ्रीज की गई संपत्तियों को वापस देना, अमेरिका से हमला न करने की लिखित गारंटी और युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा शामिल है। ईरान ने फ्रांस समेत कई देशों से कूटनीतिक संपर्क भी साधे हैं।
परमाणु मुद्दे पर गतिरोध और पुतिन का ‘मिडिल ग्राउंड’
सबसे बड़ा विवाद ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अगले 20 साल तक यूरेनियम संवर्धन बंद कर दे और 440 किलो स्टॉक सौंप दे, जिसे ईरान ने सिरे से खारिज कर दिया है। तेहरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम शांतिपूर्ण है और ऊर्जा जरूरतों के लिए है। हालांकि, ईरान कुछ वर्षों के लिए संवर्धन पर रोक लगाने जैसे मिडिल ग्राउंड पर विचार कर सकता है।
इस गतिरोध को तोड़ने के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का एक प्रस्ताव काफी चर्चा में है। पुतिन के मुताबिक, ईरान अपना एनरिच्ड यूरेनियम रूस को सौंप सकता है। रूस उसे प्रोसेस करके परमाणु ईंधन के रूप में ईरान को वापस कर देगा। इससे ईरान की ऊर्जा जरूरतें पूरी होंगी और अमेरिका की परमाणु हथियार बनाने को लेकर चिंता भी दूर हो सकती है।





















