उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच, पिथौरागढ़ जिला अस्पताल की करुण स्थिति ने एक बार फिर सरकार की नाकामी को उजागर कर दिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के गृह जनपद होने के बावजूद, यहां की मेडिकल और स्वास्थ्य व्यवस्था पटरी से पूरी तरह उतर चुकी है। इस गंभीर मुद्दे को लेकर कांग्रेस विधायक मयूख महर ने स्थानीय जनता और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर कलक्ट्रेट परिसर स्थित धरना स्थल पर एक जोरदार प्रदर्शन किया। इस दौरान जिला प्रशासन और राज्य सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई और मांग की गई कि अस्पतालों में तत्काल डॉक्टरों की तैनाती की जाए तथा ठप पड़ी स्वास्थ्य सेवाओं को यथाशीघ्र बहाल किया जाए।
सीएम के गृह जनपद में स्वास्थ्य व्यवस्था की बेहाली
धरने को संबोधित करते हुए कांग्रेस विधायक मयूख महर ने सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पिथौरागढ़ सिर्फ नाम का मुख्यमंत्री का गृह जनपद रह गया है, जमीनी हकीकत में यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश सरकार ने स्वास्थ्य विभाग को जिले में लावारिस हालत में छोड़ दिया है। न तो बुनियादी ढांचे पर ध्यान दिया जा रहा है और न ही चिकित्सकों की कमी को दूर करने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।
विधायक महर ने पिथौरागढ़ मेडिकल कॉलेज के मुद्दे को उठाते हुए सरकार की ‘इच्छा शक्ति’ पर सवालिया निशान लगाया। उन्होंने याद दिलाया कि प्रदेश के मुख्यमंत्री ने खुद घोषणा की थी कि जुलाई माह से मेडिकल कॉलेज में कक्षाएं शुरू हो जाएंगी, लेकिन तय समय सीमा गुजर जाने के बाद भी मेडिकल कॉलेज का चक्कर नहीं लग पाया है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार में ठोस इरादा होता, तो यह काम बहुत पहले पूरा हो चुका होता।
विज्ञापनों से ज्यादा सुरक्षा खर्च पर बन रहा बेस अस्पताल
बेस अस्पताल के निर्माण में हुई भारी लापरवाही को लेकर भी मयूख महर ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि जिस जगह पर बेस अस्पताल का भवन बनाया गया है, वह नाले के मुहाने पर स्थित है, जिससे भवन की सुरक्षा हमेशा खतरे में बनी रहती है। उन्होंने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि अस्पताल भवन के निर्माण पर जितना बजट खर्च हुआ है, उससे कहीं अधिक पैसा सुरक्षा कार्यों और मरम्मत पर डूब रहा है। यह सरकार की खराब योजना बनाने की लाइव उदाहरण है।
पिथौरागढ़ जिला अस्पताल केवल जिले के ही नहीं, बल्कि पड़ोसी जिलों बागेश्वर, चंपावत और नेपाल बॉर्डर से आने वाले मरीजों के लिए आखिरी उम्मीद का केंद्र है। लेकिन डॉक्टरों और बुनियादी सुविधाओं की कमी के चलते यह अस्पताल अब महज एक ‘रेफर सेंटर’ का रूप ले चुका है। गंभीर मरीजों को इलाज के लिए बरेली या हल्द्वानी जाने के लिए मजबूरन रेफर किया जा रहा है।
गरीबों पर बढ़ता आर्थिक बोझ और स्वास्थ्य कार्ड की अनदेखी
पहाड़ की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति को देखते हुए बरेली या अन्य बड़े शहरों में इलाज कराना एक आम परिवार के बस की बात नहीं है। विधायक ने बताया कि प्रदेश सरकार के तरफ से दिए जा रहे स्वास्थ्य कार्ड (चिकित्सा सहायता योजना) को बड़े अस्पतालों में मान्यता नहीं मिल पा रही है। जब लोग जान बचाने के लिए बाहर जाते हैं, तो वहां इन कार्डों को लेकर उन्हें अस्वीकार किया जाता है, जिससे गरीब मरीजों को ठगे जाने जैसा महसूस होता है और उन पर दोहरा आर्थिक बोझ पड़ता है।
जिला अस्पताल के अंदर का नजारा और भी दर्दनाक है। यहां मरीजों को बेड तक मिलना दूभर हो गया है। भारी भीड़ के कारण एक ही बेड पर दो-दो मरीजों को लिटाकर उनका इलाज किया जा रहा है। इससे संक्रमण का खतरा भी कई गुना बढ़ जाता है।
कांग्रेस ने रखी ये प्रमुख मांगें
इस धरना प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस ने राज्य सरकार के सामने कुछ तत्काल मांगें रखीं:
- जिला अस्पताल में तत्काल विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती की जाए।
- पिथौरागढ़ मेडिकल कॉलेज को टालमटोल छोड़कर तय समय सीमा में शुरू किया जाए।
- बेस अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था को दुरुस्त किया जाए और नाले की समस्या का स्थायी समाधान निकाला जाए।
- प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य कार्डों को बाहर के बड़े अस्पतालों में निर्बाध रूप से चलाने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।


























