Green Crackers vs Normal Crackers: दिवाली पर आतिशबाजी का शौक रखने वालों के बीच ग्रीन पटाखों की चर्चा बढ़ गई है। लेकिन क्या ये पटाखे वास्तव में प्रदूषण नहीं फैलाते? क्या इन्हें जलाने से हवा में धुआं और जहरीली गैसें नहीं निकलतीं? आइए जानते हैं ग्रीन पटाखों की तकनीक, सामान्य पटाखों से इनके अंतर और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में।
दिवाली का त्योहार रोशनी, खुशियों और आतिशबाजी के लिए जाना जाता है। हालांकि, हर साल त्योहार के बाद दिल्ली-एनसीआर समेत देश के कई शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। पटाखों से निकलने वाला धुआं और जहरीले कण हवा की गुणवत्ता को खराब करने के साथ लोगों की सेहत के लिए भी परेशानी पैदा करते हैं। इसी समस्या को देखते हुए पर्यावरण के अनुकूल विकल्प के तौर पर ग्रीन पटाखों को विकसित किया गया है।
दिल्ली-एनसीआर में दिवाली 2026 से पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी ग्रीन पटाखों को लेकर सशर्त राहत दी है। कोर्ट के निर्देश के मुताबिक, 7 और 8 नवंबर को सुबह 6 से 7 बजे और रात 8 से 10 बजे तक ही प्रमाणित ग्रीन पटाखे जलाए जा सकेंगे। 9 नवंबर से पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध फिर लागू होगा। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर ग्रीन पटाखे सामान्य पटाखों से कितने अलग हैं।
क्या होते हैं ग्रीन पटाखे और किसने किया इन्हें विकसित?
ग्रीन पटाखे ऐसी आतिशबाजी हैं, जिन्हें पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम वायु प्रदूषण फैलाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। भारत में इनके विकास में वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) और राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) की अहम भूमिका रही है।
CSIR-NEERI के वैज्ञानिकों ने पटाखों में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल और रासायनिक फॉर्मूलेशन में बदलाव करके ऐसे विकल्प तैयार किए, जिनसे जलने के दौरान निकलने वाले प्रदूषक तत्वों की मात्रा कम हो सके।
इन पटाखों के निर्माण में कच्चे माल की मात्रा कम करने, शेल का आकार छोटा रखने, राख पैदा करने वाले पदार्थों का इस्तेमाल घटाने और धूल को नियंत्रित करने वाले तत्वों को शामिल करने जैसी तकनीकों पर काम किया गया है।
यानी ग्रीन पटाखे पूरी तरह नई तरह की आतिशबाजी नहीं हैं, बल्कि सामान्य पटाखों का ऐसा विकसित विकल्प हैं, जिनसे पर्यावरण को होने वाला नुकसान कम करने की कोशिश की जाती है।
सामान्य पटाखों और ग्रीन पटाखों में क्या है अंतर?
सामान्य पटाखों में तेज आवाज और रंगीन रोशनी पैदा करने के लिए अलग-अलग रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें ऑक्सीडाइजर, सल्फर, ईंधन और रंग पैदा करने वाले कई रासायनिक यौगिक शामिल हो सकते हैं। कुछ पारंपरिक पटाखों में बेरियम, एल्युमिनियम, स्ट्रांशियम और अन्य धातुओं के यौगिक भी इस्तेमाल किए जाते हैं। जब ये पटाखे जलते हैं तो इनसे पार्टिकुलेट मैटर (PM), सल्फर डाइऑक्साइड (SO2), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और अन्य प्रदूषक निकल सकते हैं।
वहीं, ग्रीन पटाखों में इन उत्सर्जनों को कम करने के लिए रासायनिक संरचना में बदलाव किया जाता है। इनमें कुछ हानिकारक पदार्थों का इस्तेमाल कम किया जाता है या उनके स्थान पर वैकल्पिक पदार्थों का उपयोग किया जाता है। इस तकनीक में जियोलाइट, आयरन ऑक्साइड और पॉलिमर हाइड्रोजेल जैसे पदार्थों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, हर ग्रीन पटाखे की फॉर्मूलेशन एक जैसी नहीं होती।
ग्रीन पटाखों की तकनीक कैसे करती है काम?
CSIR-NEERI ने ग्रीन पटाखों की अलग-अलग श्रेणियों और तकनीकों पर काम किया है। इनमें SWAS, STAR और SAFAL प्रमुख हैं।
- SWAS: इसका पूरा नाम Safe Water Releaser है। इसमें पॉलिमर हाइड्रोजेल का इस्तेमाल किया जाता है, जो पटाखा फूटने के दौरान निकलने वाले कुछ धूलकणों को अपने साथ बांधने में मदद करता है।
- STAR: इसका पूरा नाम Safe Thermite Cracker है। इसमें आयरन ऑक्साइड के इस्तेमाल से ईंधन के बेहतर दहन में मदद मिलती है, जिससे उत्सर्जन कम करने का प्रयास किया जाता है।
- SAFAL: इसमें जियोलाइट आधारित सामग्री का इस्तेमाल करके एल्युमिनियम की मात्रा कम करने की तकनीक अपनाई गई है।
इन तकनीकों का उद्देश्य पटाखों से निकलने वाले प्रदूषक कणों और गैसों की मात्रा को घटाना है। CSIR-NEERI के अनुसार, इनकी अलग-अलग श्रेणियों में पारंपरिक पटाखों की तुलना में उत्सर्जन में कमी दर्ज की गई है।
क्या ग्रीन पटाखों से बिल्कुल धुआं नहीं निकलता?
इस सवाल का जवाब है- नहीं। ग्रीन पटाखे पूरी तरह प्रदूषण मुक्त नहीं होते। इन्हें जलाने पर भी धुआं, गैसें और सूक्ष्म प्रदूषक कण निकलते हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि प्रमाणित ग्रीन पटाखों को सामान्य पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण फैलाने के लिए तैयार किया जाता है।
CSIR-NEERI के निर्धारित मानकों के अनुसार, ग्रीन पटाखों में पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन कम से कम 30 प्रतिशत घटाने का मानक है। कुछ श्रेणियों में पार्टिकुलेट मैटर में कम से कम 20 प्रतिशत और गैसीय उत्सर्जन में कम से कम 10 प्रतिशत की कमी का मानक भी लागू होता है।
इसलिए यह कहना गलत होगा कि ग्रीन पटाखे जलाने से हवा बिल्कुल साफ रहती है। ये प्रदूषण को कम जरूर करते हैं, लेकिन खत्म नहीं करते।
पटाखों से निकलने वाले PM2.5 और PM10 क्यों हैं खतरनाक?
पटाखे जलने से हवा में पार्टिकुलेट मैटर यानी बेहद छोटे ठोस और तरल कण फैलते हैं। इन्हें इनके आकार के आधार पर PM10, PM2.5, PM1 और अल्ट्राफाइन कणों जैसी श्रेणियों में समझा जाता है।इनमें PM2.5 और अल्ट्राफाइन कण विशेष रूप से चिंताजनक हैं, क्योंकि ये सांस के साथ शरीर में प्रवेश करके फेफड़ों के गहरे हिस्सों तक पहुंच सकते हैं। कुछ बेहद छोटे कण रक्तप्रवाह तक भी पहुंच सकते हैं। ऐसे प्रदूषकों के संपर्क में आने से खांसी, सांस लेने में परेशानी, आंखों में जलन और अस्थमा जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। पहले से सांस या दिल की बीमारी से जूझ रहे लोगों, बच्चों और बुजुर्गों पर इनका असर अधिक हो सकता है।
सर्दियों में क्यों बढ़ जाता है पटाखों के धुएं का खतरा?
दिवाली के आसपास उत्तर भारत में सर्दियों की शुरुआत हो जाती है। इस दौरान हवा की गति कम होने, तापमान में बदलाव और वायुमंडलीय परिस्थितियों के कारण प्रदूषक जमीन के नजदीक जमा हो सकते हैं।जब पटाखों से निकलने वाला धुआं पहले से प्रदूषित हवा में मिलता है तो स्मॉग की स्थिति और गंभीर हो सकती है। इससे दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में AQI यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स तेजी से खराब होने की आशंका रहती है। ऐसी परिस्थितियों में सांस के मरीजों को अधिक परेशानी हो सकती है। यही वजह है कि विशेषज्ञ पटाखों के इस्तेमाल को सीमित रखने और प्रदूषण के अन्य स्रोतों को नियंत्रित करने पर भी जोर देते हैं।
ग्रीन पटाखे खरीदते समय किन बातों का रखें ध्यान?
अगर आप दिल्ली-एनसीआर में ग्रीन पटाखे खरीदने की योजना बना रहे हैं तो सिर्फ पैकेट पर Green Crackers लिखा देखकर भरोसा न करें। उत्पाद की प्रमाणिकता जांचना जरूरी है।
- पटाखे पर CSIR-NEERI से संबंधित प्रमाणन और जरूरी लाइसेंस की जानकारी देखें।
- पैकेट पर दिया गया उत्पाद-विशिष्ट QR कोड स्कैन करके उसकी जानकारी जांचें।
- केवल अधिकृत और निर्धारित बिक्री केंद्रों से ही पटाखे खरीदें।
- प्रतिबंधित बेरियम वाले पटाखों और लड़ियों से दूर रहें।
- अस्पतालों, स्कूलों, वृद्धाश्रमों और अधिसूचित साइलेंस जोन के आसपास पटाखे न जलाएं।
ग्रीन पटाखे बेहतर विकल्प हैं, लेकिन सावधानी जरूरी
कुल मिलाकर ग्रीन पटाखे सामान्य पटाखों के मुकाबले कम प्रदूषण फैलाने की दिशा में एक वैज्ञानिक पहल हैं। हालांकि, इन्हें पूरी तरह सुरक्षित या प्रदूषण मुक्त मानना सही नहीं है। इनसे भी धुआं और हानिकारक कण निकलते हैं, जो खासकर पहले से प्रदूषित शहरों में स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं।
दिवाली की खुशियां मनाते समय पर्यावरण और दूसरों की सेहत का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है। कम से कम आतिशबाजी करना, निर्धारित नियमों का पालन करना और बच्चों, बुजुर्गों तथा सांस के मरीजों को धुएं से दूर रखना बेहतर विकल्प है। आखिरकार, रोशनी का त्योहार तभी खुशहाल होगा, जब हमारी हवा भी सांस लेने लायक बनी रहे।

























