राजस्थान में होली की 800 साल पुरानी परंपरा,दूल्हे बनकर निकलते हैं लोग !

होली पर रंग-गुलाल नहीं, बल्कि दूल्हे बनकर निकलते हैं लोग! (फाइल फोटो)

संध्या समय न्यूज


जब पूरा देश धुलंडी पर रंगों की होली खेलकर उत्सव मनाता है, तब राजस्थान के राजसमंद जिले का एक छोटा सा गांव अपनी अनूठी परंपरा के कारण सुर्खियों में रहता है। यहां लोग रंग-गुलाल नहीं खेलते, बल्कि ‘दूल्हा’ बनकर त्योहार मनाते हैं। हाल ही में खेली गई होली के मौके पर भी इस गांव ने 800 साल पुरानी इस परंपरा को निभाया।

800 साल पुरानी है यह अनोखी परंपरा

राजसमंद जिले के बड़ा भाणुजा गांव में होली का त्योहार बिल्कुल अलग अंदाज में मनाया जाता है। यहां धुलंडी के दिन गांव के सभी पुरुष रंग-गुलाल से दूर रहते हैं। इसके बजाय, वे पारंपरिक वेशभूषा—धोती, कुर्ता और साफा पहनकर ‘दूल्हे’ के रूप में सजते हैं। यह परंपरा यहां के लक्ष्मीनारायण मंदिर से जुड़ी हुई है और लगभग 800 वर्षों से निभाई जा रही है।

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फूलडोल महोत्सव का आयोजन

गांव के सभी पुरुष लक्ष्मी नारायण मंदिर प्रांगण के बाहर एकत्रित होते हैं। यहां वे पारंपरिक नृत्य करते हैं और एक-दूसरे से गले मिलकर त्योहार की खुशियां साझा करते हैं। इस विशेष आयोजन को ‘फूलडोल महोत्सव’ के रूप में मनाया जाता है। रंगों की जगह यहां फूलों का इस्तेमाल होता है और भव्य शोभा यात्रा निकाली जाती है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह परंपरा गांव की पहचान बन चुकी है। रंगों से दूर रहकर भी यहां उत्सव का उल्लास कम नहीं होता। यह परंपरा सामाजिक एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक विरासत का संदेश देती है। इस अनोखे त्योहार को देखने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक दूर-दराज से यहां पहुंचते हैं।

डूंगरपुर में ‘पत्थर मार’ होली का खतरनाक अंदाज

वहीं, राजस्थान के दूसरे गांव में होली खेलने का जो तरीका सामने आया, वह काफी चौंकाने वाला है। डूंगरपुर जिले के भीलूड़ा गांव में धुलंडी के मौके पर रंग-गुलाल की जगह ‘पत्थर मार होली’ खेली गई। ढोल की थाप पर दो गुटों ने एक-दूसरे पर जमकर पत्थर बरसाए। इस खतरनाक परंपरा में 31 लोग घायल हो गए। घायलों का इलाज अस्पताल में करवाया गया।

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