Delhi Saket Building Collapse: दिल्ली के साकेत मेट्रो स्टेशन के पास शनिवार शाम एक दर्दनाक हादसे ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया है। यहां एक व्यावसायिक इमारत ताश के पत्तों की तरह ढह गई, जिसके मलबे में छह लोगों की जान चली गई। यह हादसा सिर्फ कंक्रीट और ईंटों का नहीं था, बल्कि इसने कई परिवारों की दुनिया उजाड़ दी और महीनों की मेहनत से सजे सुनहरे सपनों को मिट्टी में मिला दिया। एक पल पहले जहां नौकरी पाने का जश्न था और बच्चों की खिलखिलाहट थी, अगले ही पल वहां सिर्फ चीखें, गहराती धूल और मौत का सन्नाटा पसर गया।
घटना के बाद मौके पर बचाव अभियान युद्ध स्तर पर चलाया गया। दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता ने घटना की गंभीरता को देखते हुए जांच के आदेश दे दिए हैं। सरकार ने लापरवाही बरतने के आरोप में एमसीडी के दो इंजीनियरों को निलंबित भी कर दिया है। लेकिन इन सबी के बीच हादसे में मारे गए लोगों की कहानियां दिल को झकझोर देने वाली हैं।
नौकरी पाने का जश्न बना अंतिम सफर
मलबे में दबकर दर्दनाक मौत होने वालों में 28 वर्षीय कपिल की कहानी सबसे हैरान करने वाली है। कपिल भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बार्क) में नौकरी पाने का सपना देख रहा था। मेहनत रंग लाई थी और उनका इंटरव्यू बहुत अच्छा हुआ था। शनिवार को इंटरव्यू के बाद वह अपने पांच दोस्तों के साथ इमारत के पास स्थित एक कैंटीन में छोटी सी पार्टी मनाने पहुंचे थे। कपिल के दोस्तों ने बताया कि उन्होंने फोन पर दोस्तों को बताया था कि इंटरव्यू शानदार रहा और अब सिर्फ जुलाई में आने वाले रिजल्ट का इंतजार था। बिहार के मुजफ्फरपुर एमआईटी (इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी) के पूर्व छात्र कपिल दिल्ली में कोचिंग कर रहे थे। पार्टी के दौरान ही इमारत गिरी और सब कुछ खत्म हो गया।
कपिल के साथ उनका दोस्त नलिन राय भी था, जो भी एमआईटी का पूर्व छात्र था। नलिन ने हाल ही में बीटेक की पढ़ाई पूरी की थी और गेट परीक्षा की तैयारी कर रहा था। गुरुग्राम में रहने वाले नलिन के रिश्तेदार बैकुंठ नाथ ने बताया कि नलिन छुट्टियों में घर जाने की योजना बना रहा था। हादसे में नलिन के सिर पर गंभीर चोट आई, जिससे बाद में उसकी मौत हो गई। इसी तरह 24 साल के छात्र रवि की भी सिर में गंभीर चोट लगने से मौत हो गई।
पिता का डर सच हुआ
राजस्थान के अलवर निवासी रमेश चंद के लिए दिल्ली का सफर उनके सबसे बुरे सपने में बदल गया। उनकी 24 वर्षीय बेटी एकता उस समय वहां मौजूद थीं। एकता डेंटल सर्जरी में ग्रेजुएट थीं और पिछले एक साल से दिल्ली में रहकर एफएमजीई की तैयारी कर रही थीं। 28 जून को होने वाली इस परीक्षा से पहले शनिवार सुबह एकता ने टेस्ट दिया था, जिसमें उनका प्रदर्शन काफी अच्छा रहा था। शनिवार रात को जब एकता के दोस्तों ने उन्हें फोन कर बताया कि इमारत ढहने के बाद एकता से संपर्क नहीं हो पा रहा है, तो रमेश तुरंत दिल्ली के लिए रवाना हो गए। रविवार को जब बचाव दल ने मलबे से एकता का शव बरामद किया, तो एक बेबस पिता का डर सच साबित हो गया।
मां जैसी थीं पार्वती, छात्रों को बचाने के लिए उतरी मलबे में
इस हादसे में एक ऐसी कहानी भी सामने आई है, जिसे सुनकर आंखें नम हो जाती हैं। नेपाल मूल की 50 वर्षीय पार्वती ओझा यहां एक कैंटीन चलाती थीं। पिछले दो दशक से दिल्ली में रह रही पार्वती, छात्रों के लिए मां जैसी थीं। वह छात्रों को किफायती और स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध कराती थीं। घटना के समय जब इमारत गिरने लगी, तो पार्वती खुद बाहर निकल गईं थीं, लेकिन अंदर फंसे छात्रों को देखकर वापस अंदर दौड़ गईं।
पार्वती के रिश्तेदार हरि प्रसाद ओझा ने बताया कि उस समय उन्होंने 12 आलू परांठे और चार कोल्ड कॉफी का ऑर्डर पूरा किया था। तभी कंपन महसूस हुई। दोनों बाहर भागे, लेकिन पार्वती अंदर मौजूद 20-25 छात्रों को आवाज देने और बचाने के लिए वापस अंदर गईं। वह दोबारा वापस नहीं लौटीं। जीवित बचे छात्र मूसन ने कहा, ‘वह हमारी मां जैसी थीं। अगर मेन्यू में कोई चीज नहीं भी होती थी, तो वह हमारे लिए बना देती थीं। उन्होंने हमें कभी ग्राहक महसूस नहीं होने दिया।’
प्रलय जैसा मंजर, दहशत में छात्र
इमारत के पास मौजूद छात्र रोनित ने बताया कि ऐसा लगा जैसे पूरा इलाका अचानक गायब हो गया हो। एक जोरदार आवाज के साथ चारों ओर धूल ही धूल हो गई। लोग चीखते-चिल्लाते इधर-उधर भाग रहे थे। कैंटीन में मौजूद ऋषभ ने कहा, ‘हमने अजीब सी आवाज सुनी, और फिर अफरा-तफरी मच गई। कुछ लोग भागने की कोशिश में गिर पड़े, जबकि अन्य अपने दोस्तों को पुकार रहे थे।’
इस हादसे ने उन छात्रों की मानसिकता पर गहरा असर डाला है, जो विदेश में मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई का सपना देख रहे थे। झारखंड के बोकारो से एमबीए करने वाले अनिल ने अपने दोस्त राजी को खो दिया। अनिल ने बताया, ‘हम पहले से ही परीक्षाओं के तनाव में थे। 28 जून को महत्वपूर्ण परीक्षा है, लेकिन अब कोई भी ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहा है। हर तरफ सिर्फ मलबा, किताबें और सपनों के टुकड़े बिखरे पड़े हैं।’ साकेत के इलाके में जहां कुछ दिन पहले तक लाइब्रेरी और कोचिंग सेंटर की रौनक थी, आज वहां गम और सदमे का माहौल है।





















