गुरुग्राम को जैसे-जैसे विश्वस्तरीय शहर के रूप में विकसित किया जा रहा है, वैसे-वैसे यहां की बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था और उनके रखरखाव की व्यवस्था चुनौतीपूर्ण होती जा रही है। ताजा उदाहरण द्वारका एक्सप्रेसवे के नजदीक सराय क्षेत्र में देखने को मिल रहा है, जहां लाखों रुपये की लागत से बनी एक उच्च गुणवत्ता वाली सड़क को नगर निगम के ठेकेदार ने सीवर लाइन निर्माण के नाम पर पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। मुख्य ड्रेन के ऊपर बनी यह सड़क आज केवल गड्ढों और मलबे का ढेर बनकर रह गई है, जिससे आम जनमानस को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
लाखों की लागत वाली सड़क की कहानी
यह मामला द्वारका एक्सप्रेसवे से सराय की तरफ जाने वाले मार्ग का है। महज दो वर्ष पूर्व गुरुग्राम मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी (जीएमडीए) ने इस मार्ग का निर्माण करवाया था। यह सड़क न केवल यातायात को सुगम बनाती थी, बल्कि इस क्षेत्र के विकास की धुरी भी मानी जाती थी। लेकिन जब से यहां सीवर लाइन बिछाने का काम शुरू हुआ, तब से यह विकास की नई कहानी उजागर हो गई है।
सीवर लाइन के नाम पर बुलडोजर बनी जेसीबी
अप्रैल माह में नगर निगम द्वारा इस मार्ग पर मुख्य सीवर लाइन डालने का काम शुरू किया गया। ठेकेदार ने काम में तेजी लाने के चक्कर में भारी मशीनों (जेसीबी) का इस्तेमाल किया। द्वारका एक्सप्रेसवे से लेकर प्रसिद्ध संत बाबा प्रकाशपुरी आश्रम और मंदिर तक के पूरे लगभग एक किलोमीटर लंबे मार्ग को जेसीबी के पंजों से खुरच दिया गया।
नियमों के अनुसार, जिस ठेकेदार या एजेंसी को किसी सड़क को खोदने की अनुमति दी जाती है, उसकी जिम्मेदारी बनती है कि वह काम पूरा होने के बाद सड़क को पहले से बेहतर स्थिति में वापस लाए। लेकिन यहां ठेकेदार ने सीवर लाइन बिछाने का काम पूरा होते ही साइट से कूच कर लिया और सड़क की मरम्मत कराने की जहमत उठाने से साफ इनकार कर दिया।
धूल और गड्ढों से बदतर है जनजीवन
इस व्यस्त मार्ग से प्रतिदिन हजारों की संख्या में वाहन चालक, आश्रम और मंदिर के श्रद्धालु तथा स्थानीय निवासी आवागमन करते हैं। सड़क पर जगह-जगह बिखरी बजरी, मिट्टी और पत्थरों के कारण गाड़ियों के पहिए फंस रहे हैं। गड्ढों और उबड़-खाबड़ सड़क के कारण रोजाना दोपहिया वाहन चालकों के संतुलन बिगड़ने की घटनाएं सामने आ रही हैं। कई लोगों को चोटें भी आई हैं।
वाहनों के गुजरने से यहां धूल का एक विशाल गुबार उठता है। यह धूल सीधे लोगों के श्वासनली में जा रही है, जिससे सांस लेना मुश्किल हो गया है। डॉक्टरों के अनुसार इस तरह की धूल से अस्थमा, एलर्जी और सांस के अन्य रोगों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। अभी तो यह धूल का सिलसिला है, लेकिन जैसे ही मौसम बदलेगा और बारिश होगी, यह पूरा मार्ग गहरे कीचड़ में तब्दील हो जाएगा। तब यहां से निकलना नामुमकिन हो जाएगा।
आम आदमी का आक्रोश और अधिकारियों की बहरी कान
स्थानीय निवासियों ने इस मुद्दे को लेकर कई बार नगर निगम के अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन प्रशासन की उदासीनता कायम है। न तो ठेकेदार पर कोई जुर्माना लगाया गया और न ही सड़क की मरम्मत के लिए कोई पहल की गई।
एक स्थानीय निवासी लालजी का कहना है कि, “यह सड़क महज दो साल पहले बेहतरीन तरीके से बनी थी। नगर निगम के ठेकेदार ने सीवर लाइन डालने के नाम पर पूरी सड़क को छलनी कर दिया। काम खत्म हुए महीनों बीत गए, लेकिन मरम्मत के नाम पर सिर्फ धूल और गड्ढे छोड़ दिए गए। रोजाना यहां दोपहिया वाहन चालक फिसलकर गिर रहे हैं।”
वहीं, दूसरे निवासी बाबूलाल ने अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए कहा, “संत बाबा प्रकाशपुरी आश्रम और मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं के साथ-साथ सराय और एक्सप्रेसवे की ओर जाने वाले हजारों लोगों के लिए यह मुख्य संपर्क मार्ग है। सड़क पर फैले मलबे और उड़ती धूल से सांस लेना मुश्किल हो गया है। ठेकेदार की इस मनमानी पर अधिकारियों को तुरंत सख्त कदम उठाना चाहिए।”
प्रशासन का पक्ष
जब इस मामले पर नगर निगम के मुख्य अभियंता विजय ढाका से बात की गई, तो उनका पक्ष कुछ अलग ही था। उन्होंने कहा, “अगर सड़क को ठेकेदार ने तोड़ा है, तो इसकी मरम्मत उसी से करवाई जाएगी। संबंधित अधिकारी से इस पूरे प्रकरण की जानकारी मांगी गई है।”
हालांकि, जमीनी हालात कुछ और ही बयां कर रहे हैं। अधिकारियों द्वारा “जानकारी मांगी जा रही है” का बयान तब तक लोगों के लिए कोई राहत नहीं लाएगा, जब तक ठेकेदार की बॉन्ड मनी जब्त नहीं की जाती और सड़क की री-कार्पेटिंग (Re-carpeting) का काम शुरू नहीं हो जाता।
नगर निगम के बीच खींचतान का खामियाजा
इस पूरे प्रकरण से एक बड़ी चूक सामने आती है और वह है विभागों के बीच तालमेल की कमी। जीएमडीए (सड़क निर्माता) और नगर निगम (सीवर लाइन निर्माता) के बीच कोई ठोस समन्वय नहीं था। जब निगम को सड़क खोदनी थी, तो जीएमडीए से अनुमति लेने के दौरान यह शर्त रखी जानी चाहिए थी कि ठेकेदार को पहले ही मरम्मत का बजट जमा करना होगा। लेकिन अब दोनों विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आ रहे हैं, और इसका पूरा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।


























