लोकसभा चुनाव 2029 से पहले महिला आरक्षण का बड़ा खेल, राजनीतिक हलचल तेज

Women Reservation:संसद में महिला आरक्षण से जुड़े नारी शक्ति वंदन अधिनियम में कुछ बदलाव किए गए हैं। सरकार आज संसद के विशेष सत्र में तीन नए विधेयक पेश कर रही है। इन विधेयकों के तहत संसद में महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा।

संसद के विशेष सत्र में सरकार का बड़ा कदम (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तीन विधेयक पेश
  • सरकार का प्लान 'फुलप्रूफ' लेकिन सीटें और परिसीमन पर मचा बवाल
  • 2029 से पहले महिला सशक्तिकरण की दिशा में सरकार का कदम, विपक्ष के साथ टकराव की संभावना
  • संसद में महिला आरक्षण का नया मसौदा: तीन विधेयकों से नई राजनीति की शुरुआत
  • लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण का ज्वलंत मुद्दा, सरकार और विपक्ष के बीच तकरार

Women Reservation:लोकसभा चुनाव 2029 से पहले महिला आरक्षण को लेकर देश में एक बड़ा राजनीतिक भूचाल आने वाला है। संसद के विशेष सत्र में केंद्र सरकार नारी शक्ति वंदन अधिनियम को धरातल पर उतारने के लिए तीन विधेयक पेश करने जा रही है। सरकार का प्लान ‘फुलप्रूफ’ माना जा रहा है, लेकिन सीटों के फॉर्मूले और परिसीमन को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच जबरदस्त टकराव देखने को मिल रहा है।

सरकार का तीन-पॉइंट मास्टरप्लान

सितंबर 2023 में महिला आरक्षण कानून बनने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि इसे कब लागू किया जाएगा? कानून में ‘अगली जनगणना के बाद’ की शर्त थी, जिससे 2029 के चुनाव में इसे लागू होना नामुमकिन था। अब मोदी सरकार इस बाधा को हटाने के लिए तीन बिल ला रही है:

  1. संविधान संशोधन विधेयक 2026: इसके जरिए अनुच्छेद 81 और 82 में बदलाव कर 2011 की जनगणना को आधार माना जाएगा। इसके साथ ही लोकसभा की कुल सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 (815 राज्यों + 35 केंद्र शासित प्रदेशों के लिए) किया जाएगा।
  2. परिसीमन विधेयक 2026: एक नया परिसीमन आयोग बनेगा, जो 850 सीटों में से 273 सीटें (33%) महिलाओं के लिए आरक्षित करेगा। इसमें सीटों के रोटेशन का भी प्लान होगा।
  3. केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक: दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी एक साथ 33% आरक्षण लागू किया जाएगा।

सरकार का तर्क: सरकार का कहना है कि बिना परिसीमन (सीमाओं का निर्धारण) के यह तय नहीं हो सकता कि कौन सी सीट महिलाओं के लिए आरक्षित होगी। मौजूदा सांसदों की सीटें खत्म किए बिना और नई सीटें जोड़कर ही यह लागू किया जा सकता है।

विपक्ष की 5 बड़ी आपत्तियां—आखिर बहस क्यों है?

कांग्रेस, सपा, राजद, डीएमके और लेफ्ट पार्टियां महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सरकार के ‘तौर-तरीके’ पर उन्होंने सीधा हमला बोल दिया है।

1. OBC कोटे की अनदेखी:

सपा और राजद जैसी पार्टियों का सबसे बड़ा सवाल यह है कि कानून में SC/ST महिलाओं के लिए उप-आरक्षण है, लेकिन सबसे बड़ी आबादी वाले OBC वर्ग की महिलाओं को इसमें कोई भागीदारी क्यों नहीं दी गई? विपक्ष का आरोप है कि इससे आरक्षण का फायदा सिर्फ ऊपरी तबके की महिलाओं को मिलेगा।

2. उत्तर-दक्षिण का असंतुलन (सबसे बड़ा मुद्दा):

तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतरीन काम किया है। डीएमके और अन्य दलों का कहना है कि अगर आबादी के आधार पर सीटें बढ़ाई जाती हैं, तो यूपी-बिहार जैसे राज्यों को ‘बंपर’ सीटें मिलेंगी, जबकि दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। विपक्ष इसे संघीय ढांचे पर हमला बता रहा है।

3. 2011 के पुराने डेटा पर भरोसा:

विपक्ष का मानना है कि 2011 की जनगणना का डेटा 15 साल पुराना हो चुका है। जब देश में नई जनगणना (2026-27 तक) की प्रक्रिया चल रही है, तो पुराने आंकड़ों के आधार पर देश की सियासत को नया रूप देना वैज्ञानिक नहीं है।

4. परिसीमन की अनावश्यक शर्त:

विपक्ष का सीधा सुझाव है कि परिसीमन और जनगणना के जाल में न फंसकर, सरकार को महिला आरक्षण को तत्काल मौजूदा 543 सीटों पर ही लागू कर देना चाहिए। सीटें बढ़ाने की जरूरत ही नहीं है।

5. चुनावी लाभ के लिए जल्दबाज़ी:

विपक्ष का आरोप है कि 2029 के चुनाव से पहले ‘महिला आरक्षण’ के नाम पर वोट बैंक की राजनीति करने के लिए सरकार ने कानूनी प्रक्रियाओं के साथ छेड़छाड़ की जा रही है।

संसद के विशेष सत्र में ये तीनों विधेयक पेश होंगे, लेकिन संविधान संशोधन विधेयक पास करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। यदि सरकार NDA के सहयोगियों के साथ इसे पास करा भी लेती है, तो भी सीटों के फॉर्मूले और उत्तर-दक्षिण के असंतुलन को लेकर देश भर में एक बड़ी राजनीतिक और कानूनी जंग शुरू होना तय है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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