संध्या समय न्यूज
Mumbai Thane Air Quality Issue: देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और ठाणे की वायु गुणवत्ता लगातार बिगड़ते जा रही है। बढ़ते प्रदूषण के बीच सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति अभय ओक ने एक गंभीर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा है कि अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो अगले कुछ वर्षों में मुंबई और ठाणे की हवा भी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की तरह जहरीली हो जाएगी।
वायु की गुणवत्ता बनाम अस्तित्व की लड़ाई
ठाणे में आयोजित एक विशेष संवाद कार्यक्रम के दौरान न्यायमूर्ति ओक ने पर्यावरण संरक्षण को अब केवल एक मुद्दा नहीं, बल्कि अस्तित्व का सवाल बताया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “अगर हमें स्वच्छ वातावरण में सांस लेना है, तो हमें अपनी मानसिकता और सामाजिक आदतों को बदलना होगा। लोगों की सोच और प्रशासनिक ढिलाई ही इस बिगड़ते पर्यावरण के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।”
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निर्णायक 5 वर्ष: वापसी का कोई रास्ता नहीं
न्यायमूर्ति ओक ने आगाह किया कि आने वाले 4 से 5 वर्ष मुुंबई और ठाणे के भविष्य के लिए अत्यंत निर्णायक साबित होंगे। उन्होंने कहा, “अगर इस अवधि में वायु और ध्वनि प्रदूषण को लेकर जमीनी स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो प्रदूषण का स्तर उस खतरनाक सीमा को पार कर जाएगा, जहां से वापसी संभव नहीं होगी।” उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया कि वे मूकदर्शक बने रहने के बजाय प्रशासन से कड़े सवाल पूछें, क्योंकि नागरिकों की चुप्पी ही अधिकारियों को गैर-जिम्मेदार बनाती है।
त्योहारों और राजनीति का दुष्चक्र
अपने संबोधन में न्यायमूर्ति ओक ने धार्मिक कार्यक्रमों और सार्वजनिक उत्सवों के दौरान प्रदूषण नियमों की अनदेखी पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कई बार राजनीतिक संरक्षण के कारण प्रशासन इन उल्लंघनों पर आंखें मूंद लेता है, जिसका खामियाजा आम नागरिकों को अपनी सेहत के रूप में चुकाना पड़ता है। उन्होंने स्वच्छ वातावरण में सांस लेने को हर नागरिक का मौलिक अधिकार बताया।
“प्रदूषण सिर्फ हवा में नहीं, विचारों में भी”
कानूनी पहलुओं पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि देश में प्रदूषण रोकने के लिए कानूनों की कमी नहीं, बल्कि उनके प्रभावी कार्यान्वयन की कमी है। उन्होंने एक बहुत ही मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा, “प्रदूषण अब केवल वातावरण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह लोगों के विचारों में भी घर कर गया है।” उन्होंने दुख व्यक्त किया कि पर्यावरण की रक्षा के लिए अदालतों में लड़ने वाले कार्यकर्ताओं को समाज समर्थन के बजाय आलोचना का सामना करना पड़ता है।
न्यायपालिका की भूमिका और ईमानदारी
अपने न्यायिक अनुभव को साझा करते हुए न्यायमूर्ति ओक ने न्यायाधीशों से अपील की कि उन्हें कभी भी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि यह निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय जैसे संस्थान में जिम्मेदारी बहुत बड़ी होती है और पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर न्यायपालिका को सक्रिय भूमिका निभानी होगी, ताकि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण विरासत में मिल सके।

























