बिहार की राजनीति में इन दिनों पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट सबसे ज्यादा चर्चा में बनी हुई है। 30 जुलाई को यहां होने वाले उपचुनाव ने सिर्फ राज्य ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक गलियारों में भी हलचल मचा दी है। वैसे तो बांकीपुर पिछले कई वर्षों से भाजपा का गढ़ मानी जाती रही है, लेकिन इस बार इस पारंपरिक समीकरण को चुनौती देने वाले कोई बड़े दल के नेता नहीं, बल्कि राजनीति के उस ‘मास्टरमाइंड’ हैं, जिन्होंने अब तक मंच के पीछे रहकर सरकारें बनाने का काम किया है। जी हां, हम बात कर रहे हैं जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की।
बांकीपुर सीट खाली क्यों हुई?
यह सवाल सबके मन में है कि आखिर अचानक इस सीट पर उपचुनाव की नौबत कैसे आई? दरअसल, बांकीपुर से विधायक रहे नितिन नवीन को हाल ही में भाजपा ने राज्यसभा भेजा था। राज्यसभा के सदस्य बनने के बाद उन्हें विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र देना पड़ा, जिसके कारण यह सीट रिक्त हो गई। अब 3 अगस्त को यहां मतगणना होगी और इस नतीजे का असर सीधा बिहार के आगामी राजनीतिक घटनाक्रम पर पड़ेगा।
चुनावी रणनीतिकार के तौर पर प्रशांत किशोर की पहचान किसी से छुपी नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तक के चुनावी अभियानों को सफल बनाया है। लेकिन इस बार वे पहली बार खुद मैदान में कूदे हैं। बांकीपुर उपचुनाव उनके लिए एक तरह से ‘लिटमस टेस्ट’ है। वे यहां जीत का परचम लहराने के लिए जमीनी स्तर पर कड़ी मेहनत कर रहे हैं। उनकी पार्टी ‘जन सुराज’ के जरिए प्रशांत किशोर यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि अब वे सिर्फ सलाहकार नहीं, बल्कि जनता के नेता हैं।
शत्रुघ्न सिन्हा के समर्थन से मिली राजनीतिक ताकत
इस बीच, प्रशांत किशोर को एक बड़ा बाहरी समर्थन मिला है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लोकसभा सदस्य और बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता से राजनेता बने शत्रुघ्न सिन्हा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर एक लंबा पोस्ट कर PK का बेहतरीन तरीके से समर्थन किया है।
शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने बयान में प्रशांत किशोर को ‘सबसे काबिल, दूरदर्शी और बेहतरीन बुद्धिजीवी’ करार दिया। उन्होंने लिखा कि प्रशांत के मैदान में उतरने से पूरे देश की जनता के बीच हलचल मच गई है। एक ‘बिहारी बाबू’ होने के नाते उन्हें यह खबर बेहद दिलचस्प लग रही है। सिन्हा ने युवाओं से अपील करते हुए कहा कि जाति, धर्म और पार्टी की सीमाओं को तोड़कर लोगों को प्रशांत किशोर के साथ आना चाहिए। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी नेता के इस समर्थन का बांकीपुर की जमीनी राजनीति पर कितना असर पड़ेगा, यह देखने वाली बात होगी।

बांकीपुर और सिन्हा परिवार का पुराना रिश्ता
शत्रुघ्न सिन्हा द्वारा प्रशांत किशोर का बढ़ावा देना इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि बांकीपुर सीट सिन्हा परिवार के लिए अजनबी नहीं है। साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे लव सिन्हा ने इसी सीट से कांग्रेस के टिकट पर अपनी राजनीतिक किस्मत आजमाई थी।
बॉलीवुड अभिनेता रहे लव सिन्हा ने फिल्म ‘सदियां’ (2009) और जेपी दत्ता की ‘पलटन’ जैसी फिल्मों में काम किया, लेकिन फिल्मों के साथ-साथ उन्होंने बिहार की राजनीति में भी अपने पैर जमाने की कोशिश की। हालांकि, 2020 में लव सिन्हा को भाजपा के नितिन नवीन के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा था। अब चार साल बाद जब यह सीट उपचुनाव के लिए तैयार है, तो सिन्हा परिवार सीधे तौर पर मैदान में तो नहीं है, लेकिन पिता शत्रुघ्न सिन्हा के जरिए उनकी राजनीतिंग मौजूदगी एक बार फिर इस सीट पर देखी जा सकती है।
भाजपा और आरजेडी की रणनीति क्या होगी?
जहां एक ओर प्रशांत किशोर अपनी नई पार्टी के साथ सबको चौंकाने की कोशिश में हैं, वहीं विपक्षी दलों की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने इस सीट से अपनी अनुभवी नेता रेखा गुप्ता को मैदान में उतारा है। आरजेडी के लिए यह सीट जीतना इसलिए भी जरूरी है, ताकि वे यह साबित कर सकें कि महागठबंधन की जमीन पटना शहर में भी मजबूत है।
दूसरी ओर, सत्ताधारी भाजपा के लिए यह चुनाव ‘प्रतिष्ठा का प्रश्न’ बन गया है। नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद से ही यह सीट भाजपा के खाते में मानी जा रही थी, लेकिन प्रशांत किशोर की एंट्री ने भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। अभी तक भाजपा ने अपने उम्मीदवार का ऐलान नहीं किया है। राजनीतिक गलियारों में इस देरी को लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं। कुछ का मानना है कि भाजपा प्रशांत किशोर की रणनीति को ध्यान में रखकर कोई ऐसा चेहरा तलाश रही है, जो जातीय समीकरण और शहरी मुद्दों दोनों पर कसाव रख सके।






















