सरकार ने यूपीआई (यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस) के नए नियमों की घोषणा करते हुए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) से संबंधित कई महत्वपूर्ण बदलावों की जानकारी दी है। इन परिवर्तनों का मुख्य उद्देश्य डिजिटल पेमेंट को अधिक टिकाऊ बनाना, छोटे व्यापारियों को सुविधाजनक विकल्प प्रदान करना और यूपीआई के व्यापक प्रयोग को प्रोत्साहित करना है।
इस लेख में हम यूपीआई एमडीआर नियम, नई व्यवस्था, और इससे जुड़ी सवाल-जवाब के माध्यम से पूरी जानकारी देंगे, ताकि आप जान सकें कि इन बदलावों का आपके वित्तीय जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
यूपीआई पर नए एमडीआर नियम: मुख्य बातें
सर्वप्रथम, सरकार ने स्पष्ट किया है कि यूपीआई ऐप प्रोवाइडर को डिजिटल प्लैटफॉर्म चार्ज या छिपे हुए शुल्क लगाने की अनुमति नहीं होगी। बैंक और भुगतान सेवा प्रदाताओं को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है कि व्यापारी इस नए शुल्क का बोझ ग्राहकों पर न डालें।
इसका मकसद यह है कि उपभोक्ताओं को बिना अतिरिक्त लागत के डिजिटल भुगतान का लाभ मिल सके। इसके साथ ही, व्यक्तिगत यूज़र्स के लिए कोई भी मासिक सीमा या मुफ्त ट्रांजैक्शन की संख्या तय नहीं की गई है।
छोटे व्यापारी और शून्य एमडीआर का लाभ
नई व्यवस्था के तहत, हर महीने एक लाख रुपये तक के यूपीआई QR कोड पेमेंट करने वाले छोटे व्यापारी पहले की तरह ही शून्य एमडीआर का लाभ लेते रहेंगे। यदि कोई व्यापारी लगातार तीन महीने तक एक लाख रुपये से अधिक का लेनदेन करता है, तो उसे सामान्य P2M (पेमेंट टू मर्चेंट) कैटेगरी में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
सरकार का मानना है कि इस व्यवस्था से लगभग 96 प्रतिशत व्यापारी प्रभावित नहीं होंगे, क्योंकि अधिकांश लेनदेन 2,000 रुपये की सीमा के भीतर या पी2एम छूट के दायरे में आते हैं।
एमडीआर लागू होने वाली लेनदेन
यह व्यवस्था केवल उन यूपीआई ट्रांजैक्शनों पर लागू होगी, जो सीधे यूजर के बैंक खाते से व्यापारी के खाते में हो रहे हैं। खास बात है कि क्रेडिट कार्ड, रुपे क्रेडिट लाइन या पहले से मंजूर ‘क्रेडिट लाइन’ के जरिए होने वाले पेमेंट्स को इस नियम से अलग रखा गया है।
इससे यह सुनिश्चित किया गया है कि आवर्ती भुगतान जैसे बिजली, पानी का बिल, OTT सदस्यता, म्यूचुअल फंड निवेश आदि पर कोई अतिरिक्त शुल्क न लगे।
पूर्व में लागू शून्य एमडीआर व्यवस्था और इसकी जरूरत
बता दें कि जनवरी 2020 से लागू शून्य एमडीआर व्यवस्था का उद्देश्य डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देना था। हालांकि, बैंक और फिनटेक कंपनियों ने इसे टिकाऊ बनाने के लिए शुल्क फिर से लगाने की मांग की थी।
भारतीय रिजर्व बैंक और NPCI ने भी इस नीति की समीक्षा का आग्रह किया था। अंततः, सरकार ने छोटे कारोबारियों को डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित करने और यूपीआई को वित्तीय रूप से स्थायी बनाने के लिए नए नियम लागू किए हैं।
नई व्यवस्था से छोटे कारोबारियों के लिए कोष
सरकार ने यह भी तय किया है कि यूपीआई स्वीकार्यता को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष कोष बनाया जाएगा। इसमें कुल एमडीआर से प्राप्त राशि का पांच प्रतिशत योगदान दिया जाएगा।
इस कोष का उद्देश्य छोटे कारोबारियों के बीच यूपीआई का प्रयोग, स्वीकार्यता और भागीदारी को बढ़ावा देना है। इससे छोटे व्यापारियों को डिजिटल पेमेंट में भागीदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी।


























