UP News: उत्तर प्रदेश के कानपुर से सामने आया किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट (Kidney Transplant Racket) किसी थ्रिलर फिल्म की कहानी से कम नहीं है। जांच एजेंसियों के हाथ लगे खुलासों ने पूरे मेडिकल और प्रशासनिक महकमे को हिलाकर रख दिया है। अब तक 60 से अधिक अवैध किडनी ट्रांसप्लांट (Illegal Kidney Transplant) का अनुमान लगाया जा रहा है, जिसे अंजाम देने के तरीके बेहद सुनियोजित और रहस्यमय थे।
कैसे होता था ‘आकाश से बात’ वाला खेल?
बता दें कि जांच में सामने आया है कि ऑपरेशन के दिन अस्पताल के नॉर्मल स्टाफ को छुट्टी पर भेज दिया जाता था। एक खास सर्जिकल टीम बाहर से बुलाई जाती थी। तेजी से ऑपरेशन करने के बाद डोनर और रिसीवर दोनों को अलग-अलग जगहों पर शिफ्ट कर दिया जाता था, ताकि कोई लिंक न बन सके। सबसे बड़ी बात—इन मरीजों का कोई मेडिकल रिकॉर्ड ही नहीं रखा जाता था।
टेलीग्राम पर तय होता था किडनी का सौदा
यह रैकेट सिर्फ भौतिक स्तर तक सीमित नहीं था। मेरठ के डॉक्टर अफजाल इसके ‘डिजिटल ऑपरेशन’ को संभालते थे। उसने टेलीग्राम पर एक सीक्रेट ग्रुप बनाया था, जहां डोनर और रिसीवर को सीधे जोड़ा जाता था। पैसे और ऑपरेशन की तारीख यहीं फाइनल होती थी। इसी ग्रुप के जरिए मेरठ की पारुल तोमर (जिनकी दोनों किडनियां खराब थी) को बिहार के समस्तीपुर निवासी और MBA छात्र आयुष चौधरी (डोनर) से जोड़ा गया।
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80 लाख की फीस, लेकिन जिंदगी बची नहीं
इस कांड का सबसे दर्दनाक पहलू पारुल तोमर की कहानी है। करीब 80 लाख रुपये खर्च कर किडनी ट्रांसप्लांट कराने के बाद पारुल की जान खतरे में पड़ गई। अस्पताल में बुनियादी आइसोलेशन न रखने और लोगों की आवाजाही के कारण उन्हें संक्रमण हो गया। उनका हीमोग्लोबिन घटकर 6.3 रह गया। हालत बिगड़ने पर उन्हें लखनऊ के SGPGI रेफर करना पड़ा, जहां उनकी हालत अभी भी नाजुक बनी हुई है।
8वीं पास ‘डॉक्टर’ और पुलिस की खामोशी
इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड शिवम अग्रवाल उर्फ ‘काना’ है, जिसकी पढ़ाई महज 8वीं क्लास तक है। पहले एम्बुलेंस चलाने वाला यह शख्स स्टेथोस्कोप डालकर खुद को बड़े डॉक्टर के रूप में पेश करता था और जरूरतमंदों को इस रैकेट में धकेलता था।
दिलचस्प बात यह है कि पुलिस को पिछले साल ही इस रैकेट की भनक लग गई थी। कई महीनों तक खामोशी से जानकारी जुटाने के बाद पुलिस ने ‘आरोही हॉस्पिटल’ पर छापा मारा और उसे सील किया। इसके बाद जांच के ताने-बाने ‘आहूजा हॉस्पिटल’ तक पहुंचे, जहां अकेले 7-8 ट्रांसप्लांट होने की पुष्टि हुई है।
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सिस्टम की बड़ी कमी का फायदा
कानपुर मेडिकल कॉलेज प्रशासन का मानना है कि शहर में अधिकृत किडनी ट्रांसप्लांट सेंटर (Kidney Transplant Center) और जरूरी दवाइयों की कमी का फायदा ही इन रैकेटचियों ने उठाया। हालांकि, पुलिस ने कई अस्पताल संचालकों और डॉक्टरों को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन जांच एजेंसियों का मानना है कि यह सिर्फ झलक भर है, असली और बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश अभी बाकी है।
























