Cyclone Tracking: समुद्र में उठने वाला एक छोटा सा मौसमी सिस्टम देखते ही देखते विनाशकारी चक्रवात का रूप ले सकता है। तेज हवाएं, मूसलाधार बारिश और समुद्र में उठने वाली ऊंची लहरें कुछ ही घंटों में तटीय इलाकों की तस्वीर बदल सकती हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि आखिर मौसम वैज्ञानिकों को पहले से कैसे पता चल जाता है कि तूफान कितना शक्तिशाली होगा और किस दिशा में आगे बढ़ेगा? क्या समुद्र के बीच जाकर उसकी रफ्तार मापी जाती है या आसमान में मौजूद सैटेलाइट ही तूफान की पूरी कहानी बता देते हैं?
दरअसल, आधुनिक तकनीक ने चक्रवातों की निगरानी और उनकी दिशा का अनुमान लगाने की प्रक्रिया को काफी उन्नत बना दिया है। इसमें मौसम उपग्रहों, डॉप्लर वेदर रडार, विशेष वैज्ञानिक तकनीकों और सुपरकंप्यूटर की अहम भूमिका होती है। आइए जानते हैं कि चक्रवात की रफ्तार और रास्ते का अनुमान आखिर कैसे लगाया जाता है।
चक्रवात की शुरुआत होते ही सक्रिय हो जाते हैं मौसम उपग्रह
किसी भी चक्रवात की निगरानी का पहला महत्वपूर्ण चरण अंतरिक्ष से शुरू होता है। समुद्र के ऊपर जब कम दबाव का क्षेत्र विकसित होता है और उसके आसपास बादलों का गोलाकार सिस्टम बनने लगता है, तब मौसम वैज्ञानिक सैटेलाइट के जरिए उसकी गतिविधियों पर नजर रखते हैं। भारत के पास INSAT-3D और INSAT-3DR जैसे मौसम उपग्रह हैं। ये उपग्रह लगातार पृथ्वी और समुद्र के ऊपर बन रहे बादलों की तस्वीरें तथा मौसम से जुड़े आंकड़े भेजते हैं।
इन तस्वीरों की मदद से वैज्ञानिक पता लगाते हैं कि बादलों का घेरा किस दिशा में घूम रहा है, उसका आकार कितना बढ़ रहा है और उसके केंद्र के आसपास बादलों की गतिविधियां कैसी हैं। सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारी के आधार पर वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करते हैं कि समुद्र में बना कम दबाव का क्षेत्र सामान्य मौसमी सिस्टम है या धीरे-धीरे चक्रवात में बदल रहा है।
ड्वोरेक तकनीक से पता चलती है तूफान की ताकत
समुद्र के बीचोंबीच हवा की रफ्तार मापना आसान नहीं होता। वहां हर जगह मौसम मापने वाले उपकरण मौजूद नहीं होते। ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक सैटेलाइट से प्राप्त तस्वीरों का विश्लेषण करके तूफान की तीव्रता का अनुमान लगाते हैं।इसके लिए ड्वोरेक तकनीक (Dvorak Technique) का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक विशेष सैटेलाइट आधारित तकनीक है, जिसके माध्यम से चक्रवात के बादलों के स्वरूप और उनकी बनावट का अध्ययन किया जाता है।
इस तकनीक में तूफान के आसपास बनने वाले बादलों के पैटर्न, उनके घुमाव, केंद्रीय घने बादल और आंख जैसी संरचना को देखा जाता है। इन विशेषताओं के आधार पर चक्रवात को एक T-Number दिया जाता है। आमतौर पर T-Number जितना अधिक होता है, चक्रवात की अनुमानित तीव्रता उतनी ही अधिक मानी जाती है। हालांकि, हवा की वास्तविक गति का आकलन करने के लिए अन्य मौसम संबंधी आंकड़ों और वैज्ञानिक विश्लेषण की भी जरूरत होती है। यानी बादलों की तस्वीरें देखकर ही वैज्ञानिक काफी हद तक समझ सकते हैं कि समुद्र में पल रहा तूफान कितना शक्तिशाली हो सकता है।
डॉप्लर वेदर रडार कैसे पकड़ता है तूफान की चाल?
जब चक्रवात तटीय इलाकों के करीब पहुंचने लगता है, तब जमीन पर स्थापित डॉप्लर वेदर रडार (Doppler Weather Radar) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। ये रडार रेडियो तरंगों की मदद से बादलों और बारिश की गतिविधियों का पता लगाते हैं। जब रेडियो तरंगें बादलों में मौजूद पानी की बूंदों और अन्य कणों से टकराकर वापस लौटती हैं, तो रडार उनके आधार पर मौसम की स्थिति का विश्लेषण करता है।
डॉप्लर तकनीक की मदद से वैज्ञानिक हवा की रेडियल वेलोसिटी यानी रडार की दिशा में हवा की गति का अनुमान लगा सकते हैं। इसके अलावा बादलों की संरचना, बारिश की तीव्रता और तूफान के आसपास चल रही हवाओं की गतिविधियों पर भी नजर रखी जाती है। इससे मौसम विभाग को यह समझने में मदद मिलती है कि चक्रवात तट के कितने करीब है और उसके प्रभाव से किन इलाकों में तेज बारिश या तूफानी हवाएं चल सकती हैं। भारत में चक्रवातों की निगरानी के लिए तटीय क्षेत्रों में डॉप्लर वेदर रडार का नेटवर्क स्थापित किया गया है, जो मौसम पूर्वानुमान को अधिक प्रभावी बनाने में मदद करता है।
सुपरकंप्यूटर बताते हैं किस दिशा में जाएगा चक्रवात
चक्रवात की रफ्तार और उसकी मौजूदा स्थिति का पता लगाना एक बात है, लेकिन वह आगे किस दिशा में जाएगा और कहां पहुंच सकता है, इसका अनुमान लगाना कहीं ज्यादा जटिल प्रक्रिया है। इसके लिए मौसम वैज्ञानिक न्यूमेरिकल वेदर प्रेडिक्शन (Numerical Weather Prediction) मॉडल का इस्तेमाल करते हैं। इन मॉडलों में समुद्र की सतह का तापमान, हवा का दबाव, वातावरण में नमी, हवाओं की दिशा और ऊंचाई के अनुसार तापमान में होने वाले बदलाव जैसे आंकड़े शामिल किए जाते हैं।इसके बाद सुपरकंप्यूटर इन आंकड़ों के आधार पर जटिल गणितीय और भौतिक समीकरणों को हल करते हैं।
भारत में मौसम पूर्वानुमान से जुड़े कामों के लिए मिहिर और प्रत्यूष जैसे हाई परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इनकी मदद से मौसम वैज्ञानिक कम समय में बड़ी मात्रा में आंकड़ों का विश्लेषण कर सकते हैं। कई अलग-अलग मौसम मॉडल से प्राप्त परिणामों की तुलना करके यह अनुमान लगाया जाता है कि चक्रवात किस दिशा में आगे बढ़ सकता है और उसके संभावित लैंडफॉल का क्षेत्र कौन सा हो सकता है।
क्या चक्रवात का रास्ता पहले से बिल्कुल सटीक बताया जा सकता है?
मौसम विज्ञान में लगातार तरक्की के बावजूद किसी चक्रवात का रास्ता सौ फीसदी सटीकता से बताना संभव नहीं है। इसकी वजह यह है कि वातावरण लगातार बदलता रहता है।कभी समुद्र के ऊपर चलने वाली हवाओं की दिशा बदल जाती है, तो कभी किसी दूसरे मौसमी सिस्टम का प्रभाव चक्रवात की गति और रास्ते को प्रभावित कर सकता है।
इसी कारण मौसम विभाग समय-समय पर अपने पूर्वानुमान को अपडेट करता है। वैज्ञानिक चक्रवात की स्थिति पर लगातार नजर रखते हैं और नए आंकड़े मिलने के बाद उसके संभावित रास्ते में बदलाव की जानकारी जारी करते हैं। यही वजह है कि चक्रवात से जुड़े पूर्वानुमान में संभावित लैंडफॉल क्षेत्र बताया जाता है, न कि हमेशा किसी एक निश्चित स्थान को ही अंतिम टकराव बिंदु घोषित किया जाता है।


























