केंद्र सरकार की ओर से बड़े UPI लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी MDR लागू करने के प्रस्ताव के बाद राजनीतिक घमासान शुरू हो गया है। आप पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने इस फैसले को लेकर केंद्र पर जोरदार प्रहार किया है। उनका आरोप है कि जिस सरकार ने देश को कैशलेस बनाने के नाम पर डिजिटल भुगतान की आदत डलवाई, वही अब उसी सुविधा के लिए जनता से पैसा वसूलने जा रही है।
‘व्यापारी रिश्तेदार नहीं, बोझ सीधे उपभोक्ता पर पड़ेगा’
संजय सिंह ने सवाल उठाया कि सरकार यह कहकर अपना बचाव कर रही है कि शुल्क व्यापारियों से लिया जा रहा है, आम नागरिक से नहीं। उन्होंने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि”यह कहना बेहद मजाकिया है कि टैक्स दुकानदारों से लिया जा रहा है, तो आम आदमी का उससे कोई सरोकार नहीं।
दुनिया में कोई भी व्यापारी अपनी जेब से ऐसा खर्च नहीं उठाता। वह इसे सीधे अपनी वस्तुओं या सेवाओं की कीमत में जोड़ देगा, और उसकी मार सीधे ग्राहक को पड़ेगी।”
‘फूफा’ पर सियासी चोट
केंद्र के इस कदम पर संजय सिंह ने व्यंग्य के तीर भी चलाए। उन्होंने कहा कि “फूफा बहुत नाराज़ हैं” और उनकी इस नाराज़गी का खामियाजा देश के सामान्य परिवारों को भुगतान करते समय भरना पड़ेगा। उनका यह बयान राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है।
केंद्र की ओर से पेश की गई योजना के मुताबिक 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से ऊपर के UPI भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR चार्ज होगा। ₹75,000 या उससे बड़े लेनदेन के लिए अधिकतम ₹300 तक का शुल्क लगाया जा सकेगा।
छोटे और किराना स्तर के दुकानदारों को इस शुल्क से छूट देने का प्रावधान रखा गया है। दो आम व्यक्तियों के बीच होने वाले P2P भुगतान यानी पर्सनल ट्रांसफर पहले की तरह निःशुल्क बने रहेंगे।
नकद लेनदेन की ओर लौटने का खतरा
आप सांसद ने सबसे बड़ी चिंता डिजिटल अर्थव्यवस्था को लगाते हुए कहा कि शुल्क लागू होते ही दुकानदार ग्राहकों को ऑनलाइन पेमेंट करने से मना करने लगेंगे। उन्होंने कहा कि “कल को दुकानदार यही कहेगा कि भाई, कैश लाओ। पांच-दस हजार रुपये घर से निकालकर लाइए, UPI से पैसा नहीं चलेगा। सरकार ने बरसों मेहनत करके लोगों को डिजिटल भुगतान की आदत डलवाई और अब उसी आदत पर टैक्स का पहाड़ खड़ा कर दिया।”
निर्मला सीतारमण के बयान पर भी उठे सवाल
संजय सिंह ने संसद में पूर्व वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा दिए गए आश्वासन का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें संसद के अंदर साफ-साफ बताया गया था कि किराने की दुकानों और लघु व्यापारियों पर किसी तरह का टैक्स थोपा नहीं जाएगा। उन्होंने कहा कि अब जो व्यवस्था लाई जा रही है, वह उस पुराने वादे के ठीक उलट है और इसकी सबसे बड़ी कीमत साधारण नागरिक चुकाएंगे।
उन्होंने बताया कि रोजमर्रा की जरूरतों में ₹2,000 से ऊपर का बिल बनना कोई असामान्य बात नहीं है। राशन, सब्जी, किराना या घरेलू सामान की खरीद में अक्सर ₹5,000 से ₹6,000 तक का भुगतान हो जाता है। ऐसे में यह शुल्क महीने-दर-महीने परिवारों के बजट पर अतिरिक्त दबाव बनेगा।
‘₹1,800 करोड़ कमाई के बाद भी कितना चाहिए?’
संजय सिंह ने आर्थिक आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि UPI सिस्टम से सरकार को पहले से ही करीब ₹1,800 करोड़ रुपये का फायदा हो रहा था। उन्होंने सरकार से कड़वा सवाल भी खड़ा किया है कि आपने ऑनलाइन ट्रांजैक्शन की बेहतरीन व्यवस्था खड़ी की, उससे ₹1,800 करोड़ का लाभ हो रहा था।
फिर भी आप कह रहे हैं कि सुविधा देने के बदले अतिरिक्त शुल्क दिया जाएगा। आखिर सरकार को कितना मुनाफा चाहिए? इससे लगता है कि जनता से वसूली का कोई न कोई रास्ता निकाला जा रहा है।
अपने बयान के अंत में संजय सिंह ने केंद्र सरकार से मांग की कि वह इस प्रस्ताव पर एक बार फिर गंभीरता से सोचे। उनका कहना है कि जो नीतियां देश को डिजिटल भुगतान से दूर धकेलकर वापस नकद प्रणाली की ओर ले जाएं, वे आर्थिक दृष्टि से पिछड़ेपन की ओर कदम हैं और ऐसे फैसलों पर तुरंत रोक लगानी चाहिए।


























