पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री इशाक डार ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर भारत के खिलाफ बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि अगर भारत सिंधु नदी प्रणाली से पाकिस्तान के हिस्से का पानी रोकने की कोशिश करता है, तो इसके क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
वियना में क्या कहा पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने?
ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय जल संगोष्ठी को वर्चुअल तरीके से संबोधित करते हुए इशाक डार ने ये बातें कहीं। इस कार्यक्रम को पाकिस्तान के वियना दूतावास और डिप्लोमैटिक एकेडमी वियना के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया था।

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी विवरण के मुताबिक, डार ने कहा कि इस्लामाबाद सिंधु जल संधि और अंतरराष्ट्रीय कानून के अंतर्गत अपने अधिकारों की हिफाजत के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि इस संकल्प को लेकर किसी भी तरह की गलतफहमी नहीं होनी चाहिए।
भारत का नाम लिए बिना दी गीदड़भभकी
रोचक बात यह है कि अपने पूरे संबोधन के दौरान इशाक डार ने एक बार भी भारत का नाम सीधे नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा साफ था। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान को कानूनी रूप से आवंटित पानी से वंचित करने की किसी भी कोशिश के क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा पर गंभीर परिणाम होंगे।
डार ने आगे कहा कि सिंधु नदी प्रणाली पर पाकिस्तान की जो निर्भरता है, वह भूगोल की मजबूरी भी है। जो देश सीमा-पार नदियों की प्रणाली साझा करते हैं, उनके बीच एक स्थायी परस्पर निर्भरता अपने आप विकसित हो जाती है।

साझा पानी का मुद्दा: सहयोग या टकराव?
पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने एक बड़ा बुनियादी सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या साझा जल संसाधनों का प्रबंधन सहयोग और सहमति पर आधारित कानूनी ढांचे के जरिए होगा, या फिर उसे राजनीतिक दबाव और टकराव का हथियार बनाया जाएगा।
उन्होंने पानी को खाद्य सुरक्षा (Food Security) से जोड़ते हुए कहा कि सिंधु नदी घाटी का पानी पाकिस्तान के करीब 25 करोड़ लोगों की जीवन रेखा है। इसलिए इसे किसी भी सूरत में रोकने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
हेग कोर्ट के फैसले को बताया अपनी जीत
इशाक डार ने अपने बयान में परमानेंट कोर्ट ऑफ ऑर्बिट्रेशन (PCA) के हालिया फैसले का भी जिक्र किया। इस साल 31 अगस्त को कोर्ट ने अपने फैसले में भारत से सिंधु जल संधि के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जारी रखने को कहा था।
पाकिस्तान इस फैसले को अपनी बड़ी दिप्लोमेटिक जीत पेश कर रहा है, लेकिन भारत का रुख साफ है। भारत सरकार ने इस कोर्ट के गठन को ही अवैध माना है और स्पष्ट किया है कि अर्बिट्रेशन कोर्ट का इस मामले में कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।
डार ने इस फैसले को “पाकिस्तान की स्थिति की महत्वपूर्ण पुष्टि” बताते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून का एक मौलिक सिद्धांत यही है कि समझौतों का पालन किया जाना अनिवार्य है।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने क्यों स्थगित की IWT?
मामले की जड़ में पिछले साल 22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुआ घिनौना आतंकी हमला है, जिसमें कई निर्दोष पर्यटकों की जान गई थी। इस हमले के बाद भारत ने 65 साल से अधिक समय से चली आ रही सिंधु जल संधि को प्रभावी रूप से स्थगित (Hold in Abeyance) करने का फैसला लिया था।
भारत की ओर से उस समय साफ कहा गया था कि “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।” इस फैसले के बाद से यह संधि दोनों पड़ोसी देशों के बीच दिप्लोमेटिक विवाद का केंद्र बनी हुई है।
क्या है सिंधु जल संधि? (IWT की बुनियादी जानकारी)
यह संधि साल 1960 में वर्ल्ड बैंक की मध्यस्थता से हुई थी। इस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। संधि के तहत पूर्वी नदियाँ—रावी, ब्यास और सतलज—भारत को मिलीं, वहीं पश्चिमी नदियाँ—सिंधु, झेलम और चिनाब—पाकिस्तान के अधिकार में दी गईं।पाकिस्तान बार-बार कहता आया है कि उसका पानी रोकने का कोई भी कदम “युद्ध की कार्रवाई” के बराबर माना जाएगा।























