Keralam Rahul Gandhi Double Standards: केरल की सियासत में इन दिनों एक नया विवाद गर्माया हुआ है, जिसने राज्य की पॉलिटिकल गलियों से लेकर दिल्ली तक की सरगर्मियों को अपनी चपेट में ले लिया है। मामला कांग्रेस नीत सरकार द्वारा एक बड़े प्रशासनिक फैसले को लेकर है, जिस पर भाजपा (BJP) ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को उनके ही पुराने बयानों के आईने में दिखाने की कोशिश की है। भाजपा ने कांग्रेस पर ‘दोहरा चरित्र’ रखने का आरोप लगाते हुए पूछा है कि जो काम भाजपा शासित राज्यों में ‘लोकतंत्र का हनन’ है, क्या वही काम केरल में ‘पुरस्कार’ बन जाता है?
दरअसल, केरल की नवगठित कांग्रेस सरकार ने राज्य के पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) रतन यू. केलकर को मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन का सचिव नियुक्त किया है। यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब देश में चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ दलों के बीच कथित रिश्तों को लेकर सियासी तापमान बहुत ऊंचा है।
कर्नाटक विवाद और राहुल गांधी का ‘चोरी-इनाम’ वाला बयान
यह विवाद सीधे तौर पर हाल ही में कर्नाटक में हुई एक घटना से जुड़ा है। बीते दिनों कर्नाटक की भाजपा सरकार ने राज्य के पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल को मुख्य सचिव के पद पर नियुक्त किया था। इस नियुक्ति पर जमकर विपक्ष ने हमला बोला था। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने इसे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर हमला बताया था।
लेकिन सबसे तीखी प्रतिक्रिया तब आई थी, जब लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस पर तीखी टिप्पणी की थी। राहुल गांधी ने भाजपा और चुनाव आयोग के बीच मिलीभगत का आरोप लगाते हुए कहा था, “चोरी जितनी बड़ी, इनाम भी उतना ही बड़ा।” उनका इशारा सीधे तौर पर उस नियुक्ति की ओर था, जिसे वे भाजपा को चुनावी फायदा पहुंचाने का एक तरीका मान रहे थे। उस समय कांग्रेस ने इसे लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन करार दिया था।
केरल में उल्टा खेल: अब कांग्रेस पर आरोप
अब जबकि केरल में कांग्रेस की ही सरकार ने एक समान कदम उठाया है, तो भाजपा ने मौके को नहीं गंवाया है। 2003 बैच के आईएएस अधिकारी रतन यू. केलकर, जिन्होंने केरल विधानसभा चुनावों के दौरान मुख्य चुनाव अधिकारी के रूप में चुनावी प्रक्रिया की कमान संभाली थी, को अब नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन का सचिव नियुक्त किया गया है।
भाजपा का तर्क है कि अगर कर्नाटक में पूर्व सीईओ की नियुक्ति ‘चोरी का इनाम’ थी, तो क्या केरल में यह नियुक्ति ‘ईमानदारी का पुरस्कार’ है? भाजपा ने सवाल उठाया है कि क्या चुनाव आयोग के पद पर रहते हुए किए गए कामों के लिए यह इनाम दिया जा रहा है, जैसा कि उन्होंने कर्नाटक में भाजपा पर आरोप लगाया था?
भाजपा नेताओं का हमला: पाखंड और दोहरा मापदंड
भाजपा के वरिष्ठ नेता और केरल प्रभारी के. सुरेंद्रन ने इस मामले में कांग्रेस को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर कर कांग्रेस को ‘पाखंडी’ करार दिया है। उनका कहना है कि कांग्रेस के लिए नैतिकता और सिद्धांत सत्ता के साथ बदलते हैं। जब भाजपा ऐसा करती है, तो वे लोकतंत्र बचाने की बात करते हैं, और जब वे खुद ऐसा करते हैं तो इसे ‘प्रशासनिक फैसला’ कहते हैं।
वहीं, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर लंबा-चौड़ा हमला बोला है। अमित मालवीय ने लिखा है, “अब इसकी तुलना कांग्रेस शासित केरल से करें।” उन्होंने सवालिया लहजे में पूछा कि क्या रतन यू. केलकर राज्य के सबसे वरिष्ठ अधिकारी हैं? उन्हें मुख्यमंत्री का सचिव क्यों बनाया गया?
अमित मालवीय ने आगे कहा, “एक ऐसा पद जिसके लिए संस्थागत निष्पक्षता और स्वतंत्रता सबसे अधिक आवश्यक है, वहां यह नियुक्ति संदेह पैदा करती है।” उन्होंने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए पूछा, “अब राहुल गांधी का संस्थागत मर्यादा का उपदेश कहां चला गया? क्या उनका आक्रोश पूरी तरह से सत्ता में मौजूद पार्टी पर निर्भर करता है?” भाजपा नेताओं का तर्क है कि जिस अधिकारी ने चुनाव कराए हों, उन्हें तत्काल सत्ताधारी दल के एक राजनीतिक पद (जैसे सीएम का सचिव) पर नियुक्त करना निष्पक्षता के सवालों को जन्म देता है।
चेन्निथला का बचाव: सरकार का विशेषाधिकार
भाजपा के लगातार हमलों के बीच केरल सरकार में मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला मैदान में उतरे हैं। उन्होंने इस नियुक्ति का बचाव करते हुए कहा है कि सरकार के पास सक्षम अधिकारियों को महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर नियुक्त करने का पूरा अधिकार है।
चेन्निथला ने मीडिया से बातचीत में कहा, “रतन यू. केलकर को मुख्यमंत्री का सचिव बनाना सरकार का विशेषाधिकार है।” उन्होंने कहा कि केलकर एक बेहद योग्य और अनुभवी अधिकारी हैं, और उनकी नियुक्ति में कुछ भी असामान्य नहीं है। उनका कहना था कि प्रशासनिक कामकाज को सुचारू रूप से चलाने के लिए ऐसी नियुक्तियां जरूरी होती हैं और इसे राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।
दलबदल की राजनीति या नीति का तकाजा?
यह पूरा विवाद भारतीय राजनीति के उस पक्ष को उजागर करता है, जहां विपक्ष और सत्ता पक्ष की भूमिकाएं बदलने के साथ ही तर्क भी बदल जाते हैं। जब पश्चिम बंगाल या कर्नाटक में ऐसी खबरें आती हैं, तो कांग्रेस इसे ‘संवैधानिक संकट’ का नाम देती है, लेकिन जब वे खुद सत्ता में होते हैं, तो ‘विशेषज्ञता’ का हवाला देते हैं।
भाजपा ने सवाल उठाया है कि क्या इसे लोकतंत्र की खूबसूरती कहा जाएगा? जब दस दिन पहले राहुल गांधी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को ‘चोरी का इनाम’ कह रहे थे, तो अब चुप्पी क्यों है? क्या यह चुप्पी इस बात का सबूत है कि उनका विरोध केवल भाजपा विरोधी एजेंडे तक सीमित है, न कि लोकतांत्रिक मूल्यों तक?
अब देखना यह है कि क्या कांग्रेस इस आरोप-प्रत्यारोप के बीच अपना पक्ष मजबूती से रख पाती है या भाजपा इस मुद्दे को आगे चलकर बड़ा सियासी हथियार बनाती है। फिलहाल, केरल में इस नियुक्ति ने सियासत के पारदर्शिता के सवाल पर एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है।
























