पश्चिम बंगाल की सियासत में तूफान लेकर आए तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अंदरूनी घमासान ने अब दिल्ली के कॉरिडोरों तक अपनी गूंज पैदा कर दी है। पार्टी के भीतर चल रही जंग ने अब संसदीय अधिकारियों और न्यायपालिका तक का रुख कर लिया है। ताजा विकास के तौर पर, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने TMC से अलग हुए 20 बागी सांसदों को औपचारिक नोटिस जारी किया है। यह कदम TMC के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की ओर से दायर अयोग्यता की याचिकाओं पर संज्ञान लेते हुए उठाया गया है।
लोकसभा स्पीकर के कार्यालय से जारी इस नोटिस ने इस पूरे राजनीतिक ड्रामे को एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंचा दिया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि पूरा मामला क्या है और इसके क्या राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।
सात दिन का अल्टीमेटम और नोटिस का असल मतलब
लोकसभा अध्यक्ष की ओर से जारी किए गए इस नोटिस के मद्देनजर, सभी 20 बागी सांसदों के पास अब सिर्फ एक सप्ताह का समय है। इस अवधि के दौरान उन्हें अपना पक्ष रखते हुए लिखित जवाब स्पीकर के कार्यालय में जमा करना होगा। यह प्रक्रिया संविधान के तहत अयोग्यता की कार्यवाही का एक अनिवार्य चरण है, जहां आरोपित व्यक्तियों को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है, इससे पहले कि कोई अंतिम निर्णय लिया जाए।
कौन हैं इस बागी खेमे की बड़ी नाम?
TMC के इस बगावती धड़े में कोई आम चेहरे नहीं हैं, बल्कि पार्टी के कद्दावर नेता शामिल हैं। इस गुट की कमान वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तीदार और सुदीप बंद्योपाध्याय संभाल रहे हैं। इनके अलावा, इस गुट में ऐसे चेहरे भी शामिल हैं जिनकी पहचान राजनीति से इतर भी है। इनमें प्रमुख रूप से यूसुफ पठान (पूर्व भारतीय क्रिकेटर),रचना बनर्जी (जानी-मानी अभिनेत्री), शताब्दी रॉय (अभिनेत्री-राजनेता), सायोनी घोष, जून मालिया, प्रसून बनर्जी शामिल हैं।
दल-बदल विरोधी कानून
दरअसल, इस पूरे विवाद की नब्ज संविधान की दसवीं अनुसूची, यानी दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) पर टिकी है। अभिषेक बनर्जी ने 18 जून को इन 20 सांसदों के खिलाफ अलग-अलग याचिकाएं दायर करते हुए तर्क दिया था कि ये लोग TMC के चुनाव चिन्ह पर जीतकर संसद पहुंचे थे। पार्टी का आरोप है कि इन नेताओं ने बिना पार्टी छोड़े एक नई पार्टी ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में शामिल होने का नाटक किया, जो स्पष्ट रूप से दल-बदल की श्रेणी में आता है।
वहीं, बागी सांसदों का पलटवार इस आधार पर है कि जब उनके साथ TMC के लोकसभा में मौजूद दो-तिहाई (2/3) सांसद एक साथ किसी अन्य दल में विलय कर रहे हैं, तो इसे संविधान के तहत ‘वैध विलय’ (Legal Merger) माना जाना चाहिए। ऐसे में उनकी सदस्यता रद्द होने का कोई सवाल ही नहीं उठता। हालांकि, अभिषेक धड़ा इस दो-तिहाई के दावे को बेबुनियाद और कानूनी तौर पर खोखला बता रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका और स्पीकर की कार्यप्रणाली
इस बीच, अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा स्पीकर पर याचिकाओं पर जानबूझकर टालमटोल करने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने 25 अगस्त को इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा।
दिलचस्प बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पीकर को सीधे तौर पर नोटिस जारी करने से परहेज किया। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को अवगत कराया कि स्पीकर का दफ्तर सक्रिय है और नोटिस भेज दिए गए हैं। शीर्ष अदालत ने भी साफ संदेश दिया कि संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों (जैसे स्पीकर) के खिलाफ बिना उनकी सुनवाई किए अदालत कोई आदेश पारित नहीं कर सकती।
अगले 7 दिनों में क्या बदलेगा?
अब जब नोटिस जारी हो चुका है, तो इन 20 सांसदों पर सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे अपने ‘विलय’ को कानूनी रूप से कैसे साबित करते हैं। उन्हें अपने जवाब में स्पष्ट सबूत देने होंगे कि NCPI में उनका प्रवेश किसी तरह की बगावत नहीं, बल्कि एक संगठित और वैध विलय है।
जवाब मिलने के बाद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को यह तय करना होगा कि क्या बागी सांसदों का दावा संविधान की दसवीं अनुसूची की शर्तों पर खरा उतरता है? गौरतलब है कि स्पीकर ने अभी तक इन्हें सदन में अलग से बैठने की इजाजत तो दे दी है, लेकिन उन्हें एक अलग संसदीय दल के तौर पर मान्यता देने से इनकार किया हुआ है।
इस फैसले का बड़ा राजनीतिक असर
इस मामले का अंजाम सिर्फ इन 20 लोगों की सदस्यता तक सीमित नहीं रहेगा। अगर इन सांसदों को अयोग्य ठहराया जाता है, तो इससे लोकसभा में विपक्ष की ताकत कम होगी और सत्ता पक्ष (NDA) को अपना बहुमत और मजबूत करने में मदद मिलेगी। दूसरी ओर, अगर बागी धड़े का पलड़ा भारी पड़ता है और उन्हें अलग दल के रूप में मान्यता मिल जाती है, तो यह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी के लिए एक बड़े संगठनात्मक और राजनीतिक झटके के रूप में सामने आएगा।
अगले कुछ दिन इन बागी सांसदों के राजनीतिक भविष्य के लिए बेहद निर्णायक साबित होंगे। स्पीकर जो भी फैसला लेंगे, उस पर सुप्रीम कोर्ट में भी कानूनी जंग के जारी रहने की पूरी संभावना है।


























