Understand the ethanol math in India: भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का कार्यक्रम लगातार आगे बढ़ रहा है। इससे जहां एक ओर देश की कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने और प्रदूषण नियंत्रित करने की उम्मीद है, वहीं दूसरी ओर खाद्य सुरक्षा और चीनी उत्पादन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। खासकर तब, जब देश में एथेनॉल से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देने की चर्चा हो रही है।
इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार से पूछा कि अगर 100 प्रतिशत एथेनॉल से चलने वाले वाहनों को मंजूरी दी जाती है तो सरकार इसकी पर्याप्त आपूर्ति कैसे सुनिश्चित करेगी? अदालत ने कहा कि इस विषय पर जनहित में विचार होना चाहिए। इसमें पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों के आर्थिक सशक्तिकरण को भी महत्व दिया जाना चाहिए। इस बहस के बीच सबसे अहम सवाल यह है कि भारत में कितना गन्ना एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होता है और इससे चीनी उत्पादन पर कितना असर पड़ता है?
भारत में एथेनॉल की कितनी आपूर्ति गन्ने से होती है?
भारत में एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से दो स्रोतों से किया जाता है। पहला गन्ना और उससे निकलने वाले उत्पाद हैं, जबकि दूसरा अनाज है। अनाज की श्रेणी में मक्का, टूटे चावल और भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पास उपलब्ध अतिरिक्त चावल शामिल हैं। ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक, नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच भारत में कुल 8.95 बिलियन लीटर एथेनॉल की आपूर्ति हुई। इसमें गन्ने से 2.71 बिलियन लीटर और अनाज से लगभग 6.4 बिलियन लीटर एथेनॉल मिला। इस हिसाब से कुल एथेनॉल आपूर्ति में गन्ने की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत बैठती है, जबकि अनाज का योगदान लगभग 70 प्रतिशत है। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत का एथेनॉल कार्यक्रम केवल गन्ने पर निर्भर नहीं है। अनाज भी इसकी आपूर्ति व्यवस्था का बड़ा आधार बन चुका है।
एथेनॉल बनाने के बाद चीनी के लिए कितना गन्ना बचता है?
गन्ने से एथेनॉल उत्पादन और चीनी निर्माण के बीच सीधा संबंध है। हालांकि इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि मिलें गन्ने के किस हिस्से या उत्पाद को एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल कर रही हैं।उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के लिए कुल गन्ने या उससे संभावित चीनी उत्पादन के बराबर मात्रा का लगभग 9 से 10 प्रतिशत हिस्सा इस्तेमाल होता रहा है। इसका अर्थ है कि करीब 90 से 91 प्रतिशत हिस्सा चीनी उत्पादन के लिए उपलब्ध रहता है।
हाल के सीजन में एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल किए गए गन्ने का चीनी के बराबर अनुमानित मूल्य लगभग 25 लाख से 28 लाख टन रहा। हालांकि यह समझना जरूरी है कि एथेनॉल के लिए इस्तेमाल किए गए हर टन गन्ने का चीनी उत्पादन पर एक जैसा असर नहीं पड़ता। इसकी वजह गन्ने से एथेनॉल बनाने की अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
गन्ने से एथेनॉल बनाने के तीन तरीके
चीनी मिलें मुख्य रूप से तीन तरीकों से गन्ने से एथेनॉल तैयार करती हैं। इन तीनों प्रक्रियाओं में चीनी उत्पादन पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है।
1. सीधे गन्ने के रस से एथेनॉल उत्पादन
इस प्रक्रिया में गन्ने से निकाले गए रस को सीधे एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसमें रस से पहले चीनी नहीं निकाली जाती। इसलिए चीनी बनाने की संभावित मात्रा का बड़ा हिस्सा एथेनॉल उत्पादन की ओर चला जाता है। इस तरीके से एक टन गन्ने से लगभग 70 से 74 लीटर एथेनॉल तैयार किया जा सकता है। चीनी उत्पादन के लिहाज से यह सबसे ज्यादा प्रभाव डालने वाली प्रक्रिया है।
2. बी-हेवी मोलासेस से एथेनॉल उत्पादन
बी-हेवी मोलासेस गन्ने के रस से शुरुआती चरण में कुछ चीनी निकालने के बाद बचा गाढ़ा पदार्थ होता है। इसका इस्तेमाल एथेनॉल बनाने के लिए किया जाता है। इस प्रक्रिया में पहले ही कुछ चीनी निकाली जा चुकी होती है। इसलिए गन्ने के रस को सीधे एथेनॉल में बदलने की तुलना में चीनी उत्पादन पर इसका असर कम होता है। अनुमान के मुताबिक, इससे चीनी उत्पादन में लगभग 1.5 से 2 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।
3. सी-हेवी मोलासेस से एथेनॉल उत्पादन
सी-हेवी मोलासेस चीनी निकालने की प्रक्रिया के अंतिम चरण में बचने वाला उप-उत्पाद है। इस स्तर तक मिलें गन्ने से अपनी चीनी निकाल चुकी होती हैं। इसलिए सी-हेवी मोलासेस से एथेनॉल बनाने पर चीनी उत्पादन में अतिरिक्त नुकसान नहीं होता। यही वजह है कि इसे चीनी उद्योग के लिए अपेक्षाकृत अनुकूल विकल्प माना जाता है।
सरकार ने एथेनॉल उत्पादन की नीति में क्या बदलाव किया?
चीनी की घरेलू उपलब्धता बनाए रखने और बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखने के उद्देश्य से सरकार ने 2026-27 सप्लाई वर्ष के लिए एथेनॉल उत्पादन से जुड़ी नीति में बड़ा बदलाव किया है। नई व्यवस्था के तहत गन्ने के रस, चीनी सिरप और बी-हेवी मोलासेस को एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल करने पर रोक लगाई गई है। इसे शून्य चीनी डायवर्जन की नीति के तौर पर देखा जा रहा है।
इसका सीधा मतलब है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी बनाने वाले इन स्रोतों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। ऐसे में मक्का और चावल जैसे अनाज एथेनॉल आपूर्ति के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएंगे। इस नीति से चीनी मिलों को घरेलू बाजार के लिए अधिक चीनी उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। हालांकि इससे एथेनॉल उत्पादन के लिए अनाज की पर्याप्त उपलब्धता और उसकी कीमतों का सवाल भी अहम हो जाएगा।
100% एथेनॉल वाहनों के लिए कितनी होगी जरूरत?
सुप्रीम कोर्ट का सवाल इसी बड़े मुद्दे की ओर इशारा करता है। अगर भविष्य में 100 प्रतिशत एथेनॉल से चलने वाले वाहनों को बड़े पैमाने पर अनुमति मिलती है, तो देश को मौजूदा जरूरत से कहीं अधिक एथेनॉल की आवश्यकता पड़ सकती है।
ऐसे में सरकार के सामने तीन बड़ी चुनौतियां होंगी। पहली, एथेनॉल उत्पादन के लिए पर्याप्त कच्चा माल जुटाना। दूसरी, चीनी और खाद्यान्न की घरेलू जरूरतों को प्रभावित होने से बचाना। तीसरी, किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य दिलाना। भारत में एथेनॉल उत्पादन का विस्तार तभी टिकाऊ हो सकता है, जब ईंधन की जरूरत और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बना रहे।



























