Rajasthan News: राजस्थान के सरकारी अस्पतालों में दवाइयों की गुणवत्ता को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। प्रसव के दौरान महिलाओं को अत्यधिक रक्तस्राव (ब्लीडिंग) रोकने के लिए दी जाने वाली जीवनरक्षक ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की एक खेप नकली पाई गई है। सबसे भयावह पहलू यह है कि कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में डिलीवरी के बाद हुई चार महिलाओं की रहस्यमयी मौत के पीछे यही नकली इंजेक्शन कड़ी से जुड़ा हुआ है। इस खुलासे के बाद पूरे राजस्थान स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है और दवाइयों की सप्लाई चेन की पोल खुलती दिख रही है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बीते कुछ दिनों में डिलीवरी के बाद चार महिलाओं की अचानक मौत हो गई थी। जांच के दौरान जब मृतक महिलाओं के मेडिकल रिकॉर्ड खंगाले गए, तो सामने आया कि सभी को प्रसव के बाद ब्लीडिंग रोकने के लिए ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन दिया गया था। जब इस इंजेक्शन के सैंपल जांच के लिए भेजे गए, तो लैब रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ।

राजस्थान ड्रग कंट्रोल विभाग की जांच में पुष्टि हुई कि अमृतसर स्थित ‘जैक्सन लैबोरेटरीज़’ द्वारा निर्मित इस खेप में ब्लीडिंग रोकने वाला ‘सक्रिय तत्व’ (Active Ingredient) ही नहीं था। सरल शब्दों में कहें तो यह पूरी तरह से नकली और बेअसर दवा थी, जिसे खून के रिसाव को रोकने वाली जानलेवा दवा के रूप में अस्पतालों में इस्तेमाल किया जा रहा था।
विभाग ने उठाए तत्काल कदम
रिपोर्ट सामने आते ही राजस्थान ड्रग कंट्रोलर अजय फाटक के नेतृत्व में विभाग हरकत में आ गया। पूरे राजस्थान राज्य में तत्काल प्रभाव से इस कंपनी की ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन की बिक्री और इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज से इस बैच का पूरा स्टॉक जब्त कर लिया गया है। विभाग अब यह पता लगाने में जुट गया है कि यह जहरीली और नकली सप्लाई आखिर किन-किन अस्पतालों, सरकारी मेडिकल स्टोरों और प्राइवेट चैनलों तक पहुंची है।
अस्पताल प्रशासन का सफाई पक्ष
हालांकि, इस मामले में अस्पताल प्रशासन ने फिलहाल सीधे कनेक्शन बनाने से इनकार किया है। अस्पताल का कहना है कि महिलाओं की मौत के असल कारणों का पता लगाने के लिए विशेषज्ञों की एक कमेटी गठित की गई है। अंतिम निष्कर्ष केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य मेडिकल तथ्यों के आधार पर ही निकाला जाएगा। अधिकारियों का मानना है कि जांच पूरी होने से पहले किसी भी तरह का निष्कर्ष देना उचित नहीं होगा। लेकिन, समय का संयोग और लैब रिपोर्ट की पुष्टि सबकुछ इशारा कर रही है।
यह सिर्फ एक खेप नहीं, 11 दवाइयां फेल
ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन सिर्फ टिप ऑफ द आइसबर्ग (Iceberg) है। पिछले दस दिनों के दौरान राजस्थान में बिक रही 11 अलग-अलग दवाइयों के सैंपल जांच में बुरी तरह फेल पाए गए हैं। ये वो दवाइयां हैं जो आम बीमारियों से लेकर इमरजेंसी तक में इस्तेमाल होती हैं। इन फेल हुई दवाइयों की सूची में शामिल हैं:
- बुखार की दवाइयां
- एलर्जी रोकने वाली दवाइयां
- एंटीबायोटिक (जो संक्रमण रोकते हैं)
- पेट के संक्रमण की दवाइयां
- इमरजेंसी में इस्तेमाल होने वाली दर्द निवारक दवाइयां
ये दवाइयां कहां की बनी थीं?
स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट से यह भी पता चला है कि ये नकली और घटिया क्वालिटी की दवाइयां किसी एक राज्य की नहीं, बल्कि देश के कई बड़े दवा निर्माण केंद्रों से आ रही थीं। ये दवाइयां राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, दिल्ली और महाराष्ट्र की विभिन्न फार्मास्यूटिकल कंपनियों में बनाई गई थीं।
विभाग ने अब इन सभी संबंधित कंपनियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी है। नोटिस जारी किए जा रहे हैं और इन कंपनियों की दूसरी दवाइयों के सैंपल भी तुरंत जांच के लिए भेजे जा रहे हैं।

सवाल गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली पर
इस पूरे मामले ने राजस्थान में दवाइयों की खरीद और गुणवत्ता जांच की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मेडिकल विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी अस्पतालों में सप्लाई होने वाली दवाइयों की जांच केवल कागजों पर नहीं, बल्कि लैब में व्यावहारिक रूप से बेहद सख्ती से होनी चाहिए।
प्रसूति महिलाओं के साथ यह घटना सिर्फ एक चूक नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता है। जब कोई मरीज सरकारी अस्पताल जाता है, तो उसे दवाइयों की असलियत की जांच करने का न तो साधन होता है और न ही भरोसा। अगर इमरजेंसी में दी जाने वाली दवा ही नकली हो, तो डॉक्टरों की मेहनत और मरीज की जान दोनों बेकार चली जाती है। चार महिलाओं की जान जाने के बाद अब सरकार को इस ड्रग माफिया और कमजोर सप्लाई चेन को नेस्तनाबूद करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, ताकि भविष्य में कोई और मासूम जान नकली दवाइयों का शिकार न हो।






















