The history of 1942 on the streets of Delhi: किसी भी देश के इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं, जब कालखंडों के पन्ने पलटने लगते हैं। जब लगता है कि समाज पूरी तरह से सुप्ति में चला गया है, निष्क्रियता का अंधेरा सर्वव्यापी हो गया है, तभी कवियों की उन पंक्तियों का असली अर्थ सामने आता है जो किसी युग के दर्द को समेटे हुए होती हैं। मशहूर कवि दुष्यंत कुमार द्वारा लिखी गई उन हृदयस्पर्शी पंक्तियां, जो निराशा और उथल-पुथल के दौर में लिखी गई थीं, आज की तारीख में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की सड़कों पर चरितार्थ होती नजर आ रही हैं।
20 जुलाई को जब जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्ग तक का वह ऐतिहासिक मार्च निकला, तो यह मात्र एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था। यह 1942 में महात्मा गांधी द्वारा अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ दी गई उस ऐतिहासिक पुकार—’भारत छोड़ो’ का एक जीवंत, सांस लेता हुआ और सच्चा आधुनिक रूपांतरण था। पिछले एक दशक से अधिक समय से धार्मिक जुनून, सत्ता के नशे और अंधभक्ति के कारण जड़वत् होकर एक मुर्दे जैसी स्थिति में पहुंचा हुआ यह देश, उस दिन अचानक एक विशाल ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। यह दृश्य भयावह था, पर अपूर्व साहस से ओतप्रोत था। सत्ता के दमन के सारे हथियार—चाहे पुलिस की बेरहम लाठियां हों, या बंदूकों की नालों से निकलने वाली गोलियों की धमकी हो—फीकी पड़ गईं। युवाओं के सिर फूटे, उनकी हड्डियां टूटीं, उनके शरीर खून से लथपथ होकर गिरे, लेकिन उनके चेहरे पर करुणा की एक भी लकीर नजर नहीं आई। उनकी आंखों में एक ही दृढ़ संकल्प था—’हमें कुचलो, लेकिन हमारे कदम पीछे खिसकने वाले नहीं हैं।’

सेनापति का पलायन और संसद की घेराबंदी
इस ऐतिहासिक जन उमड़ाव को दबाने के लिए सत्ताधारियों ने आंदोलन के एक प्रमुख चेहरे और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक को जबरदस्ती उठाकर अस्पताल में नजरबंद कर दिया। सरकार को शायद विश्वास था कि सेनापति को हटा देने भर से सेना बिखर जाएगी। लेकिन इस आंदोलन की असल ताकत उसकी जमीनी अभिव्यक्ति थी। जिस युवा, अभिजीत दीपके के दिमाग में नीट पेपर लीक के खिलाफ यह विद्रोह पला, वह सरकार की सारी रुकावटों को पार करते हुए अपने साथियों के साथ एक ट्रक पर सवार हो गया और सीधे संसद भवन के मुख्य द्वार पर जा धमका।
उस दिन दोपहर के समय का एक वाकया बेहद चौंकाने वाला और लाजमी है। जब संसद भवन से बाहर निकलकर एक प्रमुख निकास द्वार की ओर बढ़ा जाता है, तो वहां तैनात सुरक्षा कर्मियों की बेचैनी साफ झलक रही थी। उनके मुंह से निकले शब्द लोकतंत्र के लिए कलंकित करने वाले थे। उन्होंने स्पष्ट कह दिया था कि संसद के सभी दरवाजे अंदर से बंद कर दिए गए हैं। कोई भी मंत्री या सांसद बाहर नहीं जा सकता। लेकिन सबसे ज्यादा निंदनीय बात यह थी कि उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को ‘कॉकरोच’ (दीमक) तक कह डाला। सुरक्षाकर्मी यह बता ही रहे थे कि बाहर से जनता के आक्रोश की गरज सुनाई दे रही थी। आंसू गैस के गोले इतनी बेरहमी से फायर किए गए कि उसका विषैला धुआं संसद के अंदरूनी हिस्सों तक घुस गया और कई लोगों की आंखों के सामने अंधेरा छा गया।
इस भयावह और युद्ध जैसे माहौल में देश के प्रधानमंत्री की भूमिका ने इतिहास के हर पन्ने को शर्मसार कर दिया। भारी सुरक्षा घेरे के बीच छिपकर, वे उस स्थान से खिसक लिए। संकट के इस कठिन घड़ी में एक सच्चे नेता का धर्म होता है कि वह अपने सभी मंत्रियों, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के साथ वहीं डटा रहे। लेकिन यहां तो युद्धभूमि से स्वयं सेनापति ही अपने पीछे का रास्ता ढूंढने लगा। एक तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो १३ दिसंबर २००१ को जब संसद पर आतंकवादियों ने हमला किया था, तब अटल बिहारी वाजपेयी संसद परिसर में मौजूद थे। गोलियों की बौछार के बीच भी उन्होंने पीछे के दरवाजे से भागने का कोई रास्ता नहीं अपनाया था। नेतृत्व की असली परीक्षा संकट के समय होती है, लेकिन हमारे वर्तमान शासक को तो लाखों निर्दोष छात्रों के सामने जाने की हिम्मत तक नहीं हुई। ना वे छात्रों के प्रतिनिधिमंडल से मिले, ना ही उनकी समस्या सुनने उतरे। जैसे ही जनता का सैलाब संसद की ओर बढ़ा, प्रधानमंत्री ने मैदान खाली कर दिया। यह देखकर हर उस नागरिक के मन में यह सवाल उभरना स्वाभाविक है कि क्या हमने इस महान लोकतंत्र को सच में इतने कमजोर और भयभीत हाथों में सौंप दिया है?

विदेशों में भाड़े के जयकार और देश में जमीनी हकीकत
भारत के स्वतंत्रता उत्तर इतिहास में युवाओं का यह विद्रोह अभूतपूर्व और अद्वितीय है। पूरी दुनिया इसे आश्चर्य और चौंकाहट के साथ देख रही है। सत्ता पक्ष ने आंदोलन को कुचलने के लिए कई रणनीतियां अपनाईं। दो केंद्रीय मंत्रियों को लगातार बातचीत करने और गर्म सूप का प्याला दिखाकर एक नाटकीय अनशन तोड़ने का प्रयास किया गया। लेकिन जनता की समझ अब उस नाटकीयता से आगे निकल चुकी थी। इसका जंतर-मंतर और देशभर के विरोध प्रदर्शनों पर कोई असर नहीं पड़ा। उल्टा, इससे युवाओं का गुस्सा और भड़का और वे बड़ी संख्या में राजधानी की ओर कूच करने लगे।
सत्ता के शीर्ष नेतृत्व ने दिल्ली में जन संपर्क का सबसे बड़ा माध्यम—मेट्रो रेल सेवा—को बंद करवा दिया। लेकिन इसका परिणाम भी उल्टा निकला। इसके बावजूद युवा गांधी की ‘दांडी यात्रा’ की तरह पैदल ही जंतर-मंतर पहुंचते रहे। यह गुस्सा किसी एक नेता या पार्टी के खिलाफ नहीं था, बल्कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके शासन तंत्र की कुशासन, असंवेदनशीलता और जनविरोधी नीतियों के खिलाफ एक व्यापक जनाक्रोश था।
प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता की जो बयार उनकी पार्टी और सरकारी तंत्र पिछले कई वर्षों से करते आ रहे हैं, वह एक बड़ी साजिश और भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। मोदी जब विदेश यात्राओं पर जाते हैं, तो स्टेडियमों या सभागारों में उनके स्वागत और जय-जयकार के नारे लगाने वाली भीड़ आमतौर पर भाड़े पर लाई गई होती है। जंतर-मंतर का यह स्वतःस्फूर्त आंदोलन इस कल्पित लोकप्रियता के पोल खोलकर रख देगा। एक ऐसा शासक, जो अपनी ही जनता के सामने आने से भयभीत है, जो लाठियां और गोलियों के बल पर अपनी नाक काटने पर उतारू है, उसे लोकतांत्रिक दृष्टि से किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने निहत्थे, न्याय मांग रहे छोटे बच्चों पर बेहद क्रूरता से अत्याचार किया है, जिसे पूरे विश्व ने नंगी आंखों से देखा है। इसलिए जिन लोगों के लिए मोदी अभी तक कोई अविस्मरणीय हीरो बने हुए थे, उनकी यह भ्रम दशा अब पूरी तरह से चकनाचूर हो चुकी है।
असली नायक कौन हैं?
इस महाआंदोलन को समझने में सबसे बड़ी गलती यह होगी कि इसे किसी एक व्यक्ति विशेष के नाम से जोड़ दिया जाए। इस विद्रोह में सोनम वांगचुक भी हीरो नहीं हैं, अभिजीत दीपके भी नहीं, और ना ही विपक्ष के कोई चर्चित चेहरे—चाहे वह राहुल गांधी हों या अरविंद केजरीवाल। इस आंदोलन के असली नायक वही अनगिनत बच्चे हैं, जिन्होंने अपने घर-परिवार, अपनी पढ़ाई और अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को दांव पर लगाकर जंतर-मंतर पहुंचे। वे वहीं डटे रहे। वे प्रतिदिन सीना तानकर पुलिस की लाठियां खा रहे हैं। वे हजारों की संख्या में चिलचिलाती धूप और बारिश की मार झेलते हुए सड़कों पर सूखे रहे हैं।
इनके अलावा, पर्दे के पीछे से इन आंदोलनकारियों को दो वक्त का खाना, पानी, दवाइयां और जरूरी सामान पहुंचाने वाले वे अनगिनत अनजान चेहरे भी इस लड़ाई के असली सैनिक हैं। एक और बहुत गंभीर पहलू यह रहा कि जिन माता-पिताओं ने पिछले वर्षों में ‘नीट पेपर लीक’ जैसे घोटालों और शिक्षा प्रणाली की बर्बादी के कारण अपने बच्चों को खोया है, उन्होंने अपना दुख दबाकर दूसरों के बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए इस आंदोलन में कूदने का निर्णय लिया। वे सभी शोकसंतप्त माता-पिता इस आंदोलन के सच्चे नायक हैं।
जब सेनापति (वांगचुक) को जबरन उठा लिया गया, तो सरकार को लगा कि अब आंदोलन समाप्त हो जाएगा। लेकिन अगले दिन ही हजारों छात्र फिर से जंतर-मंतर पर एकत्रित हो गए और संसद की ओर कूच करने के लिए तैयार खड़े थे। दूसरे दिन पुलिस ने जिस क्रूरता से इन बच्चों को पीट-पीटकर अधमरा किया, उसके बावजूद तीसरे दिन अपने ताजे और खुले जख्मों को लेकर ये युवा वापस लौट आए। ये सभी कोई साधारण नागरिक नहीं, बल्कि असाधारण साहस के धनी नायक हैं। उन्होंने सत्ता पक्ष के प्रवक्ताओं वाले उन चैनलों को चुप करा दिया, जो सरकार की चमचागीरी करते हुए इन आंदोलनकारियों को ‘चले जाओ’ कह रहे थे।
इसके साथ ही, यूट्यूब और सोशल मीडिया के माध्यम से इस आंदोलन की चिंगारी को दुनिया भर में फैलाने वाला प्रत्येक साइबर कार्यकर्ता भी इस लड़ाई का एक अनिवार्य स्तंभ है। इन सभी ने मिलकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आईटी सेल की नींव ही खोखली कर दी है। इस आंदोलन ने साबित कर दिया है कि नरेंद्र मोदी कोई अजेय योद्धा नहीं हैं। उनकी यह जालिम सत्ता २०२९ के चुनावों से भी पहले अपने अंतिम चरण में पहुंच चुकी है।
शिक्षा माफिया और अशिक्षितों का राज
सबसे दुखद और निंदनीय पहलू यह है कि इस पूरे दमन का एकमात्र कारण केवल शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जैसे एक व्यक्ति को बचाना था। एक मंत्री की गिरफ्तारी या बर्खास्तगी टालने के लिए मोदी और शाह ने दिल्ली की सड़कों पर सैकड़ों मासूम बच्चों के सिर फोड़ दिए, उनके हाथ-पैर तोड़ दिए। दिल्ली पुलिस द्वारा महिला छात्राओं के साथ की गई बदसलूकी और दुर्व्यवहार पूरे देश को शर्मसार करने वाला है।
यह विडंबना ही कही जाएगी कि देश की शिक्षा नीति और राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं की जिम्मेदारी उन लोगों के हाथ में सौंपी गई है, जो स्वयं शैक्षणिक रूप से कमजोर हैं। प्रधानमंत्री स्वयं को लेकर शैक्षणिक योग्यताओं के गंभीर सवाल उठते रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह द्वारा प्रधानमंत्री की एक विवादित डिग्री (जिसे राजनीति विज्ञान में विशेषज्ञता का प्रमाणपत्र बताया गया) सार्वजनिक किए जाने के मामले ने कई सवाल खड़े किए हैं। यदि कोई नकली या विवादित डिग्री जारी करने का अपराध है, तो उसकी जांच देश के गृहमंत्री से शुरू होनी चाहिए। गृहमंत्री स्वयं अर्धशिक्षित माने जाते हैं। इसके ऊपर उनके बेटे, जय शाह, जिनकी शैक्षणिक योग्यता और अनुभव को लेकर कभी पारदर्शिता नहीं रही, बिना किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया या योग्यता के सीधे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के सबसे शक्तिशाली पद—अध्यक्ष पर आसीन हो गए। अंग्रेजी और हिंदी भाषा में सटीक वाक्य रचना करने में असमर्थ यह व्यक्ति देश के सबसे अमीर खेल संगठन का मुखिया बना हुआ है।
इन सभी अशिक्षितों और अयोग्यों के एक मंत्रिमंडल ने मिलकर देश की राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में भारी घोटाले किए। उन्होंने एक पूरी पीढ़ी के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया और उसे बर्बाद कर दिया। आज जय शाह विदेशों में शान से घूम रहे हैं, अधिकांश मंत्रियों के बच्चे विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं या वहां बसे हुए हैं, और मोदी-शाह कड़ी सुरक्षा में रहते हैं। लेकिन जब इस देश के गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चे अपने अधिकारों और न्याय की गुहार लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तो उन्हें बेरहमी से कुचला जाता है।
वैश्विक आक्रोश और तानाशाही का अंत
जंतर-मंतर से शुरू हुआ यह आग अब देश के कोने-कोने में फैल चुका है। मुंबई, पटना, नागपुर, हैदराबाद, कोलकाता, पुणे, झारखंड और भुवनेश्वर जैसे शहरों में लोगों ने बड़ी संख्या में सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ आवाज बुलंद की है। जो शासक खुद को ‘विश्वगुरु’ कहलवाने का दंभ करते हैं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि लंदन, जर्मनी, न्यूयॉर्क और आयरलैंड जैसे देशों में भी भारतीय छात्रों और नागरिकों ने सड़कें खाली कर दी हैं। वे वहां भारत सरकार के इस दमनकारी रवैये के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। यह कोई साधारण विरोध नहीं, बल्कि मोदी-शाह की तानाशाही के खिलाफ एक वैश्विक विद्रोह का रूप ले चुका है।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसका कोई एक मजबूत या पारंपरिक राजनीतिक नेता नहीं है। इतिहास गवाह है कि जब किसी आंदोलन का कोई नेता नहीं होता, जब जनता स्वयं अपने दुख और अस्मिता के कारण सड़कों पर आ जाती है, तब वह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं रह जाता, बल्कि वह एक सच्ची क्रांति बन जाता है। और ऐसी क्रांति के आने का अर्थ है कि जालिम शासक के अंत की घड़ी करीब आ चुकी है।
इस आंदोलन ने एक और बहुत गहरी सच्चाई को सामने ला दिया है कि भाजपा की वर्तमान सत्ता किसी लोकतांत्रिक और जनादेश पर आधारित व्यवस्था का परिणाम नहीं है। यह सत्ता आपराधिक तरीकों से, राजनीतिक माफिया तंत्र का इस्तेमाल करके, देश की सभी संवैधानिक संस्थाओं—चाहे वह चुनाव आयोग हो, न्यायपालिका हो, या जांच एजेंसियां हो—को ब्लैकमेल करके और उन्हें खरीदकर हथियाई गई सत्ता है। इन्हें आज भी जनभावनाओं की कोई परवाह नहीं है। मोदी-शाह, उनके मुख्य न्यायाधीश और चुनाव आयोग के अधिकारी शायद यह सोच रहे होंगे कि चाहे जनता जितना विरोध कर ले, हम चुनावी मशीनरी और सिस्टम को खोखला करके, सांसद-विधायकों की खरीद-फरोख्त करके फिर से सत्ता पर काबिज हो लेंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसा कभी संभव नहीं होता।
जब जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है, तो सारे षड्यंत्र ध्वस्त हो जाते हैं। इटली में बेनितो मुसोलिनी की तानाशाही कैसे चरम पर थी, लेकिन जनता के विद्रोह ने उसे जड़ से उखाड़ फेंका। मुसोलिनी को जनता ने मारकर बीच चौराहे पर फेंक दिया और उसके शव पर लोगों ने अपनी नफरत और गुस्से का इजहार किया। इटली की वर्तमान प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के सामने भी मुसोलिनी की इस अंत की कहानी एक ऐतिहासिक सबक के रूप में मौजूद है। भारत के वर्तमान शासकों को इस कहानी को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए। अत्याचार का अंत हमेशा अत्याचारी के लिए भयानक होता है। यह जंतर-मंतर से उठी आग अब बुझने वाली नहीं है; यह आग अब सिस्टम की सड़ांध को जलाकर ही रहेगी और एक नए और सच्चे लोकतंत्र की नींव रखेगी।





















