भारतीय राजनीति में ऐसे अपेक्षाकृत कम मुद्दे रहे हैं, जो हर बार उठने पर उसी तीव्रता से बहस को जन्म देते हों, जितनी तीव्रता समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी (Uniform Civil Code) करती है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का हालिया बयान कि भारतीय जनता पार्टी नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार वाले राज्यों में 2029 से पहले समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी।
एक बार फिर देश की राजनीतिक चूल्हे को हिला गया है। यह बयान महज एक नीतिगत घोषणा नहीं है; यह आगामी राजनीतिक दौर के लिए एक एजेंडा सेट करने की कोशिश भी है और गठबंधनों की कसौटी भी।
इस बयान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसने सिर्फ विपक्ष को ही नहीं, बल्कि एनडीए के भीतर ही असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) की ओर से आए अलग-अलग सुरों ने साफ तौर पर दिखा दिया है कि यूसीसी जैसा मुद्दा दलों के बीच वैचारिक दरारें कितनी गहरी बना सकता है।
वहीं विपक्ष शिविर में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए यूसीसी का एक ऐसा ‘नया फुलफॉर्म’ पेश किया है, जो भाजपा के पुराने चुनावी वादों को ही उसके खिलाफ हथियार बना देता है।
अखिलेश यादव का ‘नया यूसीसी’
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कन्नौज से सांसद अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखकर वह किया, जो आज के दौर की राजनीति की खासियत बन चुका है—मुद्दे को सीधे जनता की भाषा में, ट्विटर-फ्रेंडली अंदाज में पेश करना।

उन्होंने लिखा, “पहले पिछले वादे निभाओ, यूसीसी फिर बाद में लाओ। नया जुमला न लेकर आओ और न जनता को बहकाओ। 15 लाख खाते में पहुँचाओ, यूसीसी फिर बाद में लाओ। 2 करोड़ नौकरी दिलवाओ, यूसीसी फिर बाद में लाओ। सबका साथ कर दिखाओ, यूसीसी फिर बाद में लाओ। सबका विकास ढूंढ़ दिखाओ, यूसीसी फिर बाद में लाओ।”
यह प्रतिक्रिया सतही रूप से एक व्यंग्य भर लग सकता है, लेकिन इसके भीतर गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी है। अखिलेश यादव यह कोशिश कर रहे हैं कि यूसीसी जैसे भावनात्मक और ध्रुवीकरण करने वाले मुद्दे को आर्थिक मुद्दों—बेरोजगारी, महंगाई, अधूरे वादों—की तुलना में रखकर छोटा कर दिया जाए।
यह रणनीति नई नहीं है। विपक्ष लंबे समय से यही कोशिश करता आया है कि चुनावों का मुद्दा सांस्कृतिक नहीं, बल्कि आर्थिक बनाया जाए। लेकिन अखिलेश की अपनी दिक्कत यह भी है कि पिछले कुछ चुनावों में उनके गढ़ उत्तर प्रदेश में भाजपा ने यही ध्रुवीकरण का खेल खेलकर उन्हें हराया है।

ऐसे में उनकी यह प्रतिक्रिया उनके अपने वोटबैंक को साधने की भी कोशिश है, खासकर तब जब प्रशांत किशोर जैसे चुनावी रणनीतिकारों के ‘परिवर्तन’ की बातें यूपी की सियासत में गूंज रही हैं।
बिहार की सियासत: जदयू का रुख और गठबंधन की दरारें
अमित शाह के बयान के बाद सबसे नाजुक स्थिति बिहार में पैदा हुई है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जदयू सालों से समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट रखती आई है। पार्टी ने कई मौकों पर कहा है कि वह यूसीसी के सिद्धांत से सहमत नहीं है और इसे राज्यों की भावनाओं के खिलाफ थोपना उचित नहीं मानती। नीतीश कुमार ने संसद की स्थायी समिति के सामने भी यह आपत्ति दर्ज कराई थी।
अब जब गृह मंत्री खुद कह चुके हैं कि एनडीए शासित राज्यों में 2029 से पहले यूसीसी लागू होगी, तो जदयू के सामने सवाल खड़ा होता है—क्या बिहार भी उन राज्यों में शामिल होगा? अगर हाँ, तो जदयू अपना पुराना रुख बदलेगी या एनडीए के भीतर ही असहमति जाहिर करेगी? जदयू की ओर से आए अलग-अलग बयानों ने यही अटकलें तेज कर दी हैं। महागठबंधन तो वैसे भी इस मुद्दे पर भाजपा को घेरने में लगा है, लेकिन असली दरार एनडीए के भीतर दिख रही है।
यहाँ एक राजनीतिक विडंबना भी समझनी जरूरी है। बिहार में नीतीश कुमार का पुराना साथी तेजस्वी यादव और राजद पहले ही यूसीसी का विरोध करते आए हैं। ऐसे में अगर जदयू सख्ती से विरोध की स्थिति में आती है, तो महागठबंधन भाजपा और जदयू के बीच दरार को बड़ा करने की कोशिश करेगा।
अगर जदयू चुप्पी साधती है, तो उसके अपने मुस्लिम और अति पिछड़े वोटबैंक पर असर पड़ेगा। नीतीश कुमार की राजनीति का आधार ही ‘सबको साथ लेकर चलने’ वाली छवि रही है, और यूसीसी जैसा मुद्दा उस छवि के लिए चुनौती बन सकता है।
यूसीसी का संवैधानिक आधार
इस पूरी बहस को समझने के लिए संवैधानिक आधार को समझना जरूरी है। भारतीय संविधान के राज्य के नीति निदेशक तत्वों (Directive Principles of State Policy) में अनुच्छेद 44 कहता है कि “राज्य, प्रदेश के समस्त नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता का प्रयास करेगा।” यहाँ ‘प्रयास करेगा’ शब्द का महत्व है—इसे बाध्यकारी आदेश नहीं, बल्कि आदर्श के रूप में देखा गया है।
संविधान सभा में इस अनुच्छेद को लेकर गहन बहस हुई थी। मुस्लिम सदस्यों ने आपत्ति जताई थी कि इससे धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि यूसीसी वांछनीय है, लेकिन उसे लागू करने के लिए समुदायों की सहमति जरूरी है और उसे जबरन थोपा नहीं जा सकता। यही वजह है कि यह अनुच्छेद नीति निदेशक तत्वों में रखा गया, न कि मूल अधिकारों में।
दूसरा पहलू यह है कि समान नागरिक संहिता का मामला समवर्ती सूची (Concurrent List) के अंतर्गत आता है। इसका मतलब है कि केंद्र और राज्य दोनों इस पर कानून बना सकते हैं। उत्तराखंड ने जनवरी 2024 में देश का पहला यूसीसी कानून पारित किया, जो फरवरी 2025 से लागू हो चुका है। गुजरात ने भी समिति बनाकर इस दिशा में कदम बढ़ाया है। अमित शाह का बयान इसी राज्य-स्तरीय प्रयोग को राष्ट्रव्यापी आंदोलन में बदलने की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है।
उत्तराखंड मॉडल: अगले राज्यों के लिए रूपरेखा
उत्तराखंड की यूसीसी संहिता अब भाजपा के लिए एक टेम्पलेट बन चुकी है। इस कानून में विवाह, तलाक, विरासत और उत्तराधिकार से जुड़े नियम सभी धर्मों के लिए समान कर दिए गए हैं। बहुपत्नी प्रथा पर रोक, तलाक की प्रक्रिया को समान बनाना, और जीवनसाथी चुनने में सहमति को अनिवार्य बनाना इसके प्रमुख प्रावधान हैं। कानून में आदिवासी समुदायों को छूट दी गई है, जिससे छत्तीसगढ़ और असम जैसे राज्यों में भी यह मॉडल अपनाने की बातें चल रही हैं।
भाजपा की रणनीति यह प्रतीत होती है कि एक-एक राज्य में यूसीसी लागू करके एक समय आएगा जब केंद्र स्तर पर राष्ट्रीय यूसीसी लाना आसान हो जाएगा, क्योंकि तब बहस ‘यह कानून क्या होगा’ से बदलकर ‘यह तो अधिकतर राज्यों में है’ में बदल जाएगी। यह ‘सैलामी राज्यों के जरिए राष्ट्रीय एजेंडा’ की क्लासिक रणनीति है।
‘2029’ की तारीख़: तामसिक वादा या चुनावी संदेश?
अमित शाह के बयान में ‘2029’ की तारीख़ आकस्मिक नहीं है। 2029 में अगला लोकसभा चुनाव होगा। यह घोषणा दरअसल तीन-तीन चुनावों के लिए एजेंडा तय करती है—2026 के कई राज्यों के चुनाव, 2027 के यूपी समेत बड़े राज्यों के चुनाव और 2029 का लोकसभा चुनाव। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उसके कोर एजेंडे पर कोई समझौता नहीं होगा, चाहे गठबंधन की कीमत कितनी भी चुकानी पड़े।
वहीं विपक्ष की दृष्टि में यह तारीख़ भागने की कोशिश भी है। अखिलेश यादव की टिप्पणी इसी ओर इशारा करती है—पुराने वादे अधूरे हैं, तो नया वादा क्यों? 2014 के ’15 लाख’ और ‘2 करोड़ नौकरियों’ के वादे विपक्ष के पास तैयार बयानबाजी हैं। यूसीसी को 2029 तक की तारीख़ देना विपक्ष को यह कहने का मौका देता है कि भाजपा अगले दशक तक इस मुद्दे को चुनावी हथियार बनाना चाहती है, भले ही वह जमीन पर पूरा हो या न हो।
गठबंधन की राजनीति की कसौटी
अमित शाह के बयान का सबसे दिलचस्प पक्ष यह है कि उसने गठबंधन की राजनीति की असलियत उभार दी है। 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा स्वतंत्र बहुमत से चूक गई थी और एनडीए के सहयोगियों—जदयू, टीडीपी, लोजेपा जैसे दलों—का भार बढ़ गया था। ऐसे में जब भाजपा अपने कोर मुद्दों पर आगे बढ़ती है, तो सहयोगियों को अपने वोटबैंक की गणित देखनी पड़ती है।
जदयू के सामने तो क्लासिक डायलेमा है—एक ओर भाजपा के साथ सरकार में रहना है, दूसरी ओर बिहार के सामाजिक इंजीनियरिंग वाले वोटबैंक को साधना है, जिसमें मुस्लिम और पिछड़े वर्ग का बड़ा हिस्सा है। ऐसे में जदयू के नेताओं के अलग-अलग बयान—कोई यूसीसी का समर्थन करे, कोई विरोध—कोई संयोग नहीं, बल्कि सोची-समझी अस्पष्टता हो सकती है, ताकि दोनों ओर के वोट बचाए रखे जा सकें।
मुस्लिम समाज और अन्य वर्गों की चिंताएं
यूसीसी के विरोध का सबसे बड़ा आधार मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ी चिंताएं हैं। विरोधियों का तर्क है कि यह संहिता संविधान के अनुच्छेद 25 में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से टकराती है और अल्पसंख्यकों की सांस्कृतिक पहचान पर हस्तक्षेप है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य धार्मिक आचार का नियमन नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों—विवाह, तलाक, विरासत—की समानता है। वे यह भी तर्क देते हैं कि यूसीसी महिलाओं के हित में है, क्योंकि उन्हें तलाक और विरासत में समान अधिकार मिलेंगे।
इन दोनों तर्कों के बीच जो बात अक्सर खो जाती है, वह यह है कि आदिवासी समुदायों को छूट देकर यूसीसी को ‘समान’ होने से ही वंचित कर दिया जाता है। इसी तरह हिंदू परिवार कानून में भी अलग-अलग परंपराएं चल रही हैं, जिन पर यूसीसी का प्रभाव पड़ेगा। दूसरे शब्दों में, यूसीसी केवल अल्पसंख्यकों का मुद्दा नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग का मुद्दा है—और इसी को लेकर व्यापक सामाजिक सहमति अब तक नहीं बन पाई है।
विपक्ष की चुनौती: विरोध से आगे बढ़कर विकल्प
विपक्ष के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि उसके पास यूसीसी पर सिर्फ ‘विरोध’ है, विकल्प नहीं। कांग्रेस ने 2024 के घोषणापत्र में यूसीसी को चुनौती देने की बात कही थी, लेकिन उसने स्पष्ट नहीं किया कि वह पर्सनल लॉ को लेकर क्या करेगी। क्या वह धार्मिक परंपराओं की अलग-अलग संहिताएं बनाए रखेगी? क्या वह महिलाओं के अधिकारों के लिए अलग सुधार लाएगी? इन सवालों पर विपक्ष की ओर से ठोस विचार की कमी है।
अखिलेश यादव की ‘फुलफॉर्म’ राजनीति त्वरित प्रभाव डालने वाली है, लेकिन लंबी बहस में विपक्ष को यूसीसी के अंदरूनी पहलुओं—महिला अधिकार, उत्तराधिकार कानून, तलाक की प्रक्रिया—पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। अगर विपक्ष इस मुद्दे को सिर्फ ‘धार्मिक आजादी पर हमला’ के रूप में पेश करता रहा, तो भाजपा को यह कहने का मौका मिलता रहेगा कि वह महिलाओं के समान अधिकारों के पक्ष में है और विपक्ष पुरानी परंपराओं का पक्षधर बनकर रहना चाहता है।























