Delhi Air pollution and Lung Cancer: दिल्ली-एनसीआर की सांस लेने योग्य हवा को लेकर लंबे समय से चल रही आशंकाएं अब जल्द ही साकार रूप लेने वाली हैं। अक्सर कहा जाता है कि दिल्ली की प्रदूषित हवा में सांस लेना दर्जन भर सिगरेट पीने जैसा खतरनाक है। अब सवाल उठता है कि आखिर इस ‘जहर’ में कितने दिन सांस लेने के बाद इंसान को फेफड़ों का कैंसर हो सकता है? इस सवाल का सटीक और वैज्ञानिक जवाब देने के लिए एम्स (AIIMS) के विशेषज्ञ जुट गए हैं।
क्या है चिंता का विषय?
भारत विश्व के सबसे प्रदूषित देशों में शुमार है और दिल्ली इसका केंद्र बिंदु है। आंकड़ों के मुताबिक, पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर दूसरा सबसे आम कैंसर है, जबकि कुल मामलों में यह चौथे स्थान पर है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि दिल्ली-एनसीआर में उन महिलाओं और युवाओं में भी फेफड़ों का कैंसर तेजी से बढ़ रहा है, जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। यह सीधा संकेत है कि वायु प्रदूषण (Air Pollution) एक बड़ा रिस्क फैक्टर बन चुका है।
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AIRCARE की पहल: भारत में पहली बड़ी स्टडी
इस गंभीर मुद्दे को लेकर एम्स के ‘AIRCARE’ (वायु प्रदूषण और कैंसर अनुसंधान इकोसिस्टम) ने भारत में अपनी तरह की पहली वैज्ञानिक स्टडी शुरू की है। रेडिएशन ऑन्कोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अभिषेक शंकर के नेतृत्व में एक दृढ़ टीम इस अध्ययन पर काम कर रही है। इस टीम में मेडिकल ऑन्कोलॉजी, ऑन्को-एनेस्थीसिया और बायोस्टैटिस्टिक्स विभाग के वरिष्ठ डॉक्टर्स शामिल हैं।
स्टडी का तरीका और उद्देश्य
इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य प्रदूषण के उन महीन कणों (PM 2.5) के संपर्क में आने के बाद फेफड़ों के कैंसर के खतरे का मूल्यांकन करना है। प्रतिभागी:स्टडी में 1615 फेफड़ों के कैंसर के मरीजों को शामिल किया गया है। इसके साथ ही ‘कंट्रोल ग्रुप’ के लिए इन मरीजों के परिवार के 1615 सदस्यों को भी शामिल किया जाएगा। तुलना: परिवार के सदस्यों को इसलिए शामिल किया जा रहा है ताकि वायु प्रदूषण के संपर्क का स्तर लगभग समान रहे और सही परिणाम सामने आ सकें।
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जेनेटिक सिग्नेचर की खोज
डॉ. अभिषेक शंकर का कहना है कि यह अध्ययन सिर्फ आंकड़े ही नहीं जुटाएगा, बल्कि भारतीय आबादी में एक खास ‘जेनेटिक सिग्नेचर’ (Genetic Signature) की खोज करेगा। इसका उद्देश्य यह समझना है कि क्या वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से शुरुआती जेनेटिक बदलाव होते हैं, जो बाद में कैंसर का रूप ले लेते हैं।
क्या मिलेगा नतीजा?
इस स्टडी से प्राप्त जानकारी के आधार पर शोधकर्ता एक ‘रिस्क-आधारित स्क्रीनिंग मॉडल’ तैयार करेंगे। यह मॉडल यह पहचानने में मदद करेगा कि किन लोगों को प्रदूषण के कारण कैंसर होने का जोखिम सबसे ज्यादा है। इससे समय रहते उन लोगों की स्क्रीनिंग और इलाज संभव हो पाएगा, जिससे जान बचाने में मदद मिलेगी और सरकार को नीतियां बनाने में आसानी होगी।




















