कोटा मंडल के गुड़ला रेलवे स्टेशन पर बुधवार सुबह रेल हादसे जैसा दृश्य देखकर लोग चौंक गए। तेज धमाके की आवाज, पटरी से उतरी बोगियां, घायलों को निकालने में जुटे बचावकर्मी और मौके पर पहुंचती चिकित्सा टीम—यह सब किसी वास्तविक दुर्घटना का हिस्सा नहीं था। पश्चिम मध्य रेलवे ने आपातकालीन तैयारियों और विभिन्न एजेंसियों के बीच तालमेल परखने के लिए यहां फुल स्केल आपदा प्रबंधन मॉक ड्रिल आयोजित की थी।
मॉक ड्रिल के परिदृश्य में मुंबई-अमृतसर स्पेशल ट्रेन लाइन नंबर-4 पर खड़ी मालगाड़ी से टकरा गई। टक्कर के बाद ट्रेन के S-1 और S-2 कोच पटरी से उतरकर एक-दूसरे पर चढ़ गए। अभ्यास के दौरान शुरुआती सूचना में दो यात्रियों की मौत और चार लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की खबर दी गई, ताकि बचाव दल वास्तविक आपात स्थिति की तरह कार्रवाई कर सकें।
सुबह 8:55 बजे बजा इमरजेंसी सायरन
अभ्यास की शुरुआत सुबह 8:55 बजे रेलवे कंट्रोल रूम से इमरजेंसी सायरन बजने के साथ हुई। सूचना मिलते ही रेलवे के संबंधित विभागों और आपदा राहत एजेंसियों को अलर्ट किया गया। राहत और बचाव अभियान में रेलवे अधिकारी, NDRF, SDRF, सिविल डिफेंस, स्थानीय पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के जवान शामिल हुए।
मॉक ड्रिल का उद्देश्य केवल दुर्घटनास्थल पर पहुंचना नहीं था, बल्कि यह देखना भी था कि सूचना मिलने से लेकर राहत दलों की तैनाती और घायलों को अस्पताल भेजने तक की प्रक्रिया कितनी तेजी और समन्वय से पूरी होती है।
20 मिनट में पहुंचा दुर्घटना राहत चिकित्सा यान
रेलवे के अनुसार, सायरन बजने के करीब 20 मिनट बाद, सुबह 9:15 बजे दुर्घटना राहत चिकित्सा यान घटनास्थल पर पहुंचा। इसके बाद बचाव दलों ने कोचों में फंसे यात्रियों को बाहर निकालने का अभ्यास शुरू किया। बोगियों में फंसे लोगों तक पहुंचने के लिए गैस कटर का इस्तेमाल किया गया।

डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों ने मौके पर प्राथमिक उपचार दिया। गंभीर रूप से घायल बताए गए यात्रियों को आगे के इलाज के लिए रेफर करने की प्रक्रिया भी अभ्यास का हिस्सा रही। इस दौरान अलग-अलग टीमों ने अपने निर्धारित जिम्मेदारी क्षेत्र में काम किया, ताकि वास्तविक दुर्घटना में किसी जरूरी कदम में देरी न हो।
स्टेशनों पर बनाए गए इमरजेंसी हेल्प डेस्क
हादसे की सूचना के बाद यात्रियों के परिजनों तक जानकारी पहुंचाने की व्यवस्था भी मॉक ड्रिल में परखी गई। कोटा, सवाई माधोपुर, गंगापुर सिटी और भरतपुर रेलवे स्टेशनों पर इमरजेंसी हेल्प डेस्क स्थापित किए गए। इन डेस्क का मकसद संभावित यात्रियों और उनके परिजनों को जानकारी देने की प्रक्रिया का अभ्यास करना था।
ऐसी स्थिति में सही और समय पर जानकारी देना राहत अभियान का अहम हिस्सा होता है। रेलवे ने इस अभ्यास के जरिए यह जांचा कि अलग-अलग स्टेशनों पर हेल्प डेस्क कितनी जल्दी सक्रिय किए जा सकते हैं और सूचना का प्रवाह संबंधित अधिकारियों तक किस तरह पहुंचता है।

वास्तविक दुर्घटना नहीं, आपदा प्रबंधन का अभ्यास
रेलवे अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि गुड़ला रेलवे स्टेशन पर कोई वास्तविक ट्रेन दुर्घटना नहीं हुई थी। टक्कर, घायल यात्रियों और हताहतों से जुड़ा पूरा घटनाक्रम काल्पनिक था। इसे पश्चिम मध्य रेलवे की ओर से आपातकालीन तैयारियों का आकलन करने के लिए आयोजित किया गया था।
फुल स्केल मॉक ड्रिल में रेलवे के साथ बाहरी बचाव एजेंसियों की भागीदारी इसलिए महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि किसी बड़ी रेल दुर्घटना में कई विभागों को एक साथ काम करना पड़ सकता है। ऐसे अभ्यास से यह समझने में मदद मिलती है कि मौके पर कौन-सी टीम क्या जिम्मेदारी संभालेगी, राहत उपकरण कितनी जल्दी पहुंचेंगे और घायलों को निकालने की प्रक्रिया में कहां सुधार की जरूरत है।
सुबह 10:26 बजे समाप्त हुआ अभियान
सुबह 10:26 बजे वरिष्ठ मंडल संरक्षा अधिकारी पुरुषोत्तम मीणा ने मॉक ड्रिल समाप्त होने की घोषणा की। इसके बाद कोटा मंडल के DRM अनिल कालरा, NDRF के रामेश्वर यादव और SDRF के अधिकारियों ने संयुक्त ब्रीफिंग की। बैठक में पूरे अभियान की समीक्षा की गई और राहत कार्य के विभिन्न चरणों पर चर्चा हुई।
अधिकारियों ने माना कि नियमित मॉक ड्रिल से वास्तविक हादसों के दौरान प्रतिक्रिया समय कम करने और एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बनाने में मदद मिलती है। गुड़ला रेलवे स्टेशन पर हुआ यह अभ्यास रेलवे की दुर्घटना प्रबंधन व्यवस्था, चिकित्सा सहायता और यात्रियों के परिजनों तक सूचना पहुंचाने की तैयारी को परखने का एक महत्वपूर्ण अवसर रहा।
गुड़ला रेलवे स्टेशन मॉक ड्रिल ने यह दिखाया कि आपदा की स्थिति में तेज कार्रवाई के साथ स्पष्ट जिम्मेदारी और विभागों के बीच समन्वय भी उतना ही जरूरी है। ऐसे अभ्यासों से कमियों की पहचान कर उन्हें सुधारा जा सकता है, ताकि वास्तविक आपात स्थिति में राहत और बचाव कार्य अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सके।























