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वन नेशन, वन इलेक्शन: केंद्र सरकार की योजना पर अब हो सकता है झटका

One Nation One Election: विपक्षी दलों का कहना है कि इस योजना से राज्यों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। उनका तर्क है कि हर राज्य की अपनी विशिष्ट राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां हैं, जिनके अनुसार चुनावी समय तय होने चाहिए।

वन नेशन, वन इलेक्शन: केंद्र सरकार की योजना पर अब हो सकता है झटका

HIGHLIGHTS

  • संसद में लंबी चर्चा: एक साथ चुनाव का सपना
  • संविधान संशोधन पर जोर: केंद्र का बड़ा इरादा
  • विपक्ष का विरोध: राज्यों की स्वायत्तता खतरे में?
  • संयुक्त समिति की भूमिका: देरी क्यों हो रही है?
  • राज्यों का समर्थन: क्या ये योजना सफल होगी?

One Nation One Election: केंद्र सरकार की ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ यानी एक देश, एक चुनाव का सपना लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। इस योजना का मकसद है कि देश के सभी चुनाव—लोकसभा, विधानसभा और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाएं—एक ही समय पर कराई जाएं। इससे न केवल चुनावी खर्च में कमी आएगी, बल्कि प्रशासनिक बोझ भी घटेगा और सरकारें सुचारू रूप से विकास कार्यों पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगी। हालांकि, इस प्रस्तावित बिल को लेकर कई संवैधानिक और राजनीतिक अड़चनें सामने आ रही हैं, जिनके कारण इसकी मंजूरी अभी दूर की बात लग रही है। आइए, इस खबर को विस्तार से समझते हैं और जानिए इस मुद्दे के विभिन्न पहलुओं को।

बिल का मकसद और प्रस्ताव

सरकार का एक बड़ा कदम है, जिसमें कहा गया है कि देश के सभी चुनाव एक साथ कराए जाएंगे। वर्तमान में, लोकसभा, विधानसभा और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग समय पर होते हैं, जिनमें भारी मात्रा में खर्च, समय और संसाधनों का उपयोग होता है। सरकार का तर्क है कि यदि इन चुनावों को एक ही समय पर कर लिया जाए, तो चुनावी प्रक्रिया अधिक सुगम, पारदर्शी और लागत प्रभावी हो जाएगी।

बता दें कि सरकार का मानना है कि इससे चुनावी दौर में बार-बार खर्च होने वाले सरकारी संसाधन बचेंगे, प्रशासनिक दक्षता बढ़ेगी और विकास कार्यों में कोई बाधा नहीं आएगी। इसके अलावा, सरकार का दावा है कि इससे देश की राजनीतिक स्थिरता भी सुनिश्चित होगी, क्योंकि अलग-अलग समय पर होने वाले चुनावों के बीच अस्थिरता और अनिश्चितता की स्थिति कम होगी।

संवैधानिक बाधाएँ और संसदीय प्रक्रिया

बता दें कि इस योजना को लागू करने में सबसे बड़ी बाधा है संविधान में संशोधन की आवश्यकता। वर्तमान संविधान में कई प्रावधान ऐसे हैं, जो स्वतंत्र चुनावों को सुनिश्चित करते हैं, जैसे कि अनुच्छेद 83, 172 और 324A इन प्रावधानों में बदलाव के लिए संविधान में संशोधन आवश्यक है, जो सामान्य बहुमत के अलावा, राज्यों की भी स्वीकृति लेनी पड़ती है।

इसके लिए संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 जैसे बिलों को संसद में लाया गया है। इन बिलों पर अभी तक पर्याप्त पार्लियामेंट्री प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है, और कई राज्यों के साथ परामर्श एवं मत-विभाजन का काम लंबित है।

संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का गठन

बता दें कि सरकार ने इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए 39 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) का गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता भाजपा सांसद पीपी चौधरी कर रहे हैं। यह समिति संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की समीक्षा कर रही है। समिति ने इन विधेयकों को दिसंबर 2024 तक पेश किया था, लेकिन अभी तक देशभर में व्यापक परामर्श और राज्यों के साथ चर्चा पूरी नहीं हो सकी है।

सूत्रों का कहना है कि समिति अपनी रिपोर्ट सौंपने से पहले और अधिक समय की मांग कर सकती है, जिससे इन बिलों के संसद में पारित होने में और देरी हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह योजना शायद ही सितंबर से पहले किसी भी सत्र में पास हो सके, जो कि इस साल के अंत तक लागू हो सके।

राज्यों का समर्थन और विपक्ष की चिंता

देश के लगभग 20 राज्यों में एनडीए या उसके सहयोगियों की सरकारें हैं, जिनमें से कई में स्थिर सरकारें हैं। यदि संसद में यह बिल पास हो जाता है, तो राज्यों में इसे मंजूरी दिलाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है। सरकार का तर्क है कि इससे संघीय ढांचे को मजबूत करने में मदद मिलेगी और चुनावी प्रक्रिया को सरल बनाया जा सकेगा।

विपक्षी दलों का कहना है कि इस योजना से राज्यों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। उनका तर्क है कि हर राज्य की अपनी विशिष्ट राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां हैं, जिनके अनुसार चुनावी समय तय होने चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि यह योजना केंद्र के बढ़ते नियंत्रण को दर्शाती है, और इससे राज्यों की स्वायत्तता कम हो सकती है।

महिला आरक्षण का समीकरण

सरकार इस योजना को और मजबूत बनाने के लिए परिसीमन बिल और महिला आरक्षण बिल को भी इस प्रस्ताव के साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। पिछले बजट सत्र में, विपक्ष ने महिला आरक्षण बिल को परिसीमन से जोड़ने वाले संविधान संशोधन का कड़ा विरोध किया था।

सरकार का लक्ष्य है कि 2029 के आम चुनाव से पहले यह बिल पास हो जाए, ताकि महिलाओं को आरक्षण का लाभ मिल सके। इसके लिए, संसद में दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है, जो अभी पूरी तरह से हासिल नहीं है। यदि ये बिल पास हो जाते हैं, तो इससे महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित हो सकेगा, जो सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से अहम माना जाता है।

इस पूरे मामले में सबसे बड़ी चुनौती है संवैधानिक संशोधन और राज्यों का समर्थन। यदि संसदीय समिति समय पर रिपोर्ट नहीं देती है या राज्यों का समर्थन नहीं मिलता है, तो यह योजना फिलहाल अधर में लटक सकती है। इसके अलावा, राजनीतिक दलों के बीच इस योजना को लेकर मतभेद और विरोध भी इसे लागू होने से रोक सकता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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