BRICS समिट 2026 का समापन होते ही राजनीतिक हलकों में भोजन और मेन्यू को लेकर चर्चा तेज हो गई है। खासकर, भारत में इस मामले में वेज और नॉनवेज खाने को लेकर चली आ रही वैचारिक लड़ाई ने नई दिशा ले ली है। इस संदर्भ में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया दी है, जो चर्चा का केंद्र बनी हुई है। वेज और नॉनवेज भोजन पर उनकी टिप्पणी और पोस्ट ने राजनीतिक व सामाजिक विमर्श को गर्मा दिया है।
राहुल गांधी का सोशल मीडिया पोस्ट और उसकी प्रतिक्रिया
हाल ही में, राहुल गांधी ने एक्स (पूर्व में टि्वटर) पर एक तस्वीर साझा की है, जिसमें छोले-भटूरे का व्यंजन दिख रहा है। इस पोस्ट के साथ उन्होंने लिखा, “जानकारी के लिए बता दें, कि 80 प्रतिशत भारतीय मांसाहारी हैं। भारतीय मांसाहारी भोजन बहुत स्वादिष्ट होता है। और मेरी बहन के हाथों से बनाए गए छोले भटूरे भी।” इस पोस्ट का मकसद नॉनवेज भोजन को प्रमोट करना या उसकी तारीफ करना नहीं बल्कि यह संकेत देना है कि भारतीय जनता का बड़ा हिस्सा मांसाहारी है और उनका भोजन भी विविधता से भरपूर होता है। राहुल गांधी के इस पोस्ट में उन्होंने पारंपरिक भारतीय व्यंजन छोले-भटूरे को प्रमुखता दी है, जो अक्सर वेज फूड के रूप में जाना जाता है, लेकिन उनका तंज इस बात पर था कि देश की बड़ी आबादी का खानपान मांसाहारी है।
BRICS डिनर का मेन्यू और राजनीतिक टिप्पणी
BRICS समिट के दौरान आयोजित रात्रि भोज में मुख्य रूप से शाकाहारी व्यंजन ही प्रस्तुत किए गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से आयोजित इस गाला डिनर के मेन्यू में पारंपरिक भारतीय व्यंजन जैसे खांडवी, पनीर लबाबदार, गुच्छी मार्मिक, मिलेट पुलाव, मशरम गलोटी और जलेबी शामिल थे। इन व्यंजनों का चुनाव खासतौर पर मोटे अनाज पर केंद्रित था, जो भारत के सस्टेनेबिलिटी और अन्न को बढ़ावा देने के प्रयासों का प्रतीक है। इस मेन्यू का उद्देश्य भारत के पारंपरिक और स्वस्थ शाकाहारी व्यंजनों को विश्व के सामने प्रस्तुत करना था।
हालांकि, इस मेन्यू में नॉनवेज व्यंजन नहीं थे, और यह बात राजनीतिक विमर्श का विषय बन गई है। विपक्ष ने इसे लेकर सरकार पर तंज कसा है कि यहां भारतीय जनता की असली आहार प्रवृत्ति को नजरअंदाज किया गया है। राहुल गांधी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सोशल मीडिया पर अपनी बात रखी कि देश के 80 प्रतिशत लोग मांसाहारी हैं, तो यह आवश्यक है कि उनके भोजन की विविधता का सम्मान किया जाए। उनका तर्क है कि भारतीय मांसाहारी व्यंजन भी स्वाद और परंपरा में अनूठे हैं और इन्हें भी महत्व देना चाहिए।
सर्वे और सांख्यिकी: भारतीय खानपान की वास्तविकता
साल 2023-24 में नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे ने ताजा आंकड़े प्रस्तुत किए हैं, जिनके अनुसार भारत में लगभग 83.4 प्रतिशत पुरुष और 70.6 प्रतिशत महिलाएं कभी न कभी मछली, चिकन या मीट का सेवन करती हैं। यह आंकड़ा स्पष्ट करता है कि भारत में मांसाहारी खाने वालों की संख्या काफी अधिक है। हालांकि, इस सर्वे में अभी तक तुलनात्मक आंकड़ों का विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है, जो यह दर्शाता है कि मांसाहारी और शाकाहारी के बीच का अनुपात समय के साथ कैसे बदल रहा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि देश के बड़े हिस्से के खानपान में विविधता है, जिसमें मांसाहारी व्यंजन भी महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।
वेज और नॉनवेज के बीच वैचारिक लड़ाई
भारतीय समाज में वेज और नॉनवेज भोजन को लेकर वर्षों से बहस चलती आ रही है। एक तरफ शाकाहार को धार्मिक और सांस्कृतिक कारणों से अहम माना जाता है, वहीं दूसरी तरफ मांसाहारी भोजन को सामाजिक और पारंपरिक नजरिए से देखा जाता है। यह बहस कभी-कभी राजनीतिक रंग भी ले लेती है, खासकर जब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित कार्यक्रमों में भोजन का चयन होता है। BRICS समिट जैसे वैश्विक मंच पर भी यह मुद्दा चर्चा में आ जाता है, जहां भोजन की पसंद को लेकर राजनीतिक दल अपने अपने नजरिए पेश करते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी का गाला डिनर और उसकी खासियत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आयोजित गाला डिनर में पारंपरिक और सस्टेनेबल व्यंजनों को शामिल किया गया था। इस मेन्यू का मुख्य उद्देश्य भारत की पारंपरिक भारतीय भोजन संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना और मोटे अनाज पर जोर देना था।

For the record: 80% of Indians are non-vegetarian.
Indian non-vegetarian food is delicious. As are my sister’s chole bhature. pic.twitter.com/8f6ziKjLan
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) September 13, 2026
इन व्यंजनों में शामिल खांडवी, पनीर लबाबदार, गुच्छी मार्मिक, मिलेट पुलाव, मशरम गलोटी और जलेबी जैसे व्यंजन भारतीय खानपान की विविधता और परंपरा का प्रतीक हैं। यह मेन्यू भारत की भोजन संस्कृति को एक नई दिशा देने का प्रयास था, जिसमें पर्यावरणीय स्थिरता और स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा गया था।
राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में भोजन का महत्व
भोजन का चुनाव और उसका प्रचार-प्रसार राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए एक रणनीतिक विषय बन चुका है। ब्रिक्स डिनर में शाकाहारी व्यंजनों का चयन, विपक्षी नेताओं के बीच चर्चा का विषय बन गया है, जबकि सरकार इसे भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि मानती है। राहुल गांधी का तंज इस बात का संकेत है कि भारतीय जनता का खानपान विविध और बहुआयामी है, और इसे सम्मानित किया जाना चाहिए। यह बहस न केवल भोजन की पसंद का मामला है, बल्कि यह देश की सांस्कृतिक विविधता और परंपराओं का भी प्रतीक है।
BRICS डिनर मेन्यू और राहुल गांधी की प्रतिक्रिया ने एक बार फिर भारतीय समाज में भोजन, संस्कृति और राजनीति के बीच के जटिल संबंधों को उजागर किया है। यह बहस आगे भी जारी रहने की संभावना है कि कैसे देश की विविधता को सम्मानित किया जाए, और इस पर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श कैसे प्रभाव डालते हैं।

























