संध्या समय न्यूज
US-Israel Iran War: मध्य-पूर्व (Middle East) में तनाव एक बार फिर अपने चरम पर है। हाल ही में ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों ने सऊदी अरब को भी अपना निशाना बनाया है। सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी बेसों पर कई हमले हो चुके हैं, जबकि सऊदी वायुसेना ने कई ईरानी ड्रोन को मार गिराते हुए ईरान को कड़ी चेतावनी दी है। अमेरिकी कार्रवाई के बाद ईरान द्वारा कई खाड़ी देशों में अमेरिकी बेसों को टार्गेट करना संकेत देता है कि अब मामला केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रह गया है। इन हमलों के बीच सवाल फिर से उठ खड़ा हुआ है कि आखिर सऊदी अरब और ईरान के बीच इतनी नफरत क्यों है? क्या यह केवल शिया-सुन्नी का धार्मिक विवाद है या फिर यह मध्य-पूर्व में बड़ी ताकत बनने की होड़ है?
जड़ें गहरी, दावें बड़े: धर्म और राजनीति का घालमेल
सऊदी अरब और ईरान के बीच का विवाद दुनिया के सबसे जटिल और पुराने संघर्षों में से एक है। अक्सर इसे केवल शिया-सुन्नी के चश्मे से देखा जाता है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं ज्यादा गहरी और जटिल है।
धार्मिक दावेदारी
सऊदी अरब खुद को सुन्नी इस्लाम का नेता मानता है, क्योंकि इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थान मक्का और मदीना वहीं स्थित हैं। वहीं, दूसरी ओर ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया मुस्लिम देश है। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद से ईरान ने खुद को शिया इस्लाम का रक्षक घोषित कर दिया।
राजनीतिक होड़
जानकारों की मानें, तो यह विवाद धर्म से ज्यादा ‘ताकत की होड़’ है। दोनों देश मुस्लिम जगत (Muslim World) का नेतृत्व करना चाहते हैं और तेल से भरपूर इस इलाके में अपना दबदबा कायम करना चाहते हैं। यह स्थिति ठीक उसी तरह है, जैसे शीत युद्ध (Cold War) के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच दुनिया दो गुटों में बंटी हुई थी।
1979 की क्रांति: रिश्तों का टूटना
इतिहास पलटकर देखें, तो 1979 से पहले दोनों देशों के रिश्ते इतने खराब नहीं थे। दोनों के अमेरिका के साथ अच्छे संबंध थे। लेकिन 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति आई और अयातुल्ला खुमैनी सत्ता में आए। ईरान की नई सरकार ने राजशाही का विरोध करते हुए नारा दिया कि “इस्लाम में राजाओं के लिए कोई जगह नहीं है।” यह सऊदी अरब के शाही परिवार के लिए सीधी चुनौती थी। सऊदी को डर सताने लगा कि कहीं ईरान अपने क्रांतिकारी विचार उनके देश में न फैला दे। यहीं से अविश्वास की खाई गहरी हुई है।
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‘प्रॉक्सी वॉर’: दूसरों की जमीन पर लड़ते दोनों
सऊदी और ईरान कभी सीधे आमने-सामने नहीं लड़े, लेकिन वे ‘प्रॉक्सी वॉर’ (Proxy War) के जरिए एक-दूसरे को नुकसान पहुंचाते रहे हैं। सऊदी वहां की सरकार का साथ देता है, जबकि ईरान हुती विद्रोहियों का समर्थन करता है। इस जंग ने यमन को तबाह कर दिया है। ईरान राष्ट्रपति बशर अल-असद के साथ खड़ा है, तो सऊदी ने विद्रोही गुटों की मदद की। यह खेल इराक और लेबनान तक फैला है। दोनों देश चाहते हैं कि पड़ोसी देशों में ऐसी सरकार बने जो उनके इशारों पर नाचे।
अमेरिका, इजराइल और तेल का गणित
इस संघर्ष में बाहरी शक्तियों की भूमिका भी अहम है। सऊदी अरब दशकों से अमेरिका का करीबी सहयोगी है। सऊदी को अमेरिका से आधुनिक हथियार मिलते हैं, तो अमेरिका को सऊदी से तेल। वहीं, 1979 के बाद से ईरान और अमेरिका के रिश्ते कटु रहे हैं। इसके साथ ही इजराइल एक और अहम कारक है। ईरान इजराइल को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता है। इसी वजह से हाल के सालों में सऊदी और इजराइल के बीच नजदीकियां बढ़ी हैं, क्योंकि दोनों का एक आम दुश्मन ईरान है।
आर्थिक पहलू
तेल की कीमतें भी इस दुश्मनी का एक बड़ा कारण हैं। दोनों ही तेल उत्पादक देश हैं। सऊदी चाहता है कि बाजार उसके नियंत्रण में रहे, जबकि प्रतिबंधों के बावजूद ईरान ज्यादा से ज्यादा तेल बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था को बचाना चाहता है।
क्या शांति संभव है?
मार्च 2023 में चीन की मध्यस्थता में सऊदी और ईरान के बीच एक समझौता हुआ था, जिसमें दोनों ने रिश्तों को सुधारने और दूतावास खोलने पर सहमति जताई थी। यह एक बड़ी उपलब्धि मानी गई थी। लेकिन, दोनों देशों के बीच इतना गहरा अविश्वास है कि उसे मिटने में सालों लग सकते हैं। हाल ही में रिहायशी इलाकों पर मिसाइल हमले और ईरान की आक्रामक मुद्रा ने साबित कर दिया है कि समझौता करना आसान है, लेकिन उसे कायम रखना मुश्किल।


























