The NYT’s Blank Front Page: पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ईरान-अमेरिका वार्ता के बीच ‘मध्यस्थ’ के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका दिखाने के चक्कर में घर में गहरे संकट में फंसते जा रहे हैं। सरकार की इस ‘कूटनीतिक हठ’ ने देश के 3.5 करोड़ शिया नागरिकों का गुस्सा भड़का दिया है, जिसे काबू करने के लिए पाकिस्तानी सेना और प्रशासन को अपने ही नागरिकों पर जुल्म ढाने और खबरों को दबाने तक का सहारा लेना पड़ रहा है।
अमेरिकी अखबार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ के पाकिस्तान एडिशन में हाल ही में फ्रंट पेज का एक बड़ा हिस्सा खाली छोड़ा गया। यह ‘सफेद खाली जगह’ पाकिस्तान सरकार और सेना की सेंसरशिप की करारी पोल खोल रही है। दरअसल, अखबार ने पाकिस्तान के शिया समुदाय के बढ़ते आक्रोश और सरकार की दोहरी नीतियों पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित करने वाला था, लेकिन सरकार ने इसे नागरिकों तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया।
सेना प्रमुख की ‘सख्ती’ ने दिया आग में घी
बता दें कि इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई, जब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की हत्या की खबरों के बाद पाकिस्तान के कई हिस्सों में हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। इसे देखते हुए आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर ने देश के प्रमुख शिया धर्मगुरुओं को तलब किया और उन्हें सख्त लहजे में चेतावनी दी कि किसी भी दूसरे देश (ईरान) की घटनाओं के आधार पर पाकिस्तान में हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सेना प्रमुख ने सीधे तौर पर संकेत दिया कि जो लोग ईरान के प्रति अपनी वफादारी रखते हैं, वे पाकिस्तान छोड़ सकते हैं।
सेना की इस अपमानजनक भाषा ने 3.5 करोड़ शिया समुदाय के गुस्से को हवा दे दी। पाकिस्तान में शियाओं के लिए खामेनेई केवल एक राजनीतिक हस्ती नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक माने जाते हैं। कराची में अमेरिकी दूतावास के बाहर प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बलों की गोलीबारी में कई प्रदर्शनकारियों के मारे जाने के बाद यह आक्रोश सड़कों पर उतर आया।
कूटनीति के चक्कर में उलझी शहबाज सरकार
एक तरफ जहां पाकिस्तान की सड़कें अमेरिका और इजरायल के खिलाफ नारेबाजी से गूंज रही हैं, वहीं दूसरी तरफ शहबाज सरकार इस्लामाबाद में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की मेजबानी कर डोनाल्ड ट्रंप की तारीफें बटोर रही है। पाकिस्तान ने अपनी सेना को सऊदी अरब में तैनात किया है और अमेरिका के गठित ‘पीस बोर्ड’ का हिस्सा भी बन चुका है।
हालांकि, पाकिस्तान के आम शिया नागरिक इस कूटनीतिक दांव को ‘धोखा’ मान रहे हैं। उनकी नजर में यह ईरान और अमेरिका के बीच का समझौता नहीं, बल्कि एक धर्मयुद्ध (जिहाद) है। वे इस लड़ाई को ऐतिहासिक ‘कर्बला’ की लड़ाई से तुलना कर रहे हैं, जहां उन्हें जुल्म के खिलाफ खड़ा होना जरूरी मानते हैं।
गिलगित-बाल्टिस्तान से कराची तक विरोध की लपटें
सरकार और सेना की इस दोहरी चाल के खिलाफ अब पूरे पाकिस्तान में व्यापक विरोध देखने को मिल रहा है। कराची से लेकर गिलगित-बाल्टिस्तान तक लोग सड़कों पर उतर आए हैं। सबसे बड़ा झटका सरकार को तब लगा, जब पर्यटन के लिए मशहूर गिलगित-बाल्टिस्तान में स्थानीय धर्मगुरुओं ने अमेरिकी पर्यटकों के आने पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी। सूत्रों के अनुसार, विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए प्रशासन ने बाजारों को जबरदस्ती शाम ढलते ही बंद करवा दिया और कई शहरों में लोगों को पिंजरे की तरह बंद कर दिया गया।
विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान की सरकार अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने के चक्कर में एक ऐसे आंतरिक खतरे को जन्म दे रही है, जिसे वह लंबे समय तक संभाल नहीं पाएगी। ईरान और अमेरिका के बीच समझौता कराने की कोशिशों को पाकिस्तान के शिया समुदाय ने अपनी धार्मिक आस्था पर सीधा हमला माना है। मुनीर और शहबाज की यह ‘मध्यस्थता’ अगर घरेलू स्तर पर हिंसा का रूप ले लेती है, तो यह पाकिस्तान की अस्थिरता को नई ऊंचाई दे सकती है। NYT का खाली फ्रंट पेज इसी बिखरती व्यवस्था की पहली कहानी है।

























