संध्या समय न्यूज
सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों से पहले ‘मुफ्त की रेवड़ियां’ (फ्रीबीज) बांटने की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने राज्य सरकारों को फटकार लगाते हुए सवाल खड़े किए हैं कि अगर वे इसी तरह मुफ्त खाना, मुफ्त बिजली और अन्य सुविधाएं बांटते रहे, तो देश के विकास और बुनियादी ढांचे के लिए जरूरी पैसा कहां से आएगा?
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ, जिसके प्रभार में प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची एवं न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली शामिल थे, ने इस मुद्दे पर कड़ी आपत्ति जाहिर की। कोर्ट ने कहा कि जब अधिकांश राज्य सरकारें बजट घाटे से जूझ रही हैं और विकास के लिए धन की कमी की शिकायत कर रही हैं, तो वे करोड़ों रुपये सब्सिडी पर क्यों खर्च कर रही हैं? पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर आप सुबह से शाम तक मुफ्त भोजन देना शुरू कर देंगे, फिर मुफ्त साइकिल, मुफ्त बिजली देंगे, तो कौन काम करेगा और फिर कार्य संस्कृति का क्या होगा?
‘कल्याणकारी योजना या तुष्टीकरण?’
अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर राज्य गरीबों की मदद कर रहे हैं, तो यह पूरी तरह से समझ में आता है। लेकिन जो लोग बिजली शुल्क चुकाने में सक्षम हैं, उन्हें भी बिना किसी वित्तीय परीक्षा के मुफ्त सुविधाएं देना गलत है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का अंधाधुंध वितरण एक ऐसी संस्कृति को जन्म दे रहा है जो ‘काम न करने को पुरस्कृत’ करती प्रतीत होती है। सीजेआई ने सवाल उठाते हुए कहा कि जो वहन कर सकते हैं और जो नहीं कर सकते, उनमें भेद किए बिना आप वितरण शुरू कर देते हैं। क्या यह तुष्टीकरण की नीति नहीं होगी?
विकास बनाम मुफ्त सुविधाएं
सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि यह संस्कृति देश के आर्थिक विकास में बाधा डाल रही है। अदालत का कहना है कि राज्यों को मुफ्त सुविधाएं देने के बजाय रोजगार के अवसर पैदा करने पर ध्यान देना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की कि राज्य विकास परियोजनाओं पर खर्च करने के बजाय केवल दो काम कर रहे हैं- वेतन देना और मुफ्त सुविधाएं बांटना।
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तमिलनाडु की याचिका पर सुनवाई
यह टिप्पणी ‘तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ की एक याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। कंपनी ने विद्युत संशोधन नियम, 2024 के एक नियम को चुनौती देते हुए उपभोक्ताओं की वित्तीय स्थिति पर गौर किए बिना हर किसी को फ्री बिजली देने का प्रस्ताव रखा है। अदालत ने इस मामले में केंद्र और अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया है। इस साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, ऐसे में ‘मुफ्त की रेवड़ियों’ का यह मुद्दा एक बार फिर से राजनीतिक और आर्थिक बहस का केंद्र बन गया है।



















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