Train Wheel Price: भारतीय रेलवे के पहियों की कीमत कितनी होती है और इन्हें कितने किलोमीटर चलने के बाद बदलना पड़ता है? ट्रेन में सफर करते समय ऐसे सवाल अक्सर लोगों के मन में आते हैं। रेलवे के पहिये हजारों टन वजन उठाकर लगातार पटरियों पर दौड़ते हैं। ऐसे में इनका मजबूत होना और समय पर रखरखाव बेहद जरूरी है। खास बात यह है कि मामूली घिसावट होने पर हर बार पहिया बदलना जरूरी नहीं होता। कई मामलों में मशीन से उसकी सतह को दोबारा सही आकार दिया जा सकता है।
आइए जानते हैं कि भारतीय रेलवे में इस्तेमाल होने वाले ट्रेन के पहियों की उम्र कितनी होती है, एक पहिये की कीमत क्या है और पूरे यात्री कोच के पहियों पर कितना खर्च आता है।

ट्रेन के पहिये कितने साल में घिस जाते हैं?
ट्रेन के पहियों की उम्र को केवल दिनों में मापना सही नहीं है। इनकी वास्तविक उपयोग अवधि ट्रेन के प्रकार, चलने की दूरी, वजन, गति, रेल मार्ग और रखरखाव पर निर्भर करती है। मीडिया रिपोर्ट्स में भारतीय रेलवे के कुछ आयातित फोर्ज्ड पहियों की अनुमानित उम्र करीब चार से पांच साल बताई गई है। हालांकि, यह अवधि सभी यात्री ट्रेनों, इंजनों और मालगाड़ियों के पहियों पर समान रूप से लागू नहीं होती।
पहियों के लगातार इस्तेमाल से उनकी बाहरी सतह पर घिसावट आती है। इसके अलावा, तेज मोड़, भारी भार और ब्रेक लगाने के दौरान उत्पन्न होने वाला घर्षण भी उनके आकार को प्रभावित कर सकता है। इसलिए पहियों को केवल उनकी उम्र के आधार पर नहीं, बल्कि निर्धारित तकनीकी मानकों और जांच के नतीजों के अनुसार इस्तेमाल किया जाता है।
ट्रेन के एक पहिये की कीमत कितनी होती है?
भारतीय रेलवे में इस्तेमाल होने वाले पहियों की कीमत उनके डिजाइन, आकार, निर्माण तकनीक और इस्तेमाल के आधार पर अलग-अलग होती है। सामान्य यात्री कोच, आधुनिक एलएचबी कोच, वंदे भारत ट्रेन और रेल इंजन के पहिये एक जैसे नहीं होते।

सितंबर 2022 की मीडिया रिपोर्ट्स में रेलवे के एक अधिकारी के हवाले से आयातित फोर्ज्ड पहिये की कीमत करीब 70,000 रुपये बताई गई थी। वहीं, औद्योगिक क्षेत्र से जुड़े एक शोध नोट में कुछ फोर्ज्ड पहियों की अनुमानित कीमत 78,000 से 80,000 रुपये प्रति पहिया दर्ज की गई थी।
इस आधार पर उदाहरण के तौर पर एक पहिये की कीमत 70,000 से 80,000 रुपये मानें, तो दो पहियों की कीमत करीब 1.40 लाख से 1.60 लाख रुपये होगी। ध्यान रहे कि यह एक अनुमानित गणना है, न कि सभी प्रकार के रेल पहियों की मौजूदा निश्चित कीमत। कीमत में अंतर का कारण पहिये का प्रकार, सप्लाई कॉन्ट्रैक्ट, निर्माण लागत और खरीद की शर्तें हो सकती हैं।
ट्रेन के पहियों की जांच और मरम्मत कैसे होती है?
रेलवे में पहियों की सुरक्षा जांच नियमित रखरखाव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। तकनीकी कर्मचारी पहिये के व्यास, प्रोफाइल, सतह की स्थिति और अन्य निर्धारित मापदंडों की जांच करते हैं। जरूरत पड़ने पर विशेष उपकरणों से आंतरिक दोषों का भी पता लगाया जाता है।

रेलवे की तकनीकी प्रक्रिया में री-प्रोफाइलिंग (Reprofiling) का महत्वपूर्ण स्थान है। इस प्रक्रिया में व्हील लेथ मशीन की मदद से पहिये की घिसी हुई सतह को निर्धारित आकार में दोबारा तैयार किया जाता है। इससे पहिये को सुरक्षित सीमा के भीतर दोबारा इस्तेमाल करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, हर पहिये की मरम्मत संभव नहीं होती। यदि उसमें दरार, गंभीर क्षति या निर्धारित सीमा से अधिक घिसावट पाई जाती है, तो तकनीकी मानकों के अनुसार उसे सेवा से हटाया जा सकता है। रेलवे अनुसंधान एवं डिजाइन संगठन (RDSO) के तकनीकी दस्तावेजों में भी पहियों की री-प्रोफाइलिंग और खराब पहियों को सेवा से हटाने की प्रक्रियाएं दी गई हैं।
एक यात्री कोच के पहियों पर कितना खर्च आता है?
किसी यात्री कोच में पहियों की कुल लागत का अनुमान लगाने के लिए उसके व्हीलसेट की व्यवस्था और पहियों की संख्या जानना जरूरी है। एक सामान्य पारंपरिक यात्री कोच में आमतौर पर दो बोगियां होती हैं और प्रत्येक बोगी में दो एक्सल लगे होते हैं। प्रत्येक एक्सल पर दो पहिये होने के कारण ऐसे कोच में कुल आठ पहिये होते हैं।
यदि गणना के लिए एक पहिये की कीमत 70,000 रुपये मानी जाए, तो आठ पहियों की कुल कीमत इस प्रकार होगी 8 × 70,000 रुपये = 5,60,000 रुपये। यानी इस उदाहरण के अनुसार एक कोच के आठ पहियों की कीमत करीब 5.60 लाख रुपये बैठती है। यदि प्रति पहिया कीमत 80,000 रुपये मानें, तो यही लागत 6.40 लाख रुपये होगी।
यह केवल पहियों की अनुमानित खरीद लागत है। इसमें एक्सल, बेयरिंग, अन्य व्हीलसेट घटकों, असेंबली, रखरखाव और श्रम का खर्च शामिल नहीं है। अलग डिजाइन वाले कोचों में तकनीकी व्यवस्था भी अलग हो सकती है।
























