संध्या समय न्यूज
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान कहा कि देश की सभी महिलाओं को समान अधिकार सुनिश्चित करने का एक प्रभावी तरीका समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड – UCC) लागू करना हो सकता है। अदालत ने यह टिप्पणी उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान की, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं को पुरुषों के बराबर संपत्ति में हिस्सेदारी देने की मांग की गई है।
समानता के लिए व्यापक विधायी उपाय जरूरी
प्रधान न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस आर महादेवन शामिल थे, ने कहा कि यदि पूरे देश में सभी महिलाओं के लिए समान उत्तराधिकार अधिकार सुनिश्चित करने हैं, तो इसके लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे व्यापक विधायी उपाय पर विचार किया जाना चाहिए।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह एक नीतिगत और विधायी मामला है, जिस पर अंतिम निर्णय लेना विधायिका (संसद) और सरकार का काम है। जस्टिस बागची ने कहा, “डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स के तहत UCC लागू करना विधायिका का क्षेत्र है और इस पर फैसला संसद को करना चाहिए। हम कानून नहीं बना सकते।”
कानूनी शून्यता और अधिकारों को लेकर चिंता
बेंच ने याचिका पर विचार करते हुए एक महत्वपूर्ण कानूनी बाधा को भी उजागर किया। अदालत ने पूछा कि अगर वह शरीयत के उत्तराधिकार नियमों को रद्द कर दे, तो इससे कानूनी शून्य (Legal Vacuum) नहीं पैदा हो जाएगा? क्योंकि इस समय मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई अलग वैधानिक कानून नहीं है।
CJI सूर्यकांत ने चिंता जताते हुए कहा, “सुधार की जल्दबाज़ी में कहीं ऐसा न हो कि हम मुस्लिम महिलाओं को मौजूदा अधिकारों से भी वंचित कर दें। अगर 1937 का एक्ट हटा दिया जाता है, तो एक वैक्यूम बन जाएगा और महिलाओं को वह नहीं मिल पाएगा जो उन्हें अभी मिल रहा है।”
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याचिकाकर्ता का तर्क और अदालत का सुझाव
याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण ने दलील दी कि विरासत का अधिकार एक सिविल राइट है और इसे धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) के तहत “आवश्यक धार्मिक प्रथा” नहीं माना जा सकता। उन्होंने तर्क दिया कि यदि शरीयत के प्रावधान हटते हैं, तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 लागू हो सकता है। इसके समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ट्रिपल तलाक फैसले का हवाला दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि वे अपनी याचिका में यह स्पष्ट करें कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एक्ट, 1937 में दखल दिए बिना महिलाओं को बराबर अधिकार कैसे दिए जा सकते हैं और शरीयत के प्रावधान रद्द होने की स्थिति में क्या वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था होगी।
























