पश्चिम बंगाल के पहाड़ी इलाकों के लोगों के लिए एक नई उम्मीद की किरण के रूप में आज सिलिगुड़ी में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक संपन्न हुई। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में आयोजित इस उच्च-स्तरीय बैठक में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी विशेष रूप से उपस्थित हुए। यह बैठक केवल एक औपचारिक आदान-प्रदान नहीं थी, बल्कि दशकों से चले आ रहे पहाड़ी संघर्ष को एक स्थायी बिंदु पर लाने की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है।
व्यापक प्रतिनिधित्व और एकजुट मंच
इस रणनीतिक वार्ता की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि पहाड़ी क्षेत्र के लगभग हर राजनीतिक और सामाजिक धड़े ने इसमें भाग लिया। केंद्र और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा, बैठक में शामिल होने वाले प्रमुख राजनीतिक चेहरों में दार्जीलिंग के सांसद राजू बिस्ता, सांसद हर्षवर्धन सिंगला, और पहाड़ मंत्री बिशाल लामा शामिल थे।
इसके अलावा, पहाड़ी राजनीति के दिग्गज नेता जैसे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) के बिमल गुरुंग और गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) के मान घीसिंग की उपस्थिति इस बात का संकेत थी कि सभी दलों ने एक सामूहिक हित के लिए पार्टी राजनीति से ऊपर उठकर इस मंच पर आने का फैसला किया है। विधायक भरत छेत्री, सोनम लामा, नोमन राई, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI(M)) के नेता जेबी राई, गोरानिमो संगठन के दावा पाखरीन और सुमेती नेता बिकाश राई जैसे प्रतिनिधियों ने भी अपने-अपने संगठनों के पक्ष को रखा।
पहचान और संवैधानिक मान्यता
बैठक के दौरान चर्चा का केंद्र बिंदु पहाड़ी जनसंख्या की अलग पहचान थी। पिछले कई दशकों से इस क्षेत्र के लोगों की मांग रही है कि उनकी सांस्कृतिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक विशेषताओं को भारतीय संविधान के अंतर्गत एक विशेष दर्जा या मान्यता प्रदान की जाए। प्रतिनिधियों ने एक स्वर में यह मांग उठाई कि अब केवल आर्थिक पैकेज या अस्थायी व्यवस्थाओं से काम नहीं चलेगा, बल्कि एक ऐसा स्थायी राजनीतिक समाधान (Permanent Political Solution) लाया जाए जो भविष्य की किसी अनिश्चितता को खत्म करे।
केंद्रीय गृह मंत्री का बड़ा आश्वासन
पहाड़ी नेताओं की इन बारीकियों को गहराई से सुनने के बाद, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक स्पष्ट और ठोस रुख अपनाया। उन्होंने सभी को यह भरोसा दिलाया कि भारत सरकार पहाड़ी समुदाय की भावनाओं को पूरी गंभीरता से ले रही है। शाह ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केंद्र भारत के संविधान के दायरे के भीतर ही इस समस्या का शीघ्रतम और स्थायी राजनीतिक समाधान निकालेगा।
उन्होंने यह भी संदेश दिया कि राजनीतिक समाधान के साथ-साथ पहाड़ी क्षेत्र के विकास और जनता की अन्य आर्थिक मांगों पर भी सहानुभूतिपूर्ण विचार किया जाएगा। गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि इस पूरी प्रक्रिया के लिए केंद्र सरकार की ओर से पर्याप्त धनराशि (Funds) की कोई कमी नहीं आने दी जाएगी और सभी लंबित मुद्दों का निदान सुनिश्चित किया जाएगा।
पंकज कुमार सिंह की अध्यक्षता में बनेगी समिति
नीतिगत घोषणाओं को धरातल पर उतारने के लिए सबसे अहम फैसला इस बैठक में एक उच्च-स्तरीय समिति के गठन का लिया गया। केंद्र सरकार ने पूर्व उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (Deputy National Security Advisor) और वर्तमान में इस मामले के वार्ताकार पंकज कुमार सिंह को इस समिति का अध्यक्ष बनाने का निर्णय लिया है।
एक राष्ट्रीय सुरक्षा स्तर के अधिकारी को इस जिम्मेदारी से नवाजा जाना इंगित करता है कि केंद्र इस मुद्दे को किसी सामान्य प्रशासनिक मसले से अधिक के रूप में देख रहा है। इस समिति का मुख्य कार्य सभी हितधारकों से बातचीत करने के बाद ‘मॉडेलिटीज’ (Modalities) को अंतिम रूप देना होगा। सरल शब्दों में, यह समिति वह मसौदा तैयार करेगी, जिस पर हस्ताक्षर के बाद पहाड़ी क्षेत्र को संवैधानिक समाधान मिल सकेगा।
सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण माहौल
पहाड़ी राजनीति के इतिहास में ऐसा दुर्लभ दृश्य देखने को मिला, जहां विचारधारा से भिन्न सभी दलों के नेता एक मंच पर एकमत दिखे। बैठक का पूरा माहौल अत्यंत सकारात्मक और सौहार्दपूर्ण रहा। सभी प्रतिनिधियों ने अपने संबोधन में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के उदार और खुले दृष्टिकोण की भूरि-भूरि प्रशंसा की। नेताओं ने माना कि इस तरह का एक व्यापक और गंभीर संवाद पहले कभी नहीं हुआ, जहां सरकार ने सीधे तौर पर स्थायी समाधान की बात कही हो।

























