संघ बदलेगा या सिर्फ भाषा? थरूर ने रखी कसौटी

Shashi Tharoor's statement on the RSS: शशि थरूर ने RSS की तारीफ करते हुए संघ के बदलते रुख और ‘RSS 2.0’ पर सवाल उठाए हैं। क्या मोहन भागवत के बयान संगठन में वास्तविक बदलाव का संकेत हैं? जानिए, क्या सेक्युलर भारत और संघ साथ चल सकते हैं।

शशि थरूर ने RSS की तारीफ कर कांग्रेस को चौंकाया!

HIGHLIGHTS

  • सह-अस्तित्व संभव है, समर्पण नहीं
  • बदलाव का वादा या रणनीति का चेहरा?
  • भागवत की नई भाषा, पुराना तंत्र?
  • जब कांग्रेसी ने संघ की तारीफ की

Shashi Tharoor’s statement on the RSS: भारतीय राजनीति में कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जो अपने उत्तर से ज़्यादा अहम होते हैं, क्योंकि उन्हें पूछने का अंदाज़ ही एक बयान बन जाता है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर का हालिया लेख ऐसा ही दस्तावेज़ है। संघ के शताब्दी समारोह के समापन — विजयादशमी, 20 अक्टूबर 2026 — के मद्देनज़र लिखे गए इस लेख की चर्चा दो वजहों से हो रही है।

पहली, एक कांग्रेस नेता ने आरएसएस के सेवा-योगदान की सराहना और सरसंघचालक मोहन भागवत के नरम होते रुख की तारीफ की है, जो अपने आप में असामान्य है। दूसरी, उन्होंने जो दो सवाल खड़े किए हैं — क्या वाकई कोई ‘आरएसएस 2.0’ अस्तित्व में आ रहा है, और क्या धर्मनिरपेक्ष भारतीय इस संगठन के साथ सामंजस्य की कोई राह बना सकते हैं — वे सवाल किसी एक पार्टी या विचारधारा के नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के हर नागरिक के सामने खड़े हैं।

यह स्वीकार करना होगा कि ऐसा लेख लिखने का राजनीतिक खतरा भी है। कांग्रेस के भीतर थरूर के प्रति उस समय से शक की दृष्टि रही है, जब से उन्हें भारत सरकार की ओर से विदेश के शुमार होने पर सौगात में एक प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला। आलोचक इस लेख को भी उनकी ‘नरमी’ की कड़ी में जोड़ना चाहेंगे। पर एक दूसरा नज़रिया यह भी है — कि सत्ताधारी विचारधारा के सबसे बड़े आलोचक-खेमे से आई आवाज़ जब बातचीत की थाली थमाती है, तो उसे फेंकने से पहले एक बार खोलकर देख लेना ज़रूरी है। यह संपादकीय वही कोशिश है।

1925 से 2026 तक: एक सांस्कृतिक प्रतिक्रिया का सत्ता तक सफर

वर्ष 1925 में नागपुर में विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने जो छोटा-सा मंच सजाया था, उससे निकला संगठन आज के भारत की सबसे प्रभावशाली सामाजिक-राजनीतिक ताक़तों में से एक है। इसकी तादाद इसी बात से समझी जा सकती है कि संघ के अपने दावों के मुताबिक़ आज देशभर में क़रीब 55,683 स्थानों पर 88,949 दैनिक शाखाएं चलती हैं और इसके प्रेरित नेटवर्क में जुड़े संगठनों की संख्या बताई जाती है लगभग बत्तीस।

इसी नेटवर्क से निकली भारतीय जनता पार्टी आज केंद्र और कई राज्यों में सत्ता में है। यानी वह संगठन, जिसने ख़ुद को हमेशा ‘राजनीति से अलग’ सांस्कृतिक ताक़त पेश किया, उसकी विचारधारा का राजनीतिक प्रतिनिधि सत्ता की सर्वोच्च सीढ़ी पर खड़ा है।

इतिहास इतना सीधा नहीं रहा। संघ की शुरुआत ‘हिंदुओं के संगठित होने की कमी’ वाली चिंता से हुई थी, और उसका फोकस शुरू से ही ब्रिटिश शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि हिंदू समाज को एकजुट करना रहा। यही वजह है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान संघ और कांग्रेस के रास्ते कभी नहीं मिले। जहां कांग्रेस के कार्यकर्ता लाठियां खाकर जेलें भर रहे थे, वहीं संघ आंदोलनों से खुद को दूर रखने को अपनी ‘अनुशासन’ कहता रहा।

आज़ादी के बाद पहला बड़ा दौर भी कड़वाहट का रहा — गांधी हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा, और वह तब्तील लिखकर ही हटा। आगे चलकर संघ ने जन-सेवा, शिक्षा और संगठन-कौशल के ज़रिए समाज में जो गहरी जड़ें बनाईं, उससे यह संगठन धीरे-धीरे नेतृत्व तैयार करने वाला देश का सबसे बड़ा फैक्ट्री-गेट बन गया — चाहे पार्टी-राजनीति का नेतृत्व हो या विचार का।

असहजता के आधार: सेक्युलर नाराज़गी बेवजह नहीं

थरूर ने सच कहा है कि उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष भारतीयों की संघ को लेकर असहजता बिना आधार के नहीं है। इस असहजता की जड़ें इतिहास में हैं — स्वतंत्रता संग्राम से दूरी, आज़ादी के ठीक पहले बंगाल में हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग की तालमेल वाली सरकार में संघ-प्रेरित तत्वों की भूमिका, और राष्ट्र की परिभाषा को धर्म से जोड़ने वाला वह वैचारिक ढांचा जो गोलवलकर के शुरुआती लेखन में साफ पढ़ा जा सकता है।

स्वतंत्र भारत में भी यह असहजता तब गहराई से रूप धारण करती है जब सांप्रदायिक हिंसा के हर बड़े दौर में हिंसक भीड़ों के पीछे हिंदुत्व-प्रेरित ताक़तों का हाथ देखा गया है, और संघ-परिवार की ओर से उस ज़िम्मेदारी को लेने और खोलकर आत्म-मुआयना करने की जगह दूरी बना ली गई है।

अतीत के दर्ज इतिहास को नकारना अपरिपक्वता होगी। संविधान निर्माताओं में से बहुतों की नज़र में संघ का ‘राष्ट्र’ की अवधारणा संविधान की नागरिक-केंद्रित परिभाषा से अलग खड़ा था — एक धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान पर टिका राष्ट्र बनाम एक नागरिक समानता पर टिका गणतंत्र। यह मौलिक अंतर आज भी मौजूद है, और यही अंतर है जो ‘सामंजस्य’ के सवाल को गंभीर बनाता है। सामंजस्य तभी संभव है जब इस अंतर को स्वीकार करने से मुकरने की बजाय, दोनों पक्ष इसे खुले मैदान में बहस का विषय बनाएं।

सेवा का हिसाब: जिसे कोई भी नकार नहीं सकता

आलोचना की सच्चाई के साथ सराहना की सच्चाई भी जोड़ना ही इमानदार आकलन है। बंटवारे की जलती रातों में संघ के स्वयंसेवकों ने — ख़ासकर पंजाब में — हिंदू और सिख शरणार्थियों के पुनर्वास का काम किया। आगे चलकर हर राष्ट्रीय संकट में — युद्ध, भूकंप, बाढ़, भूस्खलन, महामारी — संघ और उसकी सेवा शाखा ‘सेवा भारती’ की टिमों सरकारी तंत्र से पहले मैदान में दिखीं। विद्या भारती के स्कूलों और एकल विद्यालयों ने ऐसे दूरदराज़ के जंगलों और पहाड़ों में पहुंच बनाई, जहां सरकारी तंत्र को रास्ता लगता है। रक्तदान, स्वास्थ्य शिविर, स्लमों में सहारा — इन कामों की तारीफ वैचारिक विरोधियों ने भी की है, और यही सबसे बड़ी गवाही है।

देश के छोटे कस्बों और गांवों में लाखों नौजवानों के लिए संघ कोई ‘साज़िश का अड्डा’ नहीं, बल्कि सुबह की शाखा, साझा मैदान, अनुशासन, समाजसेवा और जीवन-ज्योति का नाम है। इस सच्चाई को अनदेखा करके सेक्युलर पक्ष यह भूल जाता है कि आलोचना और घृणा में फर्क होता है। जो समाज के करोड़ों लोगों की रोज़ की ज़िंदगी से जुड़ा संगठन है, उसे सिर्फ शापित करने वाली भाषा बहस को जीतती नहीं, गोलमाल कर देती है। थरूर के लेख की सबसे बड़ी ताक़त यही है कि वह आलोचना और पहचान को साथ रखकर बोलता है।

‘आरएसएस 2.0’: बदलाव कितना गहरा, कितना उथला?

मोहन भागवत के हाल के बयान इस मंथन का केंद्र हैं। उन्होंने सार्वजनिक मंचों और लंबे साक्षात्कारों में कहा है कि इस्लाम भारत आया और भारत में ही रहेगा; कि हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग खोजने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि देश को नई तक़सीम की बजाय साझा भविष्य चाहिए; कि हिंदू धर्म उकसावे से बचना सिखाता है, आक्रमण नहीं।

उन्होंने ‘हिंदुत्व’ की परिभाषा भी बदली है — उसे ‘भारतीयता’ के बराबर कहकर, हिंदू राष्ट्र को बहुसंख्यक शासन नहीं, समावेशी सभ्यतागत विरासत के रूप में पढ़ाया है। संघ के पहले के आक्रामक लहजे से मुक़ाबले में ये बयान निश्चित रूप से सुलझे हुए हैं।

पर सवाल यह है कि यह ‘आरएसएस 2.0’ है या सिर्फ ‘आरएसएस 2.0 की भाषा’? फर्क समझना ज़रूरी है। बदलाव तब होता है जब भाषा के साथ संस्थागत व्यवहार भी बदले — जब संघ-परिवार के अखबारों और प्रकाशनों में वही सुलझा स्वर दिखे, जब संघ-संचालित शिक्षण सामग्री में मुस्लिम-विरोधी और झूठे आरोपों की लकीरें उभरने बंद हों, जब संगठन अपने समर्थकों की हिंसक या घृणित हरकतों पर सार्वजनिक और साफ-साफ उंगली उठाए।

भागवत के साक्षात्कार अब तक बताते हैं कि सरसंघचालक की ज़ुबान नई है, पर संगठन की नसों में वही खून दौड़ता हुआ दिखता है। आलोचकों ने इन साक्षात्कारों को उतारने-सुनने से इंकार भी किया — जो इस बात का सबूत है कि ‘नया लहजा’ संगठन-तंत्र के हर हिस्से तक अभी उतरा नहीं है।

शब्द और कर्म की दूरी: वह जगह जहां संघ चूक रहा है

थरूर का सबसे तीखा आरोप यही है, और वह हड़बड़ाया हुआ नहीं लगता। सोशल मीडिया पर हिंदुत्व के नाम पर चलने वाले मीम पेज, ट्रोल आर्मी और कानून अपने हाथ में लेने वाले ‘विजिलेंटे’ — इनका व्यवहार सीधे-सीधे भागवत की उस भाषा के खिलाफ जाता है जो ‘समावेशी भारतीयता’ की बात करती है।

संघ का अपना तंत्र इतना अनुशासित और विस्तृत है कि अगर वह चाहे तो अपने डिजिटल और सड़कीय पारिस्थितिकी तंत्र को उपद्रव से रोक सकता है। लेकिन ऐसा कोई प्रमुख उदाहरण नहीं मिलता जब संघ ने सार्वजनिक रूप से अपने इकोसिस्टम के किसी तत्व को घृणित भाषा के लिए खारिज किया हो या उसे अनुशासित किया हो।

यह चुप्पी दो तरह पढ़ी जा सकती है। पहली पढ़ाई: संघ सचमुच बदल रहा है, पर उसका नियंत्रण अपने ही उपमंडलों पर कमज़ोर है। दूसरी पढ़ाई: यह चुप्पी रणनीतिक है — सामने वाला चेहरा नरम रहे तो अंतरराष्ट्रीय और नागरिक दबाव कम हो, और पीछे का तंत्र अपना काम करता रहे। जब तक संघ इस दोयम दर्जे की चुप्पी को तोड़कर अपने तंत्र को अनुशासित नहीं करता, ‘आरएसएस 2.0’ की कहानी एक अधूरे शब्द जैसी रहेगी — बोली गई, पर वादा नहीं।

35 साल से कम उम्र का भारत: नया जज, नई कसौटी

थरूर ने एक ऐसा पहलू भी उठाया है जिसे आमतौर पर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है — भारत की मीडियन आयु सिर्फ क़रीब अट्ठाईस-अनत्ताईस साल है और देश की एक-तिहाई से ज़्यादा आबादी पैंतीस की होचुकी नहीं है। इस भारत के लिए संघ का पुराना इतिहास पाठ्यपुस्तक की किस्सा-गोई नहीं, बल्कि वर्तमान की खबरें हैं।

वे युवा संघ को इतिहास की किताबों में नहीं, अपने फोन की स्क्रीन पर और शहर की गलियों में परखेंगे — यह देखकर कि उनके नाम पर कौन बोल रहा है, कौन डंडे चला रहा है, कौन घृणा खिला रहा है। इस पैमाने पर अभी का रिकॉर्ड कमज़ोर है, और यह चेतावनी संघ को ही नहीं, उसके हर प्रेरित संगठन को है। दिलचस्प यह भी है कि संघ-संचालित मंचों पर छापे सर्वेक्षणों में भी पुराने स्वयंसेवकों ने सवाल उठाए हैं कि क्या संघ ने नई पीढ़ी की ज़रूरतों के हिसाब से खुद को ढाला है। यानी ‘आरएसएस 2.0’ की मांग सिर्फ बाहर से नहीं, भीतर से भी आ रही है।

सेक्युलर भारतीयों की दुविधा: सह-अस्तित्व संभव है या नहीं?

अब मूल सवाल पर आते हैं — क्या धर्मनिरपेक्ष भारतीय संघ के साथ मिलकर रह सकते हैं? पहला ईमानदार उत्तर यह है कि ‘मिलकर रहना’ और ‘हर शर्त स्वीकार कर लेना’ एक चीज़ नहीं है। लोकतंत्र में सह-अस्तित्व का मतलब है — प्रतिद्वंद्वी के अस्तित्व को स्वीकारना, बहस के मैदान को खुला रखना और संविधान को सर्वोच्च पंथ मानकर सभी विचारधाराओं को उसी की कसौटी पर तोलना।

संघ की ‘भारतीयता = हिंदुत्व’ वाली परिभाषा अगर संविधान की नागरिक-समानता वाली परिभाषा के अधीन रहकर अपना राजनीतिक-सांस्कृतिक जोर आजमाती है, तो वह प्रतिद्वंद्वी है, शत्रु नहीं — और प्रतिद्वंद्वी के साथ गणतंत्र रहता ही है। लेकिन अगर उसका लक्ष्य संविधान की परिभाषा को ही बदल देना हो, तो सेक्युलर पक्ष का कर्तव्य है कि वह उसे जमकर और संगठित होकर रोके।

दूसरा उत्तर खुद सेक्युलर पक्ष की ज़िम्मेदारी का है। संघ के अरबों-खरबों नहीं, लाखों स्वयंसेवकों को ‘हर हाल में दुश्मन’ मानकर चलने से कुछ हासिल नहीं होगा — वे इस देश के नागरिक हैं, उनके बीच से ही समाज बनता है। सेक्युलर पक्ष को अपनी भी परीक्षा देनी होगी: अपनी सामाजिक जड़ें वापस जमाना, सेवा की तरकीबें सीखना, और संघ की सराहना करने वालों को तुरंत ‘दलबदलू’ कहकर खारिज करने की आदत छोड़ना। थरूर जैसे लेख ठीक इसी दरवाज़े से टकराते हैं — और उन्हें दरवाज़े पर खड़े रहने देना, बाहर फेंकने की बजाय बेहतर है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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