खरगे-अखिलेश पर मायावती का बड़ा हमला, नेताओं को सुनाई खरी-खरी

Mayawati's major statement: यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बयानबाजी तेज हो गई है। मल्लिकार्जुन खरगे की 'पीएम मोदी के पिता' पर टिप्पणी और अखिलेश के 'घुसपैठिया' बयान के बाद मायावती ने कहा- चुनाव को 'नाक की लड़ाई' न बनाएं। जानें पूरा मामला।

मायावती ने खरगे को दी कड़ी चेतावनी

HIGHLIGHTS

  • खरगे और अखिलेश को मायावती की फटकार
  • मायावती ने लगाया राजनीति का स्तर गिरने का आरोप
  • घुसपैठिया वाले बयान ने गरमाई सियासत
  • मायावती बोलीं- यह लोकतंत्र के लिए खतरा

Mayawati’s major statement: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां अभी से थर्मामीटर पार कर चुकी हैं और राजनीतिक पटल पर बयानों की जंग भी शुरू हो गई है। एक तरफ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पटना में पीएम मोदी के पिता पर टिप्पणी कर विवाद खड़ा किया, तो दूसरी ओर सपा मुखिया अखिलेश यादव ने सीएम योगी आदित्यनाथ का नाम लिए बिना यूपी में ‘सबसे बड़े घुसपैठिए’ उत्तराखंडियों पर चटखारा लगाया। इन दोनों बयानों के बीच बसपा प्रमुख मायावती ने सभी दलों को फटकार लगाते हुए कहा है कि चुनावी भिड़ंत को ‘नाक की लड़ाई’ में नहीं बदला जाना चाहिए। उन्होंने इस गिरते स्तर की राजनीति पर गहरी चिंता जताई है।

पटना में खरगे का विवादित बयान, मचा बवाल

दरअसल, पिछले दिनों बिहार की राजधानी पटना में कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करते हुए मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा था कि पीएम मोदी बार-बार पूछते हैं कि कांग्रेस ने 60 साल में क्या किया, लेकिन वे भूल जाते हैं कि उनके पिता स्टेशन पर चाय बेचते थे। मंत्री जी, क्या तुम्हारे पिता भी चाय बेचते थे?” यह बयान आते ही भाजपा ने जमकर पलटवार किया और कांग्रेस पर पीएम के परिवार व संघर्ष को कम करने का आरोप लगाया। इसी बयान की गूंज अब यूपी की सियासत में भी सुनाई दे रही है।

मायावती ने खरगे पर साधा निशाना

बसपा सुप्रीमो मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लंबा पोस्ट करते हुए खरगे पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने “सत्ता की भूख” और “गिरते आचार-व्यवहार” का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री के दिवंगत पिता को लेकर दी जा रही टिप्पणियां लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत हैं। मायावती ने अपने घोषणापत्र का हवाला देते याद दिलाया कि उनकी पार्टी हमेशा राजनीति में सम्मानजनक भाषा की वकालत करती रही है और सत्ता जितनी पुरानी होती जाती है, आचरण उतना ही अधिक बिगड़ने लगता है।

‘घुसपैठिया’ वाले बयान पर भी बसपा नाराज

वहीं, अखिलेश यादव के उस बयान पर भी बसपा की नाराजगी छिपी नहीं है, जिसमें उन्होंने बिना नाम लिए कहा था कि यूपी में सबसे बड़ा ‘घुसपैठिया’ उत्तराखंडियों का है। इस टिप्पणी को सीएम योगी के पैतृक गांव पौड़ी गढ़वाल की ओर इशारा माना जा रहा है। मायावती ने पहले भी अपनी पार्टी के प्रवक्ता के जरिए इस बयान को ‘संवैधानिक रूप से सुरक्षित और विकसित करने वाले’ लोगों के सम्मान के खिलाफ बताया था।

‘राजनीति का स्तर गिरा, बयान हुए बेलगाम’

अपने पोस्ट में मायावती ने देश की राजनीति के गिरते स्तर पर चिंता जाहिर करते हुए लिखा कि भारतीय राजनीति में आपसी अविश्वास, द्वेष और कटुता का स्तर अब व्यक्तिगत स्तर तक पहुंचकर पूरी तरह बेलगाम हो चुका है। उन्होंने कहा कि यह भाषा असंसदीय, अमर्यादित, अपमानजनक, संकीर्ण और जातिवाद से ग्रसित होते हुए हिंसक बयानबाजी तक पहुंच गई है। उन्होंने इसे देश की गरिमा और मान-मर्यादा के लिए अति-चिंतनीय बताया।

मायावती ने सभी दलों के शीर्ष नेतृत्व को सीधी सलाह दी है कि पार्टियों के शीर्ष पर बैठे लोग आपस में समुचित सम्मान नहीं दिखा सकते, तो आपत्तिजनक और विषैली राजनीति को बढ़ावा न दें। इस तरह की गिरती स्थिति से जनता का सियासत से भरोसा और कम होगा। संकीर्ण और गरीब-विरोधी स्वार्थी राजनीति से लोकतंत्र कमजोर होगा।

‘जनता में पहले से है बेचैनी’

मायावती ने कहा कि सरकारी स्तर पर व्यापक भ्रष्टाचार की बात और चुनावी प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों के चलते जनता में पहले से ही काफी बेचैनी है। ऐसे वक्त में नेताओं की आपसी ‘नाक की लड़ाई’ स्थिति को और विषम बना रही है। उन्होंने साफ कहा कि दूसरे दलों के नेताओं पर तीखी टिप्पणियां राजनीतिक व्यवस्था को कमजोर करेंगी, जो देश और जनहित — किसी भी लिहाज से उचित नहीं है।

मायावती ने सभी दलों को यह भी समझाया कि जनता की असली चाहत यह है कि सारे नेता बढ़ती गरीबी, बेरोजगारी और महंगाई जैसी ज्वलंत समस्याओं के समाधान पर ध्यान केंद्रित करें। उन्होंने आगाह किया कि अशोभनी टीका-टिप्पणी की होड़ राजनीतिक माहौल को और कड़वा व विषैला बनाएगी, इस पर अगर सब ध्यान दें तो बेहतर होगा।

सियासी जुगालबंदी और आगे का संदेश

बता दें कि यूपी चुनाव 2027 की दहलीज पर ये बयान गठबंधनों की तकरार और दलित व अन्य वर्गों के वोटबैंक पर कब्जे की होड़ का संदेश देते हैं। मायावती का यह संतुलित रुख उन्हें दोनों बड़े गुटों से अलग दिखाने की कोशिश माना जा रहा है। हालांकि, जब तक बहस मुद्दों — रोजगार, महंगाई और विकास — पर नहीं लौटती, तब तक यूपी सियासत में ‘नाक की लड़ाई’ का दौर थमने के आसार कम हैं।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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