रक्षाबंधन का पर्व हर साल भाई-बहन के रिश्ते की गहराई का संदेश देता है, लेकिन झारखंड में इस त्योहार को मनाने का अंदाज कुछ अलग और बेहद खास है। 27 अगस्त को राज्य के आदिवासी इलाकों की हजारों महिलाओं ने राखी अपने भाइयों की कलाई पर नहीं, बल्कि पेड़ों के तनों में बांधी। इस अनूठी पहल के पीछे एक ही मकसद है — जंगलों की रक्षा और प्रकृति से बने भावनात्मक रिश्ते को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना।
700 गांवों में एक लाख पेड़ों को बांधी जाएगी राखी
यह पहल पेड़ बचाओ’ अभियान का हिस्सा है, जो एक पूरे महीने तक चलेगा। अभियान के तहत रक्षाबंधन के दिन झारखंड के 700 गांवों में करीब एक लाख पेड़ों को राखी बांधने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं, पूरे अभियान के दौरान राज्य के 24 जिलों के चिन्हित गांवों में तीन लाख पेड़ों तक राखी पहुंचाने की योजना बनाई गई है।
अभियान की औपचारिक शुरुआत गुमला जिले के जोराड़ गांव से की गई, जहां वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी कुमार ने रक्षाबंधन के दिन एक पेड़ को राखी बांधकर इस मुहिम का शंखनाद किया।
“जंगल हमारे माता-पिता के समान”
अभियान में शामिल महिलाओं का जोश और उनका जंगल से लगाव देखते ही बनता है। गुमला की स्थानीय आदिवासी महिला रेशमा मर्डी ने कहा, “हमें अपने पूर्वजों से यह सीख मिली है कि वे हमेशा जंगलों की रक्षा करते आए हैं। जंगल हमारे माता-पिता के समान हैं। इसीलिए हम पेड़ों को राखी बांधते हैं, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक यही संदेश पहुंचे।”
पद्म श्री जमुना टुडू ने लिया आजीवन संकल्प
पद्म श्री से सम्मानित जमुना टुडू ने इस अवसर पर कहा कि आज रक्षाबंधन के शुभ मौके पर हमने वृक्षों की दीर्घायु के लिए उन्हें राखियां बांधी हैं। यह पूरा वन हमारा है। हमने प्रतिज्ञा ली है कि आखिरी सांस तक पेड़ों को कटने नहीं देंगे।
उन्होंने बताया कि महिलाओं ने पेड़ों को भाई का दर्जा देकर राखी बांधी है। उनका कहना है कि पेड़ों के साथ ही जंगल में रहने वाले जानवरों की सुरक्षा भी उनकी जिम्मेदारी है। आजकल जंगल से हाथी निकलकर आ रहे हैं, जिसकी असली वजह पेड़ों की कटाई है। इसलिए हम सभी महिलाओं ने संकल्प लिया है कि जब तक शरीर में जान है, जंगल को कटने नहीं देंगे और इसे बचाने का काम करते रहेंगे, टुडू ने कहा।
वन विभाग का बड़ा लक्ष्य
पीसीसीएफ (प्रधान मुख्य वन संरक्षक) ने अभियान के बारे में जानकारी देते हुए बताया, “शुक्रवार को रक्षाबंधन के दिन 700 गांवों में करीब एक लाख पेड़ों को राखी बांधने का लक्ष्य रखा गया है। यह अभियान एक महीने तक जारी रहेगा और इस दौरान 24 जिलों में लगभग तीन लाख पेड़ों को राखी बांधी जाएगी।”
रक्षाबंधन पर पेड़ों को राखी बांधने की यह पहल कोई नई नहीं है। इसकी नींव वर्ष 2004 में धनबाद जिले के टुंडी प्रखंड के लुकैया गांव में रखी गई थी, जो कभी माओवादी प्रभाव के चलते चर्चा में रहा था। कुमार के मुताबिक, तब से अब तक राज्यभर में 12,000 से अधिक गांवों को इस कार्यक्रम से जोड़ा जा चुका है।
उन्होंने कहा, “इस पहल के जरिए लुकैया गांव में 20,000 से अधिक महुआ के पेड़ों को संरक्षित किया गया। आज ये पेड़ ग्रामीणों की आजीविका में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।”
आदिवासी संस्कृति में जंगल की अहमियत
झारखंड के आदिवासी समाज के लिए जंगल सिर्फ पेड़-पौधों का समूह नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। सरना स्थलों से लेकर महुआ, साल और इमली जैसे पेड़ों तक — हर चीज उनकी संस्कृति, पहचान और रोजगार से जुड़ी है। ऐसे में राखी के जरिए पेड़ों से ‘रिश्ता’ बांधना महज एक प्रतीक नहीं, बल्कि सदियों पुरानी प्रकृति-प्रेम की जीवंत परंपरा है।
राखी का रिश्ता, अब पर्यावरण के साथ
पारंपरिक रूप से राखी का मतलब होता है — बहन की ओर से भाई की सुरक्षा का वचन। झारखंड में महिलाओं ने इस रिश्ते को उलटकर खुद पेड़ों की रक्षक बनने की प्रतिज्ञा ली है। यह पहल न सिर्फ वन कटाई रोकने में असरदार साबित हो रही है, बल्कि युवा पीढ़ी को पर्यावरण संरक्षण की सबक भी दे रही है। माना जा रहा है कि ऐसे सांस्कृतिक अभियान वन संरक्षण को जन-भागीदारी वाला आंदोलन बना देते हैं, जो अक्सर सरकारी नियमों से ज्यादा कारगर होते हैं।

























