Tantric Ritual Power: महाराष्ट्र की मिट्टी ने ज्ञान और विज्ञान के अग्रदूत पैदा किए, लेकिन आज वहीं ‘राजज्योतिषी’ और तांत्रिक कर्मकांड सत्ता के केंद्र में बैठे हैं। अशोक खरात जैसे शख्स का सियासी दरबार में पनपना सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि अंधविश्वास को राजसत्ता से जोड़ने की खतरनाक मानसिकता का परिचायक है।
फडणवीस मंत्रिमंडल के अधिकांश मंत्रियों और विधायकों को खानदेश की संत कवयित्री बहिणाबाई चौधरी का नाम शायद ही पता होगा। बहिणाबाई ने स्कूली शिक्षा तो नहीं पाई, लेकिन जीवन के दर्शन उन्होंने अपनी कविताओं से सिखाए। अनपढ़ होने के बावजूद वे कभी अंधविश्वास के जाल में नहीं फंसीं। वे ज्योतिषियों को अपने दरवाजे पर नहीं आने देती थीं और कहती थीं— “मेरा भाग्य मुझे पता है, मेरा हाथ मत देख!” उनका मानना था कि हथेली की रेखाएं नहीं, बल्कि मनुष्य का परिश्रम ही उसका भाग्य लिखता है।
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लेकिन विडंबना यह है कि जिस महाराष्ट्र में महात्मा फुले, डॉ. आंबेडकर, संत गाडगेबाबा और बहिणाबाई जैसे प्रबोधनकारों ने जन्म लिया, उसी महाराष्ट्र में अशोक खरात नाम का एक ‘राजज्योतिषी’ तैयार हो गया। वह महाराष्ट्र के अनगिनत मंत्रियों और राजनीतिक जागीरदारों का पारिवारिक मित्र, मार्गदर्शक और दिशा-निर्देशक बन बैठा। आज खरात को उसके कारनामों के चलते गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि ज्योतिष, अघोरी धार्मिक अनुष्ठान और भविष्य दिखाने के नाम पर उसने कई महिलाओं का शोषण किया, जो भयानक है।
सत्ता का चरण-दासत्व
अपना भविष्य बनाने के लिए राज्य मंत्रिमंडल के रसूखदार लोग खरात के दरबार में हाजिरी लगाते थे। मुख्यमंत्री से लेकर उप मुख्यमंत्री और राज्य महिला आयोग की अध्यक्षा तक इसमें शामिल थे। खरात बुवा के चरण धोने का काम महिला आयोग की अध्यक्षा ने किया और उन्हीं बुवा ने अनगिनत महिलाओं का जीवन बर्बाद कर दिया। पुलिस ने खरात को अब पकड़ लिया, लेकिन देश के गृह मंत्री अमित शाह से लेकर सत्ता पक्ष के कई बड़े नेता इस बुवा के प्रशंसक थे। यदि यह कार्रवाई समय पर हुई होती तो कई महिलाओं की आबरू बच जाती। अशोक खरात अपराधी तो है ही, लेकिन उसकी सलाह लेने वाले और उसके मंदिर में पूजा-पाठ करने वाले मंत्री भी इसमें बरी नहीं माने जा सकते। अकेले राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष रूपाली चाकणकर का इस्तीफा लेकर मामला दबाया नहीं जा सकता।

अंधविश्वास का राजनीतिकरण
महाराष्ट्र और कुल मिलाकर देश में अंधविश्वास का उथला कोलाहल जारी है और यह सब हिंदुत्व के नाम पर चलाया जा रहा है। जादू-टोना, तंत्र-मंत्र को राजमान्यता मिल रही है। जब भाजपा के कुछ नेता प्रधानमंत्री मोदी को विष्णु का तेरहवां अवतार बताते हैं, तो क्या यह हिंदुत्व का अपमान नहीं है? आसाराम बापू से लेकर राम-रहीम बाबा तक, जिनके कारनामे उजागर होने के बाद भी सत्ता पक्ष ने उनके प्रति नरमी बरती, यह इसी मानसिकता को दर्शाता है। लोगों को कट्टरता और अंधविश्वास के नशे में मदहोश रखकर राज किया जा रहा है।
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मंत्रियों की कलाई पर गंडे-डोरे और तावीज पदकों की तरह लटकते दिखते हैं, जो प्रगतिशील महाराष्ट्र का भयानक चित्र है। कुछ समय पहले महाड़ के एक मंत्री के घर में अघोरी पूजा का वीडियो सामने आया था। अशोक खरात के दरबार में भी पूजा-पाठ का उद्देश्य महाराष्ट्र की राज्य सत्ता को उलट देने की शक्ति पाना बताया जा रहा है। इसीलिए मुख्यमंत्री फडणवीस ने पुलिस से कहकर खरात बाबा का ‘खेल’ चौपट कराया। देर से ही सही, लेकिन उनकी आंखों में मिर्च यज्ञ का धुआं गया और उन्होंने आंखें खोलीं, यह अच्छा हुआ।
जिम्मेदारी का सवाल
खरात जैसे ज्योतिषी बेमौसम बारिश या ओलावृष्टि नहीं रोक सकते, न ही पहलगाम जैसे आतंकवादी हमलों को रोक सकते हैं। वे बस लोगों को भ्रम में रखकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। महाराष्ट्र का आधा मंत्रिमंडल पाखंड में लीन है। गुवाहाटी से खरात बाबा का आश्रम महाराष्ट्र की वर्तमान राजनीतिक यात्रा है, जहां प्रगतिशीलता की कब्र पर अंधविश्वास के पेड़ लगाए गए हैं।
खरात बाबा अकेला अपराधी नहीं है, बल्कि खरात बाबा के तलवे चाटने वाला प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से अपराधी है। बिना मेहनत किए पैसे और षड्यंत्र के बल पर सत्ता प्राप्त करने की लालसा ही ऐसी हरकतों को जन्म देती है। बहिणाबाई का वह संदेश आज फिर याद दिलाने की ज़रूरत है—”बापा नको मारू थापा, अशा उगा खर्या खोट्या” (बाबा जी, मत करो लफ्फाजी, ऐसी बेकार की सच्ची और झूठी बातों से बाज आइए)। समाज को भी समझ लेना चाहिए कि भाग्य की रेखाएं हथेली में नहीं, बल्कि हाथों में होती हैं।






















