Suspense over Peace Talks: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक अजीब दोहरी चाल में नजर आ रहे हैं। एक ओर वह ईरान के साथ शांति वार्ता के लिए बेचैनी में अपना प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान (इस्लामाबाद) भेज रहे हैं, तो दूसरी ओर सोमवार को उन्होंने साफ-साफ चेतावनी दी कि अगर ईरान के साथ दो हफ्ते का सीजफायर मंगलवार शाम को बिना किसी कामयाबी के खत्म हो जाता है, तो “बहुत सारे बम फटने लगेंगे।”
लेकिन सबसे बड़ा सस्पेंस यह है कि ईरान ने वार्ता में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है और कहा है कि उसके पास इसका कोई प्लान नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि ईरान के साफ इनकार के बावजूद ट्रंप वार्ता को लेकर इतने क्यों बेचैन हैं?
असली डर: ईरान की ‘सीक्रेट वॉर’ और चीन का जाल
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स और ग्लोबल पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि ट्रंप की यह ‘दिखावटी बहादुरी’ और धमकी देना असल में एक गहरी घबराहट को छिपाने की कोशिश है। ट्रंप को डर ईरान की उस ‘सीक्रेट वॉर’ से लग रहा है, जिसे वह चीन की मदद से लड़ रहा है। ट्रंप को अहसास हो गया है कि अमेरिका सीधे तौर पर ईरान से जूझ रहा है, लेकिन इसका असली फायदा चीन उठा रहा है। चीन युद्ध में शामिल हुए बिना ही चुपचाप अमेरिकी डॉलर की रीढ़ को तोड़ने की साजिश रच रहा है। अगर यह साजिश कामयाब हो गई, तो ना सिर्फ अमेरिका का वैश्विक वर्चस्व खत्म हो जाएगा, बल्कि उसकी अर्थव्यवस्था डूब जाएगी।
क्यों है अमेरिका को ‘पेट्रोडॉलर’ का डर?
1970 के दशक से दुनिया भर में तेल की खरीद-फरोख्त सिर्फ अमेरिकी डॉलर (Petrodollar System) में होती है। इस व्यवस्था से अमेरिका को ताकतवर बनाने वाले 3 फायदे मिलते हैं:
- दुनिया के हर देश को तेल खरीदने के लिए डॉलर चाहिए, जिससे डॉलर की कीमत कभी नहीं गिरती।
- तेल बेचने वाले देशों का डॉलर वापस अमेरिकी बैंकों और सरकारी बॉन्ड में निवेश होता है, जिससे अमेरिका को सस्ता कर्ज मिलता है।
- डॉलर मजबूत होने की वजह से अमेरिका के लिए दूसरे देशों से सामान आयात करना बेहद सस्ता पड़ता है।
युआन Vs डॉलर: अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बनेगा कबाड़ा?
ईरान और चीन की रणनीति के मुताबिक, अगर डॉलर की जगह तेल की खरीद-फरोख्त चीन की मुद्रा ‘युआन’ में शुरू हो गई, तो पेट्रोडॉलर व्यवस्था धराशायी हो जाएगी। इसके बाद दुनिया को तेल के लिए डॉलर की जरूरत नहीं रहेगी। डॉलर की ग्लोबल डिमांड गिरेगी और वह एक सामान्य मुद्रा बनकर रह जाएगा। जब देशों के पास जरूरत से ज्यादा डॉलर नहीं होगा, तो वे US बॉन्ड में निवेश करना बंद कर देंगे।

डॉलर कमजोर होने से अमेरिका के लिए आयात महंगा हो जाएगा और दूसरी देशों की मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी सामान सस्ता होगा। इससे अमेरिका में भयंकर महंगाई आएगी और 39-40 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज को चुकाने के लिए अमेरिका को निवेशकों को आसमान छूता ब्याज देना पड़ेगा।
SWIFT से बड़ा खतरा बन रहा चीन का CIPS सिस्टम
अमेरिका दुनिया भर में ‘SWIFT सिस्टम’ के जरिए वित्तीय ताकत जमाए हुए है। यह एक तरह का फाइनेंशियल मैसेंजर है। जिस देश पर अमेरिका प्रतिबंध लगाता है, उसे SWIFT से बाहर कर दिया जाता है, जिससे उस देश का दुनिया से लेन-देन बंद हो जाता है।
लेकिन अब चीन ने ‘CIPS सिस्टम’ विकसित कर लिया है। SWIFT की तरह यह सिर्फ मैसेज नहीं भेजता, बल्कि युआन में पैसे का असली ट्रांसफर भी करता है। ईरान और रूस जैसे देश इसी सिस्टम का इस्तेमाल कर अमेरिकी प्रतिबंधों को धता बता रहे हैं।

ग्रेटर डिप्रेशन का खतरा और ट्रंप की बेचैनी
ट्रंप की बेचैनी को अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक रिपोर्ट और बढ़ा रही है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर ईरान ने हॉर्मुज स्ट्रेट (तेल के व्यापार का सबसे बड़ा रास्ता) को 3 महीने से ज्यादा बंद रखा, तो कच्चे तेल की कीमतें 250 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।
पेट्रोडॉलर पर पहले से मंडरा रहे संकट के बीच अगर तेल इतना महंगा हुआ, तो अमेरिका और यूरोप में ऐसी महंगाई आएगी जिसे ‘ग्रेटर डिप्रेशन’ (1930 की महामंदी से भी बड़ी आर्थिक तबाही) कहा जाएगा।























