लोकतंत्र में असहमति का अधिकार और पीस बॉण्ड की राजनीति

जब शांतिपूर्ण विरोध को व्यवस्था के लिए खतरा समझा जाने लगे, तब नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करने की जिम्मेदारी न्यायपालिका पर और अधिक बढ़ जाती है। कानून का उद्देश्य शांति स्थापित करना है, लेकिन शांति के नाम पर नागरिकों की आवाज दबाना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है।

जंतर-मंतर से पीस बॉण्ड तक, आखिर डर किसे है?

HIGHLIGHTS

  • आंदोलन करना गुनाह है या लोकतंत्र का अधिकार?
  • मोदी सरकार में विरोध की आवाज पर पहरा क्यों?
  • सरकार को विरोध से डर लगता है या सवालों से?
  • लोकतंत्र में खामोशी जरूरी या सवाल पूछना जरूरी?

लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा चुनावों के दौरान नहीं, बल्कि उस समय होती है जब सत्ता के फैसलों पर सवाल उठाए जाते हैं। किसी देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था कितनी मजबूत है, इसका आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वहां नियमित चुनाव होते हैं या सरकारें संवैधानिक प्रक्रिया से बनती हैं। यह देखना भी उतना ही आवश्यक है कि वहां असहमत विचारों के लिए कितनी जगह बची है, सरकार की आलोचना करने वाले नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है और अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरने वाले लोगों को अपराधी की तरह देखा जाता है या लोकतंत्र के सक्रिय भागीदार की तरह।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में विरोध की परंपरा स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक सामाजिक आंदोलनों तक फैली हुई है। यहां जनता ने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर अनेक बार इतिहास की दिशा बदली है। आजादी की लड़ाई में सभाएं हुईं, जुलूस निकले, धरने दिए गए और औपनिवेशिक शासन की नीतियों को खुलकर चुनौती दी गई। अंग्रेजी हुकूमत इन गतिविधियों को व्यवस्था के लिए खतरा बताती थी, लेकिन भारतीय जनता के लिए यही संघर्ष स्वतंत्रता की आधारशिला था। इसलिए आज जब किसी शांतिपूर्ण आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हम असहमति के प्रति पर्याप्त लोकतांत्रिक सहिष्णुता बनाए रख पाए हैं?

शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर पाबंदी का सवाल

दिल्ली का जंतर-मंतर लंबे समय से राजनीतिक, सामाजिक और नागरिक आंदोलनों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। यहां विभिन्न संगठनों, कर्मचारियों, किसानों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपनी मांगों को सार्वजनिक रूप से उठाया है। किसी आंदोलन स्थल पर प्रतिबंध या प्रदर्शन की अनुमति से संबंधित शर्तें लगाना प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है। राजधानी में सुरक्षा, यातायात और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना भी सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन इन आवश्यकताओं और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना उतना ही महत्वपूर्ण है।

यदि किसी स्थान पर प्रदर्शन की अनुमति सीमित की जाती है, तो प्रशासन को उसके पीछे ठोस कारण बताने चाहिए। प्रतिबंध आवश्यक, उचित और परिस्थितियों के अनुपात में होना चाहिए। केवल इस आशंका के आधार पर नागरिकों की आवाज को सीमित नहीं किया जा सकता कि उनका विरोध सरकार के लिए असुविधाजनक साबित हो सकता है। लोकतंत्र में सरकार की सुविधा और नागरिकों की स्वतंत्रता हमेशा एक ही दिशा में नहीं चलतीं। कई बार नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रशासनिक असुविधा को स्वीकार करना पड़ता है।

कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके, सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे से जुड़े घटनाक्रम तथा जंतर-मंतर पर तिरंगा आंदोलन के संदर्भ में पीस बॉण्ड का प्रश्न इसी व्यापक बहस को सामने लाता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इन युवाओं की गिरफ्तारी के बाद उनसे भविष्य में शांति बनाए रखने संबंधी मुचलका लिया गया। दूसरी ओर, नेहा बोरा ने कथित तौर पर ऐसे मुचलके पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया। इन घटनाओं को लेकर सार्वजनिक चर्चा में यह सवाल उठाया गया कि क्या शांति बनाए रखने की कानूनी प्रक्रिया का इस्तेमाल नागरिकों के विरोध करने के अधिकार को सीमित करने के लिए किया जा सकता है।

यहां किसी व्यक्ति के निर्णय को वीरता और किसी दूसरे के निर्णय को कमजोरी का प्रमाण मान लेना उचित नहीं होगा। किसी कानूनी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने या उससे इनकार करने का निर्णय परिस्थितियों, उपलब्ध कानूनी सलाह और व्यक्तिगत विवेक पर निर्भर करता है। लोकतांत्रिक आंदोलन में व्यक्तियों के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उन मतभेदों को आंदोलन की एकता तोड़ने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।

पीस बॉण्ड: शांति का आश्वासन या स्वतंत्रता पर दबाव?

पीस बॉण्ड यानी शांति बनाए रखने का मुचलका अपने आप में कोई नया कानूनी विचार नहीं है। भारतीय कानून में ऐसे प्रावधान लंबे समय से मौजूद रहे हैं, जिनके अंतर्गत सक्षम प्राधिकारी कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति से भविष्य में शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र देने की मांग कर सकते हैं। इन प्रावधानों का घोषित उद्देश्य संभावित अशांति को रोकना है, न कि किसी व्यक्ति को उसकी राजनीतिक राय बदलने या सरकार की आलोचना बंद करने के लिए बाध्य करना।

यहीं कानून की भावना और उसके व्यावहारिक इस्तेमाल के बीच अंतर को समझना आवश्यक है। शांति बनाए रखने का आश्वासन देना और अपनी आवाज हमेशा के लिए बंद कर देना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। कोई नागरिक किसी कानूनी प्रक्रिया के तहत बंधपत्र देता है, तो इससे अपने आप उसका शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का मौलिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। इसी तरह, किसी व्यक्ति का सरकार की आलोचना करना या किसी नीति के खिलाफ नारे लगाना मात्र इस बात का प्रमाण नहीं है कि उसने शांति भंग की है।

हालांकि, इस विषय पर कानूनी स्थिति को सरल बनाकर प्रस्तुत करना भी ठीक नहीं होगा। बंधपत्र की शर्तें, संबंधित कानूनी प्रावधान, सक्षम प्राधिकारी का आदेश और कथित उल्लंघन की प्रकृति यह तय करने में महत्वपूर्ण होते हैं कि किसी विशेष मामले में क्या परिणाम हो सकते हैं। इसलिए यह कहना कि हर पीस बॉण्ड केवल औपचारिकता है, उतना ही गलत होगा जितना यह दावा करना कि उस पर हस्ताक्षर करने वाला व्यक्ति भविष्य में किसी भी विरोध प्रदर्शन में भाग नहीं ले सकता।

कानून का सही अर्थ उसके वास्तविक प्रावधानों और न्यायिक व्याख्याओं से समझा जाना चाहिए। किसी भी नागरिक को यह अधिकार है कि वह अपने विरुद्ध की जा रही कानूनी कार्रवाई का आधार जाने, उसकी वैधता को चुनौती दे और आवश्यक होने पर न्यायालय की शरण ले। प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शांति बनाए रखने के नाम पर मनमानी शर्तें न थोपी जाएं।

संविधान की कसौटी पर राज्य की शक्ति

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार प्रदान करता है। इन अधिकारों पर संविधान के अंतर्गत कुछ उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि नागरिक स्वतंत्रता असीमित नहीं है, लेकिन उस पर लगने वाला प्रत्येक प्रतिबंध भी स्वतः वैध नहीं हो जाता।

लोकतंत्र की संवैधानिक व्यवस्था में राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति दी गई है। लेकिन इस शक्ति का इस्तेमाल संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही किया जाना चाहिए। प्रशासन किसी वास्तविक खतरे को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठा सकता है, परंतु केवल आलोचना, असहमति या सरकार विरोधी विचारों को अशांति का पर्याय नहीं माना जा सकता।

एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल व्यक्ति और हिंसा भड़काने वाले व्यक्ति के बीच स्पष्ट अंतर करना जरूरी है। यदि कोई प्रदर्शनकारी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है, हिंसा करता है या दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन यदि नागरिक शांतिपूर्वक अपनी मांग रख रहे हैं, तो उनके विरुद्ध कार्रवाई का आधार भी स्पष्ट, प्रमाणित और कानूनी होना चाहिए।

यह अंतर जितनी गंभीरता से प्रशासन समझेगा, उतना ही लोकतंत्र मजबूत होगा। कानून की विश्वसनीयता इस बात से नहीं बढ़ती कि उसका इस्तेमाल अधिक से अधिक लोगों पर किया जाए। उसकी विश्वसनीयता तब बढ़ती है जब उसका इस्तेमाल निष्पक्षता, आवश्यकता और समानता के सिद्धांतों के अनुरूप होता है।

न्यायपालिका की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?

जब नागरिकों को लगता है कि प्रशासनिक कार्रवाई उनके मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर रही है, तब न्यायपालिका उनके लिए संवैधानिक संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम बनती है। न्यायालय का दायित्व केवल विवादों का निपटारा करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि राज्य की शक्ति कानून की सीमाओं से बाहर न जाए।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ सरकार के हर फैसले का विरोध करना नहीं है। इसी तरह, संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा बनाए रखने का अर्थ सरकार की प्रत्येक कार्रवाई को सही ठहराना भी नहीं है। एक स्वतंत्र न्यायालय को उपलब्ध तथ्यों, कानून और संविधान के आधार पर निर्णय लेना चाहिए, चाहे उस निर्णय से सरकार सहमत हो या असहमत।

नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में न्यायिक समीक्षा विशेष महत्व रखती है। यदि किसी व्यक्ति पर अनुचित शर्तें लगाई गई हैं, उसे बिना पर्याप्त आधार के रोका गया है या शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को प्रभावित किया गया है, तो न्यायालय को उस कार्रवाई की वैधता की जांच करनी चाहिए। दूसरी ओर, यदि प्रशासन के पास कानून के अनुरूप कार्रवाई करने के पर्याप्त आधार हैं, तो उन्हें भी निष्पक्षता से परखा जाना चाहिए।

न्यायपालिका से अपेक्षा यह नहीं है कि वह हर आंदोलन का समर्थन करे। उससे अपेक्षा यह है कि वह प्रत्येक नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे। न्याय का पैमाना आंदोलन की विचारधारा, प्रदर्शनकारी की राजनीतिक पहचान या सरकार के प्रति उसके रुख से निर्धारित नहीं होना चाहिए।

इतिहास में न्यायालयों की प्रतिष्ठा उन अवसरों पर स्थापित होती है जब वे लोकप्रिय दबावों से ऊपर उठकर संवैधानिक सिद्धांतों का पालन करते हैं। नागरिक स्वतंत्रता के मामलों में न्यायिक सक्रियता और न्यायिक संयम के बीच संतुलन आवश्यक है। अदालत को न तो प्रशासन की हर दलील को अंतिम सत्य मानना चाहिए और न ही तथ्यों की जांच किए बिना किसी कार्रवाई को असंवैधानिक घोषित करना चाहिए।

युवाओं के संघर्ष को समझने की जरूरत

लोकतांत्रिक आंदोलनों में भाग लेने वाले युवाओं के सामने अक्सर कठिन विकल्प होते हैं। एक तरफ वे अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना चाहते हैं, दूसरी तरफ गिरफ्तारी, कानूनी खर्च, परिवार पर पड़ने वाले दबाव और भविष्य की अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे में किसी युवा के निर्णय का मूल्यांकन केवल इस आधार पर करना कि उसने मुचलके पर हस्ताक्षर किए या नहीं, उसके संघर्ष की व्यापकता को कम करके देखना होगा।

मार्कंडेय काटजू जैसे पूर्व न्यायाधीशों द्वारा पीस बॉण्ड पर हस्ताक्षर करने वाले युवा कार्यकर्ताओं की आलोचना किए जाने के संदर्भ में भी यही दृष्टिकोण उपयोगी है। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय व्यक्तियों को अपने विचार रखने का अधिकार है। कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाना और नागरिक स्वतंत्रता के पक्ष में बोलना भी आवश्यक है। लेकिन संघर्ष कर रहे युवाओं को केवल इसलिए कठघरे में खड़ा कर देना कि उन्होंने किसी परिस्थिति में अलग रास्ता चुना, आंदोलन के लिए उपयोगी नहीं है।

कानून और लोकतांत्रिक अधिकारों के बारे में युवाओं को सही जानकारी देना अधिक महत्वपूर्ण है। उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि उनके अधिकार क्या हैं, प्रशासन किन परिस्थितियों में कार्रवाई कर सकता है, किसी आदेश को चुनौती देने का तरीका क्या है और गिरफ्तारी या बंधपत्र की स्थिति में कानूनी सहायता कैसे प्राप्त की जा सकती है।

भगत सिंह और अशफाकउल्ला खान जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का उल्लेख करते समय उनके साहस और त्याग से प्रेरणा ली जा सकती है। लेकिन उनके संघर्षों को आज के प्रत्येक कानूनी विवाद पर सीधे लागू करना उचित नहीं होगा। औपनिवेशिक शासन की परिस्थितियां और वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था अलग हैं। आज नागरिकों के पास संविधान, न्यायालय और वैधानिक उपचारों का सहारा है। इन माध्यमों का प्रभावी इस्तेमाल करना भी लोकतांत्रिक संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

किसी भी आंदोलन की सफलता केवल गिरफ्तारियां देने या कठोर परिस्थितियों का सामना करने से निर्धारित नहीं होती। उसका उद्देश्य जनसमर्थन जुटाना, मुद्दे को व्यापक विमर्श का हिस्सा बनाना और नीतिगत बदलाव के लिए लोकतांत्रिक दबाव तैयार करना भी होता है। इसलिए आंदोलनकारियों को भावनात्मक साहस के साथ कानूनी समझ और रणनीतिक विवेक की भी जरूरत है।

कानून का इस्तेमाल चयनात्मक नहीं होना चाहिए

लोकतंत्र के प्रति जनता का भरोसा तभी कायम रहता है, जब कानून का इस्तेमाल सभी के लिए समान दिखाई देता है। यदि एक राजनीतिक विचारधारा से जुड़े लोगों को प्रदर्शन की पर्याप्त स्वतंत्रता मिले और दूसरी विचारधारा के लोगों को समान परिस्थितियों में कठोर कार्रवाई का सामना करना पड़े, तो निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे।

इसी तरह, किसी वीडियो, भाषण या सार्वजनिक बयान के कारण पैदा हुए विवाद में भी यह देखना जरूरी है कि कार्रवाई का कानूनी आधार क्या है। यदि कोई सामग्री कानून का उल्लंघन करती है, तो उसके विरुद्ध निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए। लेकिन यदि केवल राजनीतिक असुविधा के कारण सामग्री हटाई जाती है या आलोचना करने वाले व्यक्ति को निशाना बनाया जाता है, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए चिंताजनक स्थिति होगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उद्योगपति गौतम अडानी के संबंधों को लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित किसी वीडियो के हटाए जाने जैसी घटना का मूल्यांकन भी तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। वीडियो क्यों हटाया गया, किस प्राधिकारी ने कार्रवाई की, क्या कानूनी आदेश मौजूद था और क्या संबंधित पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला—इन सवालों के जवाब के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है।

फिर भी, व्यापक सिद्धांत स्पष्ट है: सरकार, राजनीतिक दलों, उद्योगपतियों और सार्वजनिक संस्थाओं से संबंधित विषयों पर आलोचनात्मक चर्चा को केवल इसलिए प्रतिबंधित नहीं किया जाना चाहिए कि उससे शक्तिशाली लोगों को असुविधा होती है। सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है।

शांति का अर्थ यह नहीं कि समाज में कोई सवाल न पूछे। शांति का अर्थ यह भी नहीं कि सरकार के निर्णयों पर बहस बंद हो जाए। वास्तविक शांति न्याय, विश्वास और नागरिकों की भागीदारी से पैदा होती है। भय के कारण पैदा हुई खामोशी और लोकतांत्रिक सहमति से बनी शांति में बुनियादी अंतर है।

पीस बॉण्ड पर बहस में कानूनी सटीकता जरूरी

इस पूरे विवाद में कानूनी प्रावधानों का सही उल्लेख भी उतना ही आवश्यक है जितना नागरिक स्वतंत्रता का समर्थन। भारतीय दंड संहिता और भारतीय न्याय संहिता के बीच प्रावधानों के क्रमांक तथा कानूनी संरचना में अंतर है। इसलिए किसी लेख या सार्वजनिक वक्तव्य में पुरानी और नई धाराओं को एक-दूसरे के समान बताने से पहले आधिकारिक कानूनी पाठ की जांच होनी चाहिए।

इसी प्रकार, शांति बनाए रखने के लिए बंधपत्र लेने की प्रक्रिया, उसके उल्लंघन के परिणाम और संबंधित मजिस्ट्रेट की शक्तियों के बारे में कोई निश्चित दावा करने से पहले लागू कानून तथा संबंधित न्यायिक फैसलों को देखना आवश्यक है। प्रत्येक मामले में परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। किसी कानूनी प्रावधान की अधिकतम सजा, बंधपत्र की अवधि और राशि से संबंधित निष्कर्ष भी संबंधित कानून के सत्यापन के बाद ही प्रस्तुत किए जाने चाहिए।

कानूनी बहस को मजबूत बनाने के लिए अतिशयोक्ति की जरूरत नहीं होती। तथ्य, संविधान और न्यायिक निर्णय अपने आप में पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं। यदि प्रशासन ने किसी नागरिक के अधिकारों का अनुचित हनन किया है, तो उसका प्रमाण सामने लाना चाहिए। यदि किसी कार्रवाई को लेकर कानूनी भ्रम है, तो उसे स्पष्ट करना चाहिए। इससे नागरिक स्वतंत्रता का पक्ष अधिक विश्वसनीय बनता है।

लोकतंत्र को शोर से नहीं, संवाद से बचाया जा सकता है

भारत का लोकतंत्र केवल संसद, विधानसभाओं और चुनावों तक सीमित नहीं है। यह उन नागरिकों में भी जीवित रहता है जो सार्वजनिक नीतियों पर सवाल उठाते हैं, अन्याय के विरुद्ध आवाज बुलंद करते हैं और बेहतर शासन की मांग करते हैं। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए सरकार को आलोचना सुनने का धैर्य रखना होगा और नागरिकों को अपने अधिकारों के साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझना होगा।

प्रदर्शन के अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन स्थापित करना संभव है। इसके लिए प्रशासन को स्पष्ट नियम बनाने चाहिए, प्रदर्शन की अनुमति संबंधी निर्णयों में पारदर्शिता रखनी चाहिए और प्रतिबंधों को आवश्यक सीमा तक ही लागू करना चाहिए। नागरिकों को भी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और कानून का सम्मान करने का प्रयास करना चाहिए। किसी पक्ष की गलती दूसरे पक्ष को असीमित अधिकार नहीं दे देती।

न्यायपालिका की जिम्मेदारी इस संतुलन की संवैधानिक सीमा निर्धारित करना है। जब अधिकारों और प्रशासनिक शक्तियों के बीच टकराव हो, तो न्यायालयों को कानून के शासन की रक्षा करनी चाहिए। सरकार बदलती रहती है, राजनीतिक प्राथमिकताएं बदलती रहती हैं और सार्वजनिक विमर्श के मुद्दे भी समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन संविधान के मूल सिद्धांत स्थायी महत्व रखते हैं।

भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी विविधता और असहमति को स्थान देने की क्षमता में निहित है। सरकार की आलोचना करना देश का विरोध करना नहीं है। किसी नीति के खिलाफ प्रदर्शन करना संवैधानिक व्यवस्था को अस्वीकार करना नहीं है। बल्कि शांतिपूर्ण और जिम्मेदार असहमति लोकतंत्र को उसकी कमियों से परिचित कराती है और सुधार की संभावना पैदा करती है।

लोकतंत्र में शांति आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है न्यायपूर्ण शांति। ऐसी शांति जिसमें नागरिकों को चुप रहने के लिए मजबूर न किया जाए, बल्कि उनकी बात सुनने और समस्याओं का समाधान करने की व्यवस्था मौजूद हो। यदि भारत को एक सशक्त लोकतंत्र के रूप में आगे बढ़ना है, तो उसे असहमति को खतरा नहीं, बल्कि अपनी संवैधानिक जीवंतता का प्रमाण समझना होगा। यही नागरिक स्वतंत्रता की असली कसौटी है और यही न्यायपालिका, सरकार तथा समाज—तीनों की साझा जिम्मेदारी भी।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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