नारियल को भारतीय संस्कृति में देवताओं का प्रसाद कहा जाता है, तो दक्षिण-पूर्व एशिया में इसे ‘कल्पवृक्ष’ का दर्जा हासिल है, जिसका हर हिस्सा किसी न किसी काम आता है। पूजा-पाठ से लेकर खान-पान और आयुर्वेदिक औषधियों तक में इस्तेमाल होने वाला यह फल कभी मौत का सौदागर भी बन चुका है।
इतिहास के पन्नों में एक ऐसा वक्त दर्ज है, जब जापानी सेना ने नारियल के खोल में बारूद भरकर उसे आत्मघाती बम में बदल दिया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान तैयार किया गया यह ‘कोकोनट ग्रेनेड’ आज भी सैन्य इतिहास के सबसे अजीबोगरीब हथियारों में गिना जाता है।
अमेरिकी नेवी की चपेट में आया जापान का सप्लाई चेन
दरअसल, साल 1944 के आसपास प्रशांत महासागर के जंगलों और द्वीपों पर जापान और अमेरिका के बीच जमकर टकराव हो रहा था। अमेरिकी वायुसेना और नौसेना के निरंतर हमलों के बाद जापानी जहाजों की आपूर्ति श्रृंखला लगभग ठप हो चुकी थी।
फिलीपींस, लेयटे और पापुआ न्यू गिनी जैसे द्वीपों पर फंसे जापानी जवानों के पास न खाने को राशन बचा था, न लड़ने को गोला-बारूद। जापानी सैन्य परंपरा में आत्मसमर्पण को सबसे बड़ा अपमान माना जाता था। ऐसे में सैनिकों के पास दो ही रास्ते बचे — या तो भूखे-प्यासे दम तोड़ दें, या फिर आसपास मौजूद प्राकृतिक संसाधनों से ही हथियार गढ़ लें। इसी मजबूरी के दबाव में जन्मा नारियल बम का ख्याल।
हजारों विकल्पों में से नारियल को क्यों चुना गया?
प्रशांत क्षेत्र के उष्णकटिबंधीय द्वीपों पर नारियल के पेड़ लाखों की संख्या में थे, यानी कच्चे माल की कोई कमी नहीं पड़ने वाली थी। जापानी कमांडरों ने ध्यान में लिया कि सूखा नारियल इतना कठोर होता है कि वह धातु के ग्रेनेड जैसी मजबूती देता है।

इससे भी बड़ा फायदा यह था कि जंगल में कूड़े की तरह बिखरे सैकड़ों नारियलों के बीच बम को नंगी आंख से पहचानना अमेरिकी गश्ती दल के लिए लगभग नामुमकिन था। प्रकृति ने खुद ही बम को छलावरण मुहैया करा दिया था।
ग्रेनेड बनाने की विधि — मेहनत कम, तबाही ज्यादा
नारियल से बम तैयार करने की प्रक्रिया देखने में सरल थी, मगर उसका नतीजा भयावह होता था। सबसे पहले सैनिक नारियल के शीर्ष पर छोटा छेद करके उसका पानी और अंदरूनी मलाई पूरी तरह खाली कर देते थे।
फिर इस सूखे खोल में पिक्रिक एसिड जैसे घातक विस्फोटक पदार्थ को ठोस रूप में भरा जाता था। तपती नमी और मूसलाधार बारिश में बारूद खराब न हो जाए, इसके लिए छेद को मोम, गोंद या लकड़ी की कुंडी से सीलबंद कर दिया जाता था।
धमाके की तीव्रता बढ़ाने के लिए कीलें और कांच
हथियार विशेषज्ञों के मुताबिक शुद्ध बारूद के धमाके से क्षेत्रीय क्षति सीमित रहती है। इसीलिए जापानी इंजीनियरों ने नारियल के भीतर बारूद के साथ लोहे की छोटी कीलें, चूर-चूर किए गए कांच के टुकड़े, धातु की पतली पत्तियां और नुकीले कंकड़-पत्थर ठूंस दिए।
विस्फोट होते ही ये छर्रे चारों ओर रफ्तार से छिटकते और नजदीक खड़े दुश्मन सैनिकों के शरीर में घुसकर उन्हें लहूलुहान कर देते। जंगल में इलाज के साधन न के बराबर होने के कारण ज्यादातर घायल जवानों का बचना नामुमकिन हो जाता था।
मैदान में इस्तेमाल के तीन खतरनाक अंदाज
यह कोकोनट ग्रेनेड कई रूपों में तैनात किया जाता था। पहला तरीका सीधा था — हाथ से उठाकर इसे आम ग्रेनेड की तरह अमेरिकी बंकरों और टुकड़ियों पर दाग दिया जाता था। दूसरा, अधिक धोखेबाज तरीका था इसे ट्रिप-वायर से जोड़कर लैंडमाइन की भूमिका देना।
झाड़ियों के बीच बंधे तार से टकराते ही नारियल में भयानक धमाका हो जाता। तीसरा रूप सबसे वीभत्स था — कुछ जापानी जवान अपने बदन पर इन बमों को कसकर बांधकर सीधे अमेरिकी टैंक के नीचे कूद जाते, जिससे टैंक की ट्रैक तबाह हो जाती या सवारी जान से हाथ धो बैठते।

























