Defeat While in Power—A Message For The MLC: भारतीय लोकतंत्र में कुछ चुनाव ऐसे होते हैं जो अपने आकार के अनुपात में कहीं बड़े संदेश देते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक – इन चार राज्यों की कुल 28 विधान परिषद सीटों के नतीजे ऐसे ही हैं।
ये सीटें मुख्यतः शिक्षक और स्नातक निर्वाचक मंडलों की हैं, जिनमें मतदाताओं की संख्या हजारों-लाखों में सीमित रहती है, लेकिन इनका राजनीतिक प्रतीकात्मक मूल्य किसी बड़े उपचुनाव से कम नहीं होता।
इसकी बड़ी वजह यह है कि शिक्षक और स्नातक सीटों का निर्वाचक मंडल देश का सबसे सजग, सूचनाबद्ध और अपेक्षाकृत स्वतंत्र वोटर वर्ग है। यहां पार्टी चिन्ह और ऊंचे नेतृत्व की चापलूसी घटिया उम्मीदवार की कमी नहीं पूरी कर पाती। यह वोटर भर्ती प्रक्रियाओं, परीक्षा प्रणाली, रोजगार की गुणवत्ता और अपने पेशे के भविष्य को लेकर प्रत्यक्ष प्रश्न उठाता है। इसीलिए इन नतीजों को “एमएलसी चुनाव” कहकर हल्के में लेना सत्ताधारी दलों की भारी भूल होगी।
इस बार के परिणामों ने एक सुसंगत कहानी रच दी है – बिहार में एनडीए सरकार के भीतर फूट, उत्तर प्रदेश में भाजपा के प्रतीकात्मक गढ़ों में सेंध, महाराष्ट्र में महायुति की आंतरिक खटपट, और कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस का खाता शून्य। चार राज्य, चार अलग-अलग स्थानीय समीकरण, पर निष्कर्ष लगभग एक ही – सत्ता में बैठी पार्टियों को जमीन से जुड़ा वर्ग धीरे-धीरे अपना मोहभंग दर्ज कर रहा है।
बिहार: विधानसभा जीत के कुछ ही बाद जदयू को लगा गहरा व्रण
बिहार की आठ सीटों के नतीजे सबसे अधिक चर्चित और साथ ही सबसे ज्यादा असहज करने वाले रहे। गठबंधन सूत्रों के मुताबिक, एनडीए चार सीटें जीतने में सफल रहा, लेकिन इस जीत की मिठास जेडीयू के लिए खट्टी साबित हुई। पार्टी को आठ में से सिर्फ एक सीट पर जीत मिली। यह किसी भी राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के लिए निराशाजनक स्थिति है, खासकर उस पार्टी के लिए जो कभी अपने ‘जननायक’ की लोकप्रियता और पकड़ को राज्य की राजनीति का आधार मानती थी।
तिरहुत स्नातक सीट से जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता अभिषेक झा की हार के बाद आया उनका ‘चक्रव्यूह’ वाला बयान इस निराशा का सबसे स्पष्ट आईना है। अभिमन्यु की उपमा देते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें हराने के लिए एनडीए के भीतर ही षड्यंत्र रचा गया। यह बयान इस बात का संकेत है कि गठबंधन के भीतर की रस्साकशी अब सीटों और चुनावी समीकरणों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सार्वजनिक मंच पर भी सामने आने लगी है। जिस पार्टी के नेता अपनी हार के लिए विपक्ष के बजाय सहयोगी दल को जिम्मेदार ठहराने लगें, उसके संगठनात्मक स्वास्थ्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पटना स्नातक सीट से जुड़ा बाहुबली विधायक अनंत सिंह का विवाद इस पूरे घटनाक्रम का एक और गंभीर पहलू है। जेडीयू उम्मीदवार नीरज कुमार के पक्ष में खड़े होने के बजाय जनसुराज को समर्थन देने के कारण अनंत सिंह को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। किसी एक विधायक के बागी रुख को संगठनात्मक अनुशासनहीनता बताकर खारिज करना आसान है, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ कहीं अधिक गहरे हैं। यह घटनाक्रम संगठन के भीतर असंतोष और नेतृत्व की पकड़ को लेकर भी सवाल खड़े करता है।
वहीं, विपक्ष के लिए भी बिहार के ये नतीजे पूरी तरह सुखद नहीं रहे। आरजेडी का खाता खुलना तेजस्वी यादव के लिए निश्चित रूप से राहत की बात है। दूसरी ओर, जनसुराज और दो निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत यह संकेत देती है कि शिक्षक-स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में स्थानीय उम्मीदवारों की पकड़ अब भी दलीय राजनीति पर भारी पड़ सकती है।
तेजस्वी यादव ने इन नतीजों को एनडीए सरकार के कथित भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और शिक्षकों व युवाओं के खिलाफ ‘दमनात्मक कार्रवाई’ के विरोध में शिक्षित समाज का खुला जनादेश बताया। राजनीतिक टिप्पणी के लिहाज से यह उनके विपक्षी रुख के अनुरूप है, लेकिन इस चुनाव का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भी है। इन सीटों पर जीत का स्वरूप बिखरा हुआ रहा और किसी एक राजनीतिक दल के पक्ष में स्पष्ट जनादेश दिखाई नहीं दिया।
बहरहाल, बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब हालिया विधानसभा चुनाव में एनडीए को प्रचंड जनादेश मिला, तो उसी राजनीतिक दौर में शिक्षक-स्नातक वर्ग का रुख इतना अलग क्यों नजर आया? इसका जवाब शिक्षकों और युवाओं के बीच भर्ती परीक्षाओं, सेवा सुरक्षा तथा नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर बनी नाराजगी में तलाशना अधिक यथार्थपरक होगा। संभव है कि विधानसभा चुनाव में व्यापक राजनीतिक मुद्दों के आधार पर मतदान करने वाला यही शिक्षित वर्ग शिक्षक-स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में अपने पेशेवर हितों और स्थानीय समस्याओं को प्राथमिकता दे रहा हो। यही अंतर बिहार के इन चुनावी नतीजों का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है।
उत्तर प्रदेश: छह सीटें जीतकर भी चुभते हुए तीर
उत्तर प्रदेश में ग्यारह सीटों का गणित पहली नजर में भाजपा के पक्ष में दिखता है — छह सीटें, जबकि समाजवादी पार्टी को पांच मिलीं। परंतु राजनीतिक जीत-हार का अर्थशास्त्र अक्सर संख्या नहीं, प्रतीक तय करता है।
यहां प्रतीकात्मक रूप से सबसे कीमती सीटें लखनऊ और वाराणसी भाजपा के हाथ से निकल गईं — एक वह शहर जहां मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र है, और दूसरा वह शहर जो दो दशकों से प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र माना जाता है। मुख्यमंत्री के अपने निर्वाचन क्षेत्र और प्रधानमंत्री के प्रतिनिधि क्षेत्र में हार को भाजपा के लिए सिर्फ एक गणितीय विकल्प नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा का प्रश्न मानना ही अधिक उचित है।
इंडिया गठबंधन के नेताओं ने इन नतीजों को 2027 के विधानसभा चुनाव का “सेमीफाइनल” करार देते हुए विपक्ष की जीत का दावा किया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने नतीजों को “डबल इंजन” सरकार की “दोहरी हार” बताया। यह वाक्य तीखा है और राजनीतिक दृष्टि से असरदार भी, पर इसका शाब्दिक विस्तार करने से पहले दो बातें स्मरण रखनी होंगी। पहली, भाजपा आधी से अधिक सीटें जीतने में सफल रही है। दूसरी, शिक्षक-स्नातक निर्वाचक मंडल का चरित्र विधानसभा के सामान्य निर्वाचक मंडल से मौलिक रूप से अलग है — यह बहुधा शहरी, शिक्षित मध्यवर्गीय और अपने पेशे से जुड़े मुद्दों पर वोट करता है।
भाजपा की प्रतिक्रिया भी इस दोहराव को दर्शाती है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री भूपेंद्र चौधरी ने परिणामों का स्वागत करते हुए कहा कि जिन सीटों पर हार हुई है, उन पर पार्टी मंथन करेगी, और इस बात की पुनरावृत्ति की कि भाजपा पहले भी छह सीटें जीती थी और इस बार भी उतनी ही जीती है। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आत्मविश्वास का प्रदर्शन करते हुए 2027 में राज्य में तीसरी लगातार बहुमत की सरकार का दावा किया और सपा को “दिन में सपने न देखने” की सलाह दी। सत्ताधारी दल का यह आत्मविश्वास अनुचित नहीं है, पर इसके साथ उन्मुक्ति भी खतरनाक होगी। शिक्षक-स्नातक निर्वाचक मंडल वह वर्ग है जो भर्ती घोटालों, पेपर लीक और रोजगार की गुणवत्ता पर सबसे अधिक गहराई से प्रश्न उठाता है। इन नतीजों की समीक्षा करते समय बीजेपी के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय यह जानना है कि इस वर्ग की नाराजगी कितनी गहरी है और कितनी व्यापक है।
महाराष्ट्र: जीत-हार से बड़ा है गठबंधन का धर्म संकट
महाराष्ट्र की पांच सीटों के नतीजे महायुति के लिए और अधिक चिंताजनक हैं, और इसकी मुख्य वजह चुनाव परिणाम नहीं, बल्कि उनके बाद की वाणी है। भाजपा, शिवसेना (शिंदे गुट) और एनसीपी (अजित पवार गुट) की साझेदारी वाली सरकार को पांच में से मात्र दो सीटें मिलीं। शरद पवार गुट दो सीटों पर जीता, नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर चुकी है और अजित पवार गुट का खाता पूरी तरह खाली रहा।
नागपुर की जीत का प्रतीकात्मक वजन सबसे अधिक है, क्योंकि यह शहर आरएसएस का मुख्यालय है और यहीं से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तथा केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की राजनीतिक पहचान जुड़ी है। अपने ही केंद्रीय शिविर के मैदान में कांग्रेस उम्मीदवार की दूसरी लगातार जीत इस बात का प्रमाण है कि शिक्षक-स्नातक निर्वाचक मंडल किसी संस्था की प्रतिष्ठा को भी अपने मूल्यांकन से ऊपर नहीं रखता। परंतु महाराष्ट्र का वास्तविक संदेश गठबंधन के भीतर से निकला है।
भाजपा नेता नवनाथ बन का आरोप कि पुणे और नागपुर में सहयोगी दल होने के बावजूद शिवसेना ने अपेक्षित सहयोग नहीं किया और मंत्री नितेश राणे का प्रश्न कि क्या महायुति के भीतर कोई “शकुनि मामा” उद्धव ठाकरे की पसंद के अनुसार काम कर रहे हैं – ये दोनों बयान इस बात की घोषणा हैं कि गठबंधन का विश्वास के स्तर पर अपघटन हो रहा है। सत्तारूढ़ गठबंधन के अंदरूनी नेताओं के ऐसे सार्वजनिक आरोप ही सबसे स्पष्ट संकेत हैं कि समन्वय की कमी संकट के स्तर तक पहुंच चुकी है।
एकनाथ शिंदे का नेताओं को विवाद न बढ़ाने का निर्देश और आत्ममंथन की सलाह सही कदम है, पर एनसीपी (शरद गुट) नेता सुप्रिया सुले तथा मंत्री छगन भुजबल का महायुति और अपनी-अपनी पार्टी दोनों से गंभीर समीक्षा की अपील यह स्पष्ट करती है कि यह समस्या किसी एक दल तक सीमित नहीं है। जब गठबंधन के अपने ही मंत्री “आत्ममंथन” की बात कहें, तो बाहर के आलोचकों को कुछ नया कहने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।
कर्नाटक: सत्तारूढ़ कांग्रेस का शून्य समीकरण
कर्नाटक के नतीजे विपक्षी दृष्टि से सबसे विचारणीय हैं। सत्तारूढ़ कांग्रेस चार सीटों पर खाता खोलने में भी असफल रही, जबकि भाजपा ने तीन सीटें जीतीं और उसके सहयोगी जद(स) को एक सीट मिली — यानी एनडीए ने विपक्षी सरकार वाले राज्य में सफाई कर दी। किसी सत्तारूढ़ पार्टी के लिए अपने ही राज्य में खाता शून्य रहना राजनीतिक रूप से बेहद असहज स्थिति है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की प्रतिक्रिया दो अर्थों में व्याख्या योग्य है। एक ओर उन्होंने हार को सामान्य उतार-चढ़ाव बताते हुए पार्टी की पकड़ पर संदेह न करने का आग्रह किया, और दूसरी ओर बीजेपी को टोकते हुए कहा कि यदि उसे अपना प्रदर्शन इतना बढ़िया लगता है तो वह संसद भंग कर बैलेट पेपर से चुनाव करवा ले।
परंतु भाजपा नेता जगदीश शेट्टार की प्रतिक्रिया इसी स्थान पर विपक्ष को असहज करती है — उनकी बात में एक कड़वा तथ्य है कि इन सीटों पर बैलेट पेपर से मतदान हुआ, और फिर भी कांग्रेस शून्य पर सिमट गई। जो पार्टी लगातार ईवीएम को संशय का विषय बताती है, उसके लिए बैलेट चुनाव में हार का स्पष्टीकरण देना कठिन हो जाता है।
कर्नाटक में गारंटी योजनाओं की सरकार को शिक्षक-स्नातक वर्ग के समर्थन का विस्तार मिलना चाहिए था, पर परिणाम इसके विपरीत रहा। यह संकेत कांग्रेस के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस निर्वाचक मंडल का मूल्यांकन योजनाओं की लोकप्रियता और शासन की गुणवत्ता दोनों पर अलग-अलग पैमानों से होता है।
बैलेट पेपर बनाम ईवीएम-इन नतीजों से उपजी एक और बहस
इन चुनावों का एक ऐसा पहलू भी है जो राष्ट्रीय चुनाव प्रणाली की बहस से जुड़ा है। शिक्षक-स्नातक सीटों पर मतदान बैलेट पेपर से होता है और इसी कारण खरगे जैसे वरिष्ठ नेता इसे “बैलेट पेपर” चुनाव बताकर ईवीएम के संशय को फिर से राजनीतिक जमीन देने का प्रयास करते हैं।
परंतु कर्नाटक और महाराष्ट्र के नतीजे इस तर्क को अपने ही भार से तोड़ते हैं – जहां बैलेट से मतदान हुआ, वहां भी विपक्षी दल हार गए और उनके लिए इससे आसान बहाना नहीं रहा। बैलेट पेपर पर तो धोखे की संभावना सबसे कम मानी जाती है, फिर भी नतीजे बदले नहीं। इससे ईवीएम-विरोधी तर्क को राजनीतिक असरदारिता का तो मिल सकता है, तार्किक विश्वसनीयता नहीं।
नतीजों के बड़े सबक: सत्ता में बैठे सभी शिविर निशाने पर
यदि इन चार राज्यों के नतीजों को एक साथ रखकर देखें, तो चित्र जो उभरता है वह चौंकाने वाला है —
- बिहार में विधानसभा जीतने वाले एनडीए को शिक्षक-स्नातक वर्ग में भारी निराशा का सामना करना पड़ा।
- उत्तर प्रदेश में भाजपा को लखनऊ-वाराणसी जैसे प्रतीकात्मक गढ़ों में हार मिली।
- महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ महायुति की जीत अपने सहयोगियों के ही आरोपों से दूषित हो गई।
- कर्नाटक में कांग्रेस अपने ही राज्य में शून्य पर आ गई।
यानी चारों ओर सत्तारूढ़ शिविर ही झटका झेल रहा है। पर यहां एक और संयम की अपेक्षा भी आवश्यक है। इन सीटों की जीत का बड़ा हिस्सा निर्दलीय और क्षेत्रीय उम्मीदवारों के पक्ष में गया है — जिसका अर्थ यह है कि यह वोट किसी विकल्प की खोज में दिया गया, किसी विकल्प की घोषणा करने के लिए नहीं।
विपक्षी दलों को इन नतीजों को “सेमीफाइनल जीत” मानकर आत्मविभोषित होने से सावधान रहना होगा, क्योंकि निर्दलीय जीत का अर्थ प्रायः विपक्ष की विफलता भी होता है, उसकी विजय नहीं।
सत्ताधारी दलों के लिए बड़ा सबक यह है कि जिस वर्ग की अपेक्षा संवाद, स्पष्टता और न्याय पर होती है, उसे सिर्फ योजनाओं और घोषणाओं से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। शिक्षक-स्नातक निर्वाचक मंडल आने वाले समय की सार्वजनिक विमर्श का अगुआ वर्ग भी है — इसका मिजाज धीरे-धीरे पूरे समाज में प्रसारित होता है।



























