Delhi News: दिल्ली के शालीमार बाग इलाके में जनजीवन की थकान के बीच भारी मशीनों का शोर गूंजा। यह शोर किसी निर्माण का नहीं, बल्कि विध्वंस का था। उत्तर-पश्चिम दिल्ली के शालीमार बाग सेक्टर-ए 3 में सुबह-सुबह प्रशासन ने बुलडोजरों की एक बड़ी फौज उतार दी और यह कार्रवाई दिल्ली में सड़क चौड़ीकरण परियोजनाओं को गति देने के लिए उठाया गया एक कठोर कदम है, जिसकी चपेट में आने वाले लोगों के लिए यह किसी बुरे सपने से कम नहीं था।
150 मकानों का तबाहा होना
इस डिमोलिशन ड्राइव के तहत करीब 150 मकानों को जमींदोज कर दिया गया। ये मकान दशकों से लोगों के रहने का एकमात्र सहारा थे, जिन्हें प्रशासन ने कुछ ही घंटों में मलबे में बदल दिया। यह कार्रवाई आउटर रिंग रोड से आजादपुर मंडी को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क को चौड़ा करने के मकसद से की जा रही है। प्रशासन का दावा है कि इस सड़क का निर्माण यातायात व्यवस्था को सुचारू और बेहतर बनाने के लिए जरूरी है, लेकिन इसकी कीमत यहां रहने वाले सैकड़ों परिवारों को चुकानी पड़ रही है।
हाईकोर्ट के आदेश और 30 मई की डेडलाइन
यह कार्रवाई अचानक नहीं हुई है। दरअसल, अप्रैल माह की शुरुआत में दिल्ली हाईकोर्ट ने शालीमार बाग इलाके में एक सार्वजनिक सड़क को चौड़ा करने के लिए विध्वंस की मंजूरी दे दी थी। जस्टिस प्रतिभा सिंह की बेंच ने इलाके के 98 निवासियों को 30 मई तक अपना परिसर खाली करने का सख्त आदेश दिया था। अदालत के इस फैसले के बाद प्रशासन हरकत में आ गया था और उसने प्रभावित लोगों को नोटिस जारी कर दिए थे।
तय समय सीमा के समाप्त होते ही रविवार सुबह प्रशासन ने अपनी तैयारियों को अंजाम देना शुरू कर दिया। जानकारी के मुताबिक, इस परियोजना के तहत संजय गांधी ट्रांसपोर्ट नगर से आजादपुर मंडी तक एक सीधा संपर्क मार्ग विकसित किया जाना है, जिससे आवागमन में आने वाली रुकावटें खत्म हो सकें। लेकिन इस मार्ग के बीच में आने वाले करीब 150 मकानों को हटाया जाना तय किया गया था, जिस पर आज अमल हुआ।
भारी सुरक्षा व्यवस्था और तनावपूर्ण माहौल
किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए इलाके में भारी पुलिस बल और पैरामिलिट्री फोर्स की तैनाती की गई थी। जगह-जगह पुलिसकर्मी और रैपिड एक्शन फोर्स के जवान मौजूद थे। प्रशासनिक अधिकारियों की निगरानी में डेमोलिशन शुरू किया गया, जिससे पूरे इलाके में एक तरह का भय और तनावपूर्ण माहौल बना हुआ था। प्रभावित परिवारों के चेहरों पर चिंता और मायूसी साफ देखी जा सकती थी।
निवासियों की अंतिम कोशिश और निराशा
प्रभावित स्थानीय निवासियों ने अपने आशियानों को बचाने के लिए हर संभव कानूनी विकल्प आजमाए। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी लड़ाई लड़ी। लोगों को उम्मीद थी कि अदालत उन्हें किसी न किसी तरह की राहत देगी, चाहे वह समय सीमा बढ़ाने के रूप में हो या वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में। लेकिन, उन्हें किसी भी स्तर पर राहत न मिलने के बाद उनके सब्र का बांध टूट गया। कोर्ट से मना किए जाने के बाद जब वे वापस लौटे, तो उनके सामने बुलडोजर खड़े थे।
प्रशासन द्वारा दी गई डेडलाइन के मद्देनजर कई परिवारों ने समय रहते अपने घर खाली कर लिए और अपना सामान निकाल लिया। लेकिन, कुछ घरों में अभी भी लोगों का सामान मौजूद बताया जा रहा है, जिसे बचाने के लिए लोगों में हाहाकार मचा हुआ था। बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे अपने घरों के टूटते हुए दृश्य को देखकर भावुक हो उठे। वर्षों से बसे इन परिवारों के लिए यह केवल मकान नहीं, बल्कि उनकी यादें और भावनाएं भी थीं, जो अब मलबे में दफन हो रही थीं।
विकास बनाम आम आदमी का संघर्ष
एक तरफ जहां सरकार और प्रशासन सड़क चौड़ीकरण और विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं और इसे “जनहित” में बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इस विकास की भारी कीमत आम आदमी को चुकानी पड़ रही है। इस घटना ने एक बार फिर शहरी विकास के दौरान होने वाले विस्थापन का मुद्दा उठा दिया है। प्रशासन का तर्क है कि यह सड़क आजादपुर मंडी जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र को ट्रांसपोर्ट नगर से जोड़ेगी, जिससे ट्रैफिक का दबाव कम होगा और आपूर्ति शृंखला में सुधार होगा।
लेकिन, सवाल यह भी उठता है कि क्या विकास के नाम पर गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को बेघर करना उचित है? इन परिवारों का पुनर्वास कैसे होगा? क्या उन्हें उनके घरों का बराबर मुआवजा या वैकल्पिक आवास दिया जाएगा? फिलहाल, इन सवालों के जवाब धुंधले हैं।





















