दिल्ली में सांस लेना खतरे से खाली नहीं, जानिए प्रदूषण की पूरी कहानी

Delhi News: CPCB की स्टडी में दिल्ली के 43.5% स्कूली बच्चों की फेफड़ों की क्षमता सामान्य से कम पाई गई। जानिए पटाखों पर बैन के बावजूद दिल्ली AQI सुधरने क्यों नहीं आ रहा और प्रदूषण के असली स्रोत कौन हैं।

पटाखे बंद, फिर भी दिल्ली की हवा जहरीली क्यों बनी?

HIGHLIGHTS

  • डिब्बे में ग्रीन पटाखे, अंदर नकली! दुकानदारों की ऐसी चालाकी
  • पटाखे नहीं, ये चीजें! दिल्ली प्रदूषण के असली गुनहगार कौन?
  • सर्दी-गर्मी में 52.7% बच्चों के फेफड़े घटे, स्टडी का दावा
  • 2012 की स्टडी, अब भी सटीक! दिल्ली का प्रदूषण संकट

Delhi News: दिल्ली की जहरीली हवा अब सिर्फ सर्दियों की अस्थायी समस्या नहीं रह गई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की एक बड़ी स्टडी में चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया था—राजधानी के 43.5% स्कूली बच्चों के फेफड़ों की क्षमता सामान्य से कम पाई गई। हालिया सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने भी पटाखों से होने वाले प्रदूषण पर गहरी चिंता जताई और कहा कि सिर्फ आदेश और पुलिस की तैनाती से समस्या हल नहीं होगी। लेकिन साल-दर-साल प्रतिबंध के बावजूद दिल्ली AQI सुधर क्यों नहीं रहा? आइए परत-दर-परत समझते हैं।

CPCB स्टडी: हर दूसरा दिल्ली का बच्चा प्रभावित

CPCB की स्टडी ‘Study on Ambient Air Quality, Respiratory Symptoms and Lung Function of Children in Delhi’ में 9 से 17 साल के बच्चों की सेहत का आकलन किया गया, जिसमें दिल्ली के 5,671 बच्चों की तुलना बाहरी इलाकों के 2,245 बच्चों से की गई। स्टडी के मुताबिक, दिल्ली के 43.5% बच्चों की फेफड़ों की क्षमता में कमी पाई गई, जबकि बाहरी इलाकों में यह आंकड़ा 25.7% रहा। दिल्ली में लड़कियां इससे ज्यादा प्रभावित मिलीं, जहां 51% लड़कियों और 39.8% लड़कों में फेफड़ों की क्षमता घटी हुई दर्ज की गई।

वहीं, गंभीर समस्या से जूझ रहे बच्चों का अनुपात दिल्ली में 7.3% था, जबकि बाहरी इलाकों में केवल 2.2%। अध्ययन में 20.3% बच्चों में फेफड़ों की हवा लेने की क्षमता, 13.6% में सांस की नलियों और 9.6% में दोनों से जुड़ी समस्याएं पाई गईं। मौसम के लिहाज से भी स्थिति में अंतर दिखा। मानसून के दौरान प्रभावित बच्चों का आंकड़ा 39.9% था, जो सर्दियों और गर्मियों में बढ़कर 52.7% तक पहुंच गया।

पटाखों पर बैन के बाद भी दिल्ली AQI क्यों नहीं सुधरा?

दिल्ली-NCR में पटाखों की बिक्री पर पाबंदी लगाने की कोशिशें लंबे समय से चल रही हैं। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पारंपरिक पटाखों पर रोक लगाते हुए ग्रीन पटाखों को मंजूरी दी थी। दिसंबर 2025 में सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि 2024 में पूर्ण प्रतिबंध के बाद भी AQI में कोई खास सुधार नहीं दिखा—हालांकि सरकारों ने इसका पर्याप्त डेटा भी पेश नहीं किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि पटाखे प्रदूषण का एक स्रोत जरूर हैं, पर इकलौता स्रोत नहीं।

CJI सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने केंद्र, दिल्ली सरकार और स्थानीय निकायों से कहा कि पार्षदों के जरिए लोगों को जागरूक किया जाए और पटाखा-मुक्त दिवाली को जन-अभियान बनाया जाए। अदालत की स्पष्ट बात थी—बार-बार आदेश जारी करने से उनका उल्लंघन कभी-कभी और बढ़ जाता है।

ग्रीन पटाखे भी ‘प्रदूषण मुक्त’ नहीं

प्रदूषण घटाने के लिए CSIR-NEERI ने ग्रीन पटाखे विकसित किए हैं। इनमें ऐसे रासायनिक फॉर्मूले इस्तेमाल होते हैं जिनसे पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन कम से कम 30% तक घटाया जा सकता है; कुछ फॉर्मूलेशन में PM2.5 और PM10 में और भी ज्यादा कमी दर्ज की गई है। लेकिन ध्यान रहे—ग्रीन पटाखे भी प्रदूषक छोड़ते हैं, इसलिए इनका इस्तेमाल तय नियमों और समय-सीमा के भीतर ही होना चाहिए।

दुकानदारों की चालाकी ने कैसे फेल की निगरानी?

सुनवाई के दौरान अमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने कोर्ट को बताया कि कई दुकानदार ग्रीन पटाखों के डिब्बे बाहर रखकर अंदर चोरी-छिपे सामान्य पटाखे बेच रहे हैं। ऐसे में एजेंसियों के लिए यह पहचानना मुश्किल हो जाता है कि असल में क्या बिक रहा है। यही वजह है कि कोर्ट ने निर्माण से लेकर बिक्री और इस्तेमाल तक—हर स्तर पर निगरानी और पुलिस-प्रशासन-निकायों के बीच बेहतर तालमेल पर जोर दिया।

दिल्ली प्रदूषण के असली जिम्मेदार कौन? विशेषज्ञ रिपोर्ट का खुलासा

दिल्ली में वायु प्रदूषण का स्वरूप मौसम के साथ बदलता रहता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तैयार विशेषज्ञ रिपोर्ट में 2015 से 2025 तक के अध्ययनों के विश्लेषण के आधार पर CAQM की चर्चा में सामने आया कि सर्दियों में PM2.5 प्रदूषण में सेकेंडरी पार्टिकल्स का योगदान सबसे अधिक 20–30% रहता है, जबकि वाहनों से 11–21%, धूल से 4–22%, बायोमास एवं पराली जलाने से 10–14% और उद्योगों से 7–11% प्रदूषण होता है।

वहीं गर्मियों में धूल 27% के साथ प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत बन जाती है, जबकि वाहनों का योगदान 19% और सेकेंडरी पार्टिकल्स का 17% रहता है। इससे स्पष्ट है कि दिल्ली में प्रदूषण केवल सर्दियों की समस्या नहीं है, बल्कि सालभर बना रहता है और मौसम के अनुसार इसके प्रमुख स्रोत बदलते रहते हैं। सर्दियों में कम तापमान, धीमी हवाएं और अधिक नमी प्रदूषकों को वातावरण की निचली परतों में रोककर स्थिति को और गंभीर बना देती हैं।

सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

दिसंबर 2024 में केंद्र सरकार ने संसद में बताया था कि सुप्रीम कोर्ट के 11 नवंबर 2024 के आदेश के बाद दिल्ली पुलिस को पटाखा-प्रतिबंध लागू कराने के लिए विशेष सेल बनाने को कहा गया। सवाल यही है—जब प्रतिबंध के बावजूद बाजार में सामान्य पटाखे बिक रहे हैं, तो एनफोर्समेंट कहां खड़ा है? कोर्ट का संदेश साफ है: दिवाली के आसपास कार्रवाई नहीं, बल्कि पूरे साल गाड़ियों, उद्योगों, निर्माण-धूल और कचरा जलाने पर निगरानी चाहिए।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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