युद्धविराम का छल, फिर हमला? ईरान पर ट्रंप की नई रणनीति

Iran-US Talks: मध्य-पूर्व में इजरायल और अरब देशों ने अपनी 75% से ज्यादा इंटरसेप्टर मिसाइलें खर्च कर दी हैं। पैट्रियट सहित अन्य डिफेंस सिस्टम के मिसाइल भंडार खत्म होने के कगार पर हैं। दूसरी ओर, ईरान को चीन और रूस से बैकडोर के जरिए लगातार हथियार मिल रहे हैं। ऐसे में अमेरिका के लिए लंबी जंग लड़ पाना मुश्किल हो गया है।

क्या ट्रंप फिर खेल रहे हैं बड़ा दांव? ईरान पर नई रणनीति

HIGHLIGHTS

  • दबाव या धोखा: पहले शांति, फिर ताकत—ट्रंप की ईरान नीति
  • ट्रंप का नया दांव: युद्धविराम की आड़ में सख्त कार्रवाई
  • क्या यह शांति है या रणनीति? ईरान पर ट्रंप की चाल
  • पहले समझौता, फिर प्रहार—ट्रंप की ईरान पॉलिसी पर सवाल
  • युद्धविराम के पीछे छुपी रणनीति: ट्रंप का ईरान प्लान

Iran-US Talks: तेहरान में पाकिस्तान और ईरानी प्रतिनिधिमंडल के बीच बढ़ती नजदीकियों और अमेरिका-ईरान के बीच वार्ता के संकेतों ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। सवाल यह है कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सच में दबाव में हैं, या फिर ‘पहले युद्धविराम का दिखावा, फिर पूरी ताकत से वापसी’ की रणनीति पर काम कर रहे हैं?

तथ्यों की जमीन पर उतरें तो तस्वीर कुछ और ही है। दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक होने के बावजूद, अमेरिका आज अपने ही हथियारों की कमी से जूझ रहा है। क्या ट्रंप ने ईरान को वार्ता के जाल में उलझाकर सिर्फ हथियारों के भंडार को भरने के लिए वक्त खरीद रहे हैं?

दुनिया का सबसे बड़ा सौदागर, लेकिन खाली खजाना

SIPRI और अमेरिकी विदेश विभाग के आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका दुनिया के 42% हथियार बाजार पर राज करता है और 99 देशों को हथियारों की सप्लाई करता है। लेकिन यूक्रेन और मध्य-पूर्व (ईरान-इजरायल) के दो मोर्चों पर लगातार हथियार डुबोने से अमेरिका के ‘वॉर रिजर्व’ (युद्ध भंडार) में भारी गिरावट आई है।

अमेरिकी हथियारों के बड़े खरीदार (देशवार):

  • सऊदी अरब (12%): सबसे ज्यादा कॉम्बैट एयरक्राफ्ट और मिसाइलें।
  • यूक्रेन (9.4%): एयर डिफेंस और गाइडेड बम्स।
  • जापान (8.9%): F-35 लाइटनिंग जेट और अब्राम्स टैंक।
  • कतर (7.4%) और ऑस्ट्रेलिया (5.6%): मुख्य रूप से एडवांस्ड फाइटर जेट्स और सबमरीन।

क्षेत्रवार खपत: यूरोप (38%), मध्य-पूर्व (33%), एशिया-ओशिनिया (26%), लैटिन अमेरिका (2%) और अफ्रीका (1%)।

क्यों खत्म हो रहा अमेरिका का जखीरा?

मध्य-पूर्व में इजरायल और अरब देशों ने अपनी 75% से ज्यादा इंटरसेप्टर मिसाइलें खर्च कर दी हैं। पैट्रियट सहित अन्य डिफेंस सिस्टम के मिसाइल भंडार खत्म होने के कगार पर हैं। दूसरी ओर, ईरान को चीन और रूस से बैकडोर के जरिए लगातार हथियार मिल रहे हैं। ऐसे में अमेरिका के लिए लंबी जंग लड़ पाना मुश्किल हो गया है।

ट्रंप की फटकार और ‘विश्व युद्ध’ जैसी तैयारी

हथियारों की कमी को लेकर जनवरी 2026 में राष्ट्रपति ट्रंप ने अमेरिकी रक्षा कंपनियों को एडवाइजरी जारी कर उन्हें फटकार लगाई थी। ट्रंप ने साफ तौर पर कहा कि कंपनियां हथियारों का प्रोडक्शन बढ़ाने के बजाय स्टॉक बायबैक और डिविडेंड पर पैसा बर्बाद कर रही हैं।

ट्रंप ने इन 4 दिग्गज कंपनियों को अलर्ट किया:

  1.  लॉकहीड मार्टिन: F-35 विमान और मिसाइल सिस्टम के लिए।
  2. बोइंग: F-15, अपाचे और चिनूक हेलीकॉप्टर के लिए।
  3.  रेथियॉन (RTX): पैट्रियट मिसाइल डिफेंस और रडार के लिए।
  4. जनरल डायनेमिक्स: अब्राम्स टैंक और नौसैनिक जहाजों के लिए।

न सिर्फ ये, पेंटागन ने फोर्ड मोटर और जीएम (GM) डिफेंस** जैसी ऑटो कंपनियों को भी बुलाया है और उनसे द्वितीय विश्वयुद्ध (WW2) की तरह तेजी से हथियारों का उत्पादन शुरू करने को कहा है।

अरबों के ये हथियार, जिनकी बिक्री रोक सकता है अमेरिका

अपने सबसे करीबी देशों को भी अमेरिका ने महंगे हथियार बेचे हैं:

  • THAAD मिसाइल डिफेंस सिस्टम: 16,000 करोड़ रुपये प्रति यूनिट (सऊदी अरब, UAE)।
  • पैट्रियट मिसाइल सिस्टम: 8,000 करोड़ रुपये प्रति यूनिट (यूक्रेन, जर्मनी, जापान, पोलैंड)।
  • F-15EX ईगल जेट: 750 करोड़ रुपये प्रति यूनिट (सऊदी अरब, कतर)।
  • F-35 लाइटनिंग जेट: 650 करोड़ रुपये प्रति यूनिट (जापान, UK, ऑस्ट्रेलिया, इजरायल)।
  • AH-64 अपाचे हेलीकॉप्टर: 250 करोड़ रुपये प्रति यूनिट (सऊदी, UAE, मिस्र)।

चीन की ‘किल स्विच’ और जापान का बढ़ता कदम

अमेरिका की मुश्किलें सिर्फ युद्ध भंडार खत्म होने तक सीमित नहीं हैं। चीन ने हथियार बनाने वाले ‘रेयर अर्थ’ (खनिज) की सप्लाई अचानक घटा दी है। एक तरह से चीन ने अमेरिकी हथियार प्रोडक्शन पर ‘किल स्विच’ (तत्काल बंद करने का स्विच) लगा दिया है।

इस बीच, ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और सुरक्षा के बदले पैसे की मांग ने अमेरिकी सहयोगियों (पोलैंड, फिलीपींस) को डरा दिया है। WW2 के बाद पहली बार अमेरिका के सहयोगी ‘प्लान बी’ पर काम कर रहे हैं और इस खाली जगह को भरने के लिए जापान (जो अपने डिफेंस प्रोडक्शन नियमों में ढील दे रहा है) का रास्ता अपना रहे हैं।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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