Maharashtra News: किसी भी राज्य की प्रगति का असली पैमाना उसकी राजधानियों की चमकती इमारतें नहीं, बल्कि उसके सबसे दुर्गम कोने में रहने वाले नागरिक की जीवन-रक्षा की क्षमता होती है। इस पैमाने पर आजल तो महाराष्ट्र का रिकॉर्ड बेहद करुण हो जाता है।
यहां के सत्ताधारी डिजिटल इंडिया, स्मार्ट हेल्थ कार्ड और वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर की बातें करते नहीं थकते, मगर इसी राज्य के जंगलों और पहाड़ों में बसे आदिवासी समाज को आज भी जन्म देने और जीवन बचाने दोनों के लिए आकाश और ज़मीन के बीच भटकना पड़ता है।

नंदुरबार जिले की एक गर्भवती महिला की बांस की झोली में दर्द से कराहती हुई तय कराई सात किलोमीटर की पैदल यात्रा, इस उपेक्षा का वह जीवंत दस्तावेज़ है, जो किसी सफेदपोश सर्वे रिपोर्ट से ज़्यादा सशक्त और अधिक शर्मिंदा करने वाला है।
झोला, टॉर्च और तारीख़-ओ-वक़्त से बाहर खड़ा तंत्र
वेहगी गांव के बारीपाड़ा की रहने वाली फुलवंती देवराम पाडवी के साथ शनिवार की आधी रात वह हो गया, जो इस देश की हर गर्भवती महिला के संविधान में निहित अधिकारों के मुताबिक कभी नहीं होना चाहिए था। प्रसव पीड़ा शुरू हुई, मगर गांव से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था।
न नदी पर पुल, न वाहन चलने लायक़ कोई सड़क। बेबस रिश्तेदारों ने बांस की एक झोली गूंथी, उसमें कराहती फुलवंती को लिटाया और सिर्फ एक टॉर्च की धुंधली रोशनी में सात किलोमीटर का रास्ता पैदल तय किया।

वेहगी पहुंचकर किसी वाहन से पिंपलखुटा स्वास्थ्य केंद्र तक जाना पड़ा। यहां सुबह-सुबह प्रसव हुआ, और फिर कुछ घंटों बाद ही नवजात शिशु के साथ उस मां को उसी झोले में, उसी दर्दनाक रास्ते से वापस लौटना पड़ा।
यह कोई फिल्मी दृश्य नहीं, इक्कीसवीं सदी में एक तथाकथित विकसित राज्य की ज़मीनी हकीकत है। सोचिए, एक ओर जहां शहरों में मरीज़ को घर तक एंबुलेंस पहुंचती है, ड्रोन से दवाएं पहुंचाने के प्रयोग हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एक मां को अपने बच्चे के जन्म के लिए बांस के टुकड़ों पर लिटाया जा रहा है।
यह दूरी महज सात किलोमीटर की नहीं, दो भारतों के बीच की दूरी है — एक डिजिटल भारत की, जो हर फाइल को ऑनलाइन करने का दावा करता है, और दूसरा वह भारत, जहां ज़िंदगी और मौत का फ़ैसला आज भी झोले की रस्सी की मज़बूती से चलता है।

एक अपवाद नहीं, नियम की तरह घटित हो रही त्रासदियां
अगर फुलवंती की कहानी किसी असाधारण दुर्घटना की तरह होती, तो शायद इसे दुर्भाग्य कहकर टाला जा सकता था। मगर महाराष्ट्र के आदिवासी पट्टी का हाल यह है कि यहां ऐसी घटनाएं अपवाद नहीं, बल्कि नियम बन चुकी हैं।
गढ़चिरौली से लेकर नंदुरबार, मेलघाट से लेकर धारनी तक फैले इन इलाकों में यही दिनचर्या है। यहां कुछ वक़्त पहले गढ़चिरौली में एक पिता-माता को अपने दो मासूम बच्चों के शव कंधों पर उठाकर पंद्रह किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, क्योंकि न वहां एंबुलेंस थी, न शववाहन।
एक ओर जहां मां झोले में नए जीवन को दुनिया तक लाने निकली, वहीं दूसरी ओर अभिभावक अपने बच्चों को अंतिम यात्रा पर रवाना करने पैदल चले। जीवन और मृत्यु — दोनों के लिए इन गांवों में सरकारी व्यवस्था एक समान ग़ायब है।
यहां की तस्वीर का हर हिस्सा उसी उदासीनता का अनुप्राय है। कुछ गांवों में स्कूल जाने वाले बच्चे नदी पर फैली रस्सी के पुल से आते-जाते हैं, जिनके नीचे बहता पानी हर रोज़ मौत की चेतावनी देता है। कहीं खाट या बिस्तर न होने के कारण ज़मीन पर सोई आदिवासी बच्चियों को सांप के काटने से जान गंवानी पड़ती है।
डायरिया और सिकल सेल जैसी बीमारियों का ऐसा घेरा है कि हर साल हज़ारों परिवार अपने सबसे क़ीमती सहारे से हाथ धो बैठते हैं। और इन सबके ऊपर कुपोषण का साया है, जो आदिवासी बच्चों की नियति बनकर ठहर गया है। मेलघाट की घाटियों में कुपोषित बच्चों के शवों की गिनती दशकों से जारी है, मगर इस गिनती को रोकने के लिए तंत्र की ओर से होने वाली पहल उससे कहीं धीमी साबित हो रही है।
हाईकोर्ट की फटकार: जब न्यायपालिका भी थक जाए
इस मुद्दे पर सबसे कड़वा और सबसे सटीक बयान मुंबई हाईकोर्ट से आया, जिसने कुपोषण से होती लगातार बाल मृत्युओं के मामले में सरकार को खुलकर लताड़ा था।
अदालत का यह वाक्य इतिहास की पंक्तियों में दर्ज होना चाहिए — कि आदिवासी बच्चों का कुपोषण कोई स्वतंत्र, अलग-थलग समस्या नहीं है, बल्कि यह सरकारी तंत्र की जानबूझकर या लापरवाही से की जा रही नाकामी का नतीजा है। इन शब्दों में वह सच है, जिसे सत्ता के गलियारों में बड़े-बड़े शब्दों की परतों के नीचे दबाकर रखा गया है।
दर्दनाक यह है कि न्यायपालिका की इतनी साफ और सख्त आवाज़ का भी कार्यपालिका पर गहरा असर नहीं पड़ा। फटकार सुनी गई, शायद कुछ फाइलें हिलीं, कुछ बैठकें हुईं, मगर ज़मीन पर वह कुछ नहीं बदला, जो बदलना चाहिए था।
मेलघाट में मौतें जारी हैं। झोले अब भी उसी तरह रेंग रहे हैं। सड़कें अब भी काग़ज़ की घोषणाओं में अधूरी हैं। यह बात याद रखने योग्य है कि सरकारी नाकामी की ज़िम्मेदारी किसी एक दल या एक सरकार की नहीं है — यह विरासती विफलता है, जिसमें हर पिछली सरकार ने अपना हिस्सा जोड़ा है। मगर सवाल आज अतीत का नहीं, वर्तमान का है, क्योंकि आज की ज़िम्मेदारी आज की सत्ता पर है।
बजट की घोषणाएं और उनकी हवा में उड़ान
मार्च के राज्य बजट में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कई आकर्षक घोषणाएं की गई थीं। आंकड़ों की लंबी सूचियां पेश की गईं। नए अस्पतालों, एंबुलेंस बेड़े, विशेषज्ञों की नियुक्ति और आदिवासी क्षेत्रों के लिए विशेष पैकेज की बातें हुईं।
मगर ज़मीनी हकीकत यह है कि वे घोषणाएं या तो हवा में उड़ गईं, या फिर बदइंतजामी की भेंट चढ़ गईं। यह कोई नई बात नहीं है — महाराष्ट्र में आदिवासी कल्याण के लिए रक़म बरसों से आवंटित होती रही है और बरसों से यह भी होता रहा है कि वह रक़म या तो खर्च ही नहीं होती, या खर्च होकर भी उसका नतीजा ज़मीन पर नहीं दिखता।
जब बजट ग्रेमी होता है तो उसका बोझ भी ग्रेमी ही उठाते हैं। घोषणाओं के इस तमाशे का बोझ वही गर्भवती महिला उठाती है जो झोले में लिटी रात के अंधेरे में रास्ता तय करती है; वही बोझ वह पिता उठाता है जो बच्चों के शव कंधों पर लादकर चलता है। फाइलों में अस्पताल बन जाते हैं, मगर गांवों तक डॉक्टर नहीं पहुंचते।
नीतियों में एंबुलेंस की बात होती है, मगर पहाड़ों में सड़क ही नहीं होती। यह विसंगति इसलिए बनी रहती है, क्योंकि नीति बनाने वालों के जीवन में इन समस्याओं का कभी सामना नहीं होता। जिसके घर में शौचालय है, बिजली है, अस्पताल पांच मिनट की दूरी पर हैं, उसके लिए झोला और रस्सी का पुल सिर्फ़ सर्वे रिपोर्ट की एक पंक्ति है।
संवैधानिक दृष्टि से यह किसी घोटाले से कम नहीं
इस पूरी बदहाली को हमें महज “विकास की चुनौती” या “दुर्गम इलाकों की कठिनाई” कहकर हल्का नहीं किया जा सकता। संविधान की धारा 21 के तहत जीवन का अधिकार सिर्फ़ जीवित रहने का अधिकार नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार है — जिसमें स्वास्थ्य देखभाल की न्यूनतम सुविधा शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों में यह स्पष्ट माना जा चुका है कि सरकार पर सार्वजनिक स्वास्थ्य सुनिश्चित करने का सकारात्मक दायित्व है। इसी तरह अनुच्छेद 46 राज्य से अनुसूचित जनजातियों के आर्थिक और शैक्षणिक हितों की रक्षा तथा सामाजिक अन्याय और शोषण से उनकी रक्षा की अपेक्षा करता है।
अगर यह दायित्व पूरा नहीं होता और उसके नतीजे में बच्चे कुपोषण से मरते हैं, मांएं प्रसव के दौरान दम तोड़ती हैं, तो यह राज्य की असफलता नहीं, राज्य द्वारा संवैधानिक अधिकारों का अपहरण है। धन की हेराफेरी से होने वाले घोटालों पर चर्चाएं होती हैं, मगर आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की जो लूट या उपेक्षा हो रही है, उससे जो जानें जा रही हैं, वह उससे कहीं भारी पाप है। वहां हर अधूरी सड़क एक अनकहा घोटाला है, हर नियुक्ति से पहले रिक्त पड़ा डॉक्टर का पद एक अनगिनत मौत का साक्षी है।
मुख्यमंत्री की ओर से एक प्रार्थना: पहले ज़मीन, फिर क़ीमत
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने हाल ही में घोषणा की है कि राज्य की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं “डिजिटल” और “स्मार्ट” बनेंगी। इस लक्ष्य में कोई हर्ज़ नहीं; आधुनिक तकनीक से इलाज बेहतर हो सकता है। मगर यह भी उतना ही सच है कि जिस गांव तक सड़क ही नहीं, वहां डिजिटल दवाएं डाउनलोड नहीं होतीं; जिस बस्ती में बिजली ठीक से नहीं, वहां स्मार्ट स्क्रीन पर डॉक्टर की सलाह सिर्फ़ चमकती तस्वीर रह जाती है।
तकनीक सुविधा का संवर्धक हो सकती है, मगर वह बुनियादी ढांचे का विकल्प कभी नहीं बन सकती। पहले पुल बनें, फिर ऐप; पहले डॉक्टर बैठें, फिर स्क्रीन जलें; पहले झोले का दौर ख़त्म हो, फिर स्मार्ट हेल्थ की डींगें। यही अनुक्रम संपूर्ण प्रशासन के सामने है।























