Delhi Politics: दिल्ली की सियासत और सड़कों पर एक बार फिर से तापमान चढ़ा है। लद्दाख के पारिस्थितिक संतुलन, नौकरियों और संवैधानिक अधिकारों की मांग को लेकर चल रहे छात्र आंदोलन ने जहां पूरे देश का ध्यान खींचा है, वहीं इस मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों के बीच शुरू हुई बयानबाजी ने नई राजनीतिक गर्माहट पैदा कर दी है। छात्रों पर पुलिस के कथित लाठीचार्ज के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च निकाला गया, जिसमें लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खड़गे और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव जैसे दिग्गज शामिल हुए।
लेकिन, इस विपक्षी एकता के प्रदर्शन को तब झटका लगा, जब आप पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कांग्रेस पर सीधा निशाना साधते हुए राहुल गांधी को छात्र आंदोलन को कमजोर करने का आरोपित किया। इस पूरे घटनाक्रम को गहराई से समझने की जरूरत है, क्योंकि यह सिर्फ एक राजनीतिक विवाद नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में आंदोलनों, संसदीय विरोध और गठबंधन राजनीति के भविष्य की एक झलक प्रस्तुत करता है।

युवाओं का गुस्सा और लद्दाख का संघर्ष
इस की शुरुआत करने से पहले, यह आवश्यक है कि हम उस मूल मुद्दे पर चर्चा करें जिसने इस पूरे राजनीतिक दौड़ को जन्म दिया है। लद्दाख के प्रख्यात अभियंता और शिक्षाविद सोनम वांगचुक पिछले 23 दिनों से आमरण अनशन पर हैं। उनकी मांगें और उनके साथ खड़े देशभर के युवा छात्र बेहद तार्किक और संवैधानिक हैं। लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल किया जाए, जिससे वहां की पारिस्थितिक संवेदनशीलता को बनाए रखा जा सके, वहां की जनसंख्या पर नियंत्रण रखा जा सके और स्थानीय लोगों को नौकरियों और राजनीतिक अधिकारों में सुरक्षा मिल सके।
जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण ढंग से धरना दे रहे इन छात्रों पर 20 जुलाई को पुलिस द्वारा कथित रूप से बर्बरता पूर्वक लाठीचार्ज किए जाने की खबरों ने पूरे देश में आक्रोश फैला दिया। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार नागरिकों का मौलिक अधिकार है। अगर छात्र सिर्फ अपने भविष्य और पर्यावरण के लिए आवाज उठा रहे हैं, तो उन्हें पुलिस की बर्बरता का शिकार होना पड़े, तो यह एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है। इसी बीच, विपक्षी दलों का इस मुद्दे पर उतरना और सरकार से जवाब मांगना संसदीय लोकतंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा है।
पीएम आवास का मार्च और विपक्ष की रणनीति
कांग्रेस नेतृत्व ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे शीर्ष नेताओं ने मंगलवार को प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च निकाला। समाजवादी पार्टी, आरजेडी और अन्य INDI गठबंधन के दलों ने भी इसमें हिस्सा लिया।

इस मार्च के पीछे कई राजनीतिक संदेश छिपे थे। पहला, कांग्रेस यह दिखाना चाहती थी कि राहुल गांधी विपक्ष के चेहरे के रूप में उभर रहे हैं और वे मोदी सरकार के खिलाफ अपना विरोध जमीनी स्तर पर उतार सकते हैं। दूसरा, पीएम आवास तक मार्च निकालकर कांग्रेस ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जवाबदेही की मांग की। इस मार्च को लेकर पुलिस प्रशासन ने भारी सुरक्षा व्यवस्था कर दी और विपक्षी नेताओं को लोक कल्याण मार्ग से हिरासत में ले लिया गया।
हिरासत में जाना आज के दौर में विपक्षी नेताओं के लिए एक ‘बैज ऑफ ऑनर’ बन गया है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव की हिरासत ने उनके कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी। लेकिन, सियासी विश्लेषकों को इस बात पर गौर करना चाहिए कि क्या पीएम हाउस जाने और हिरासत में जाने का यह नाटक जंतर-मंतर पर बैठे युवाओं के मुद्दे को कोई वास्तविक राहत दे पाएगा, या यह सिर्फ एक राजनीतिक मीडिया प्रबंधन (Optics) भर था?
संजय सिंह का हमला: विपक्ष के भीतर की दरार?
जब विपक्ष एकजुट दिख रहा था, तभी आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने ऐसा बयान दिया जिसने कांग्रेस की कठिनाइयां बढ़ा दीं। संजय सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक तीखा पोस्ट करते हुए कहा कि सोनम वांगचुक पिछले 23 दिनों से अनशन पर हैं और जंतर-मंतर पर देश का युवा आंदोलन चल रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस एक महीने से इस आंदोलन की उपेक्षा कर रही थी और अब अचानक राहुल गांधी ने आंदोलन को अपनी तरफ मोड़ने की कोशिश की।
संजय सिंह के सवाल थे- “आखिर युवाओं के आंदोलन को क्यों कमजोर करना चाहती है कांग्रेस? जंतर मंतर के आंदोलन में शामिल होने की अपील क्यों नहीं करती कांग्रेस?”
राजनीतिक रूप से इस बयान को समझना महत्वपूर्ण है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच दिल्ली और पंजाब में कड़ी प्रतिस्पर्धा चल रही है। हालांकि, लोकसभा चुनाव में दोनों ने ‘INDIA’ गठबंधन के तहत हाथ मिलाया था, लेकिन जमीनी स्तर पर दोनों के बीच का अविश्वास कभी खत्म नहीं हुआ। संजय सिंह का यह बयान दो कारणों से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
वास्तविक आंदोलन बनाम राजनीतिक कब्जा एक जमीनी आंदोलन को जब कोई राजनीतिक दल अपने नेतृत्व में ढालने की कोशिश करता है, तो उस आंदोलन की मूल भाषा बदल जाती है। जंतर-मंतर पर बैठे युवा अपने मुद्दों (लद्दाख की सुरक्षा, नौकरियां) को लेकर एकजुट थे। कांग्रेस का पीएम हाउस मार्च एक राष्ट्रीय राजनीतिक नेतृत्व की छवि बनाने का प्रयास था, जिसमें छात्रों के मुद्दे कहीं पीछे छूट गए। संजय सिंह ने इसी बिंदु पर प्रहार किया।
आप पार्टी की राजनीति दिल्ली में अपनी सरकार चलाने वाली आप अक्सर ‘धरना राजनीति’ की सरप्राइज मानती है। आप को लगता है कि वह जमीनी आंदोलनों से जुड़ी है, जबकि कांग्रेस को ‘अभिजात्यवादी’ पार्टी का टैग लगा हुआ है। संजय सिंह का बयान इसी नैरेटिव को मजबूत करने का प्रयास था।
CJP की सफाई और सियासी तल्खी
संजय सिंह के आरोपों के बाद जब माहौल गरमाया, तो ‘Citizens for Justice and Peace’ (CJP) नामक संगठन ने कांग्रेस की सफाई का पर्चा थाम दिया। CJP ने अपने एक्स हैंडल पर लिखा कि यह झूठा भ्रम फैलाया जा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जो एकता देश में बनी है, उस पर कुठाराघात नहीं किया जाना चाहिए।
CJP के पोस्ट के अनुसार, कांग्रेस सेवादल ने आंदोलनकारियों के लिए नाश्ते की व्यवस्था की और लगातार मदद कर रहा है। उनका कहना था कि राहुल गांधी का प्रदर्शन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पूरे देश से सरकार पर दबाव बन रहा है और नेता विपक्ष अपना संवैधानिक कर्तव्य निभा रहे हैं।
लेकिन, CJP की इस सफाई ने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि कांग्रेस सेवादल लगातार जंतर-मंतर पर युवाओं की मदद कर रहा था, तो उसके शीर्ष नेतृत्व ने वहां जाकर सीधे युवाओं के साथ धरना क्यों नहीं दिया? यदि युवाओं का आंदोलन ही प्राथमिकता था, तो प्रधानमंत्री आवास का रूट क्यों अपनाया गया? इससे संदेह गहराता है कि शायद कांग्रेस ने युवाओं के आंदोलन को सिर्फ ‘ब्रंडिंग’ के लिए इस्तेमाल किया।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार और सरकार का रवैया
इस पूरे घटनाक्रम में एक और पहलू बेहद चिंताजनक है—वह है राज्य द्वारा विरोध को कुचलने की प्रवृत्ति। चाहे कांग्रेस हो या आप, अगर वे सड़क पर उतरकर शांतिपूर्ण तरीके से सरकार से जवाब मांग रहे हैं, तो उन्हें हिरासत में लेना लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब विपक्ष में थे, तब उन्होंने भी सड़कों पर प्रदर्शन किए थे।
लेकिन, वर्तमान में भाजपा सरकार का रवैया विपक्ष के प्रति अत्यधिक असहिष्णु रहा है। पुलिस द्वारा बेरोक-टोक लाठीचार्ज, धारा 144 लगाकर जनदर्शन रोकना और फिर नेताओं को हिरासत में लेना—ये सब कदमें एक तानाशाही शासन के संकेत देते हैं। सरकार को यह समझना चाहिए कि हिरासत में लेने से विपक्ष का आंदोलन बंद नहीं होगा, बल्कि इससे उनका उत्साह और बढ़ेगा। जिस तरह राहुल गांधी और अखिलेश यादव को डिटेन किया गया, उसने मोदी सरकार को देश के सामने ‘तानाशाह’ करार देने का मौका दे दिया है।
मोदी की चाल और ‘चलती का नाम गाड़ी’
यहाँ एक सियासी कहावत बहुत प्रासंगिक हो जाती है—’चलती का नाम गाड़ी’। संजय सिंह ने अपने बयान में अप्रत्यक्ष रूप से मोदी सरकार को भी घेरते हुए एक ऐसा बयान दिया जिसकी गूंज दिल्ली से लेकर लखनऊ और बेंगलुरु तक सुनाई दी। विपक्ष का ध्यान भटकाने की जो कला मोदी सरकार ने अपनाई रखी है, वह अब खामियाजा दे रही है।
लद्दाख का मुद्दा सीधे तौर पर रक्षा, पर्यावरण और चीन की नापाक चाल से जुड़ा है। लेकिन सरकार ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी। जब छात्रों ने सड़क पर उतरने की कोशिश की, तो उन्हें डंडों से पीटा गया। इसके बाद जब विपक्ष ने मोर्चा संभाला, तो मोदी सरकार ने विपक्ष के भीतर की दरारों का फायदा उठाने की कोशिश की। संजय सिंह का बयान आने से मोदी सरकार को सियासी फायदा हुआ, क्योंकि अखिलेश यादव और राहुल गांधी जब पीएम हाउस तक जा रहे थे, तब तक देश का ध्यान ‘लद्दाख आंदोलन’ से हटकर ‘कांग्रेस-आप के टकराव’ की तरफ चला गया।
संजय सिंह का आरोप—चाहे वह पूरी तरह से सच हो या आधा-अधूरा सच—ने एक दर्दनाक सच को उजागर कर दिया है। विपक्ष अभी भी अपने स्वार्थों और ‘मुझे नेता बनाओ’ की दौड़ से बाहर नहीं आ पाया है। यदि कांग्रेस और आप इसी तरह एक-दूसरे को घसियाटने लगें, तो इसमें सबसे ज्यादा नुकसान उन लाखों युवाओं का होगा, जिन्होंने नौकरी, शिक्षा और देश की सुरक्षा की आस में विपक्ष का दरवाजा खटखटाया था।
सीजेपी (CJP) की उस सफाई पर भी सवाल उठना लाजमी है कि अगर कांग्रेस सच में युवाओं के साथ खड़ी है, तो उसे सिर्फ नाश्ता तैयार करके नहीं, बल्कि संसद में और सड़कों पर उनकी आवाज को अपनी आवाज बनाकर बोलना होगा। ‘भ्रम फैलाने’ के आरोप से बचने के लिए कांग्रेस को खुद यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर उसने एक पखवाड़े तक जंतर-मंतर के आंदोलन को अनदेखा क्यों किया?
भारतीय राजनीति एक बार फिर एक मोड़ पर खड़ी है। युवाओं का धैर्य टूट रहा है। नौकरियां नहीं हैं, महंगाई आसमान छू रही है, और लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा खतरे में है। ऐसे में अगर विपक्ष नेताओं के अहंकार और पुलिस की लाठियों के बीच घुस गया, तो इसका परिणाम 2029 के चुनावों में भाजपा के फायदे के रूप में ही निकलेगा।
मोदी की चाल से बचना है, तो विपक्ष को ‘मोदी-विरोध’ से ऊपर उठकर ‘जन-मुद्दों’ पर आना होगा। राहुल गांधी को अपना धरना जंतर-मंतर ले जाकर युवाओं से संवाद करना चाहिए और संजय सिंह को इस बयानबाजी से आगे बढ़कर एक ‘संयुक्त विपक्ष’ के रूप में सरकार पर दबाव बनाना चाहिए। तभी इस लोकतंत्र को जीवित रखा जा सकता है, वरना जनता इन दोनों को एक साथ ‘नकार’ देगी।





















