संध्या समय न्यूल
प्रशासनिक शासन के समापन के बाद जनता के जनादेश से सत्ता में लौटी मीरा-भाईंदर महानगरपालिका (एमबीएमसी) की पहली ही आमसभा राजनीतिक तल्खी और टकराव का अखाड़ा बन गई। बुधवार को आयोजित इस बैठक में ‘बहुमत’ और ‘मर्यादा’ के बीच जो खाई दिखी, उसने आने वाले दिनों में सदन की राजनीति का अंदाजा साफ कर दिया।
सदन में ‘कुर्सी’ के लिए हंगामा
सदन की कार्यवाही की शुरुआत से पहले ही विपक्ष और सत्ता के बीच ‘आसन व्यवस्था’ को लेकर विवाद फैल गया। कांग्रेस और शिवसेना के गठबंधन के विपक्षी पार्षदों ने महापौर के आसन के सामने उन्हें बैठने की जगह न दिए जाने पर जमकर आपत्ति जताई। विपक्ष का आरोप था कि उन्हें एक कोने में दो-दो की जोड़ियों में बैठाया गया है, जबकि परंपरा के अनुसार उन्हें आगे की पंक्तियों में स्थान दिया जाना था। विरोध स्वरूप सभी 16 विपक्षी पार्षदों ने सदन की कुर्सियों का बहिष्कार करते हुए जमीन पर बैठकर नारेबाजी शुरू कर दी। उन्होंने इसे ‘राजनीतिक अपमान’ बताते हुए सत्ता पक्ष पर लोकतांत्रिक परंपराओं को कुचलने का आरोप लगाया।

‘बहुमत के दम पर तानाशाही’: विपक्ष
कांग्रेस-शिवसेना के गट नेता जय ठाकुर ने सत्तारूढ़ भाजपा पर तानाशाही करने का सीधा आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “विधानसभा और संसद में विपक्ष को पीठासीन अधिकारी के सामने बैठने की व्यवस्था होती है, लेकिन यहां बहुमत के दम पर भाजपा तानाशाही की शुरुआत कर रही है। यह केवल कुर्सी का मुद्दा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं और सम्मान का सवाल है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर अगली आमसभा से पहले आसन व्यवस्था सुधारी नहीं गई, तो वे फिर से जमीन पर बैठकर विरोध दर्ज कराएंगे। हालांकि, महापौर द्वारा आश्वासन दिए जाने के बाद पार्षदों ने बाद में अपना आसन ग्रहण किया।
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‘राजनीतिक नौटंकी’: सत्ता पक्ष
विपक्ष के इस प्रदर्शन को लेकर सत्ता पक्ष भी पीछे नहीं रहा। भाजपा के गट नेता हसमुख गहलोत ने इसे ‘राजनीतिक नौटंकी’ करार दिया। उन्होंने कहा, “विपक्ष ने खुद महापौर और जनता का अपमान किया है। बैठने की व्यवस्था प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत की गई थी। उन्हें बार-बार कुर्सी पर बैठने का अनुरोध किया गया, लेकिन उन्होंने जानबूझकर हंगामा किया।”
संख्या बल का समीकरण और भविष्य की राजनीति
सदन में सत्तारूढ़ भाजपा के पास 79 पार्षदों का भारी बहुमत है, जबकि विपक्ष में कांग्रेस-शिवसेना गठबंधन के केवल 16 पार्षद हैं। इस विशाल अंतर के बावजूद विपक्ष द्वारा पहले ही दिन सड़क पर उतरने जैसा माहौल बनाना संकेत देता है कि वे बहुमत की चक्की में पिसने के बजाय ‘लोकतंत्र की आवाज’ बनकर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं।
पहली ही आमसभा में गरमाए माहौल ने साफ संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में एमबीएमसी सदन की कार्यवाही तल्ख बहसों और राजनीतिक उठापटक से गुजरने वाली है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अगली आमसभा तक सत्ता विपक्ष को जगह देने को तैयार होती है या फिर मीरा-भाईंदर की राजनीति में यह ‘कुर्सी युद्ध’ और तीखा होता चला जाएगा।




















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